Pulwama attack : NIA ने इस तरीके से सुलझाई आतंकी हमले की गुत्थी, जानें इसकी पूरी कहानी

  • दिसंबर, 2019 को NIA को Masood Azhar के भतीजे Mohammad Omar Farooq की मोबाइल पहली किरण के रूप में उभरकर सामने आई।
  • जांच के दौरान फारूक के मोबाइल फोन से कई फोटो, वीडियो और बातचीत के रिकॉर्ड NIA को हाथ लगे।
  • 29 मार्च, 2019 को हमले में शामिल आतंकी फारूक की मौत हो गई थी।

नई दिल्ली। राष्ट्रीय जांच एजेंसी ( National Investigation Agency ) ने डेढ़ साल पहले देश को हिलाकर रख देने वाली पुलवामा आतंकी हमले ( Pulwama terror attack ) की गुत्थी सुलझाने का दावा किया है। हमले की बारे में सारे सबूत व जानकारी इकट्ठा करने के बाद एनआईए ( NIA ) ने मंगलवार को अदालत में चार्जशीट ( Chargesheet ) भी दाखिल कर दी। लेनिक बहुत कम लोगों पता है कि आखिर एनआईए ने इस चुनौतीपूर्ण काम को कैसे पूरा कर दिखाया। आइए हम आपको बताते हैं इसकी पूरी कहानी।

14 फरवरी, 2019 को पुलवामा आतंकी हमले की केंद्र सरकार ( Central Government ) ने एनआईए को सौंपी थी। जांच के क्रम में मसूद अजहर के भतीजे मोहम्मद उमर फारूक ( Mohammad Omar Farooq ), पाकिस्तानी आतंकवादी कामरान अली और कारी यासिर जैसे आतंकवादियों को सुरक्षा बलों ( Indian Army ) ने एनकाउंटर ( Encounter ) में ढेर कर दिया। 29 मार्च, 2019 को हमले में शामिल एक महत्वपूर्ण आतंकी फारूक की मौत हो गई, लेकिन उसका मोबाइल फोन ( Mobile Phone ) कई महीनों तक जम्मू-कश्मीर पुलिस ( Jammu-Kashmir ) के पास पड़ा रहा, जिसकी तरफ किसी का ध्यान नहीं गया।

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फारूक का मोबाइल फोन करीब 10 महीने बाद यानि दिसंबर, 2019 में एनआईए के लिए आशा की पहली किरण के रूप में उभरकर सामने आई। जांच के दौरान फारूक के मोबाइल फोन से कई फोटो, वीडियो और बातचीत के रिकॉर्ड जांच एजेंसी को हाथ लगे।

इस जांच में पुलवामा आतंकी हमला शामिल एक अधिकारी के मुताबिक मोबाइल में आतंकी के पाकिस्तान से भारत तक यात्रा की कई तस्वीरों के साथ-साथ उसके गुर्गों और बम बनाने की प्रक्रिया की भी तस्वीर थी।

इतना ही नहीं फारूक की जैश-ए-मोहम्मद नेतृत्व के साथ व्हाट्सएप पर हुई बातचीत, खासकर उसके चाचा अब्दुल रूफ असगर, पाकिस्तान में अम्मार अल्वी और घाटी से अन्य ऑपरेटिव से चैट ( Mobile Chat ) का ब्यौरा मिला। इन जानकारियों के साथ इंस्पेक्टर जनरल अनिल शुक्ला, डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल सोनिया नारंग और पुलिस अधीक्षक राकेश बलवाल के नेतृत्व में जांच दल को फारूक के फोन में एक कश्मीरी युवक शाकिर बशीर मगरे की तस्वीर मिली, जिसकी पहचान पुलवामा के काकापोरा के निवासी के रूप में की गई थी। बस, यहीं से इस मामले की गुत्थी सुलझने का काम शुरू हो गया।

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कश्मीरी युवक शाकिर बशीर मगरे विस्फोट स्थल के पास चीरघर चलाता था। इस चीरघर से उसने केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल ( CRPF ) के काफिले की टोह ली थी। इस मामले में उसे 28 फरवरी, 2020 को गिरफ्तार किया गया था। यह पाया गया कि उसके घर का इस्तेमाल विस्फोटकों को स्टॉक करने और बम बनाने के लिए किया गया था। उसी बम का इस्तेमाल सीआरपीएफ के काफिले पर हमला करने और 40 सुरक्षाकर्मियों को मारने के लिए किया गया।

चैट रिकॉर्ड में एनआईए को यह पता चला पुलवामा हमले के बाद जब भारतीय और पाकिस्तानी फाइटर जेट डॉगफाइट में लगे हुए थे तब फारुक यह चर्चा कर रहा था कि दोनों देशों के बीच युद्ध होना चाहिए, क्योंकि यह सैकड़ों जैश के लड़ाकों को भारत में घुसपैठ करने का मौका देगा।

एनआईए ने उन वार्तालापों को भी खोज निकाला, जो यह साबित कर रहा था कि पाकिस्तान में बैठ फारूक के चाचा ने उसे पुलवामा के बाद दूसरे हमले की तैयारी के लिए निर्देश दे रहा था। लेकिन जैश को पाकिस्तान पर बढ़ते अंतरराष्ट्रीय दबाव के मद्देनजर अपनी योजनाओं को रद्द करना पड़ा।

एनआईए को पाकिस्तान के एलाइड बैंक लिमिटेड और मीज़ान बैंक में फारूक के दो बैंक खाते मिले, जिसमें पुलवामा हमले के लिए पैसा जमा किया गया था। फारूक के फोन से बरामद सेल्फी, फोटो, वीडियो और चैट ने एनआईए को पाकिस्तान की आतंकी साजिश की कड़ी स्थापित करने में मदद की।

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