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सेक्स वर्करों को भी ना कहने का है अधिकार: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि कोई सेक्स वर्कर है तो इसका मतलब यह कतई नहीं है कि कोई भी उसके साथ जोर-जबरदस्ती कर सकता है।

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सेक्स वर्करों को भी ना कहने का है अधिकार: सुप्रीम कोर्ट

सेक्स वर्करों को भी ना कहने का है अधिकार: सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली। देश की सर्वोच्च अदालत ने एक मामले की सुनवाई करते हुए एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा कि सेक्स वर्करों को भी अपनी सर्विस नहीं देने के लिए मना करने का अधिकार है। आगे कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि कोई इस प्रोफेशन में है तो इसका मतलब यह कतई नहीं है कि कोई भी उसके साथ जोर-जबरदस्ती कर सकता है। कोर्ट ने कहा कि मान लिजिए कि कोई महिला यदि इस प्रोफेशन में है और आसानी से उपलब्ध है तो भी उसके साथ किसी को जबरदस्ती यौन संबंध बनाने की इजाजत नहीं मिल जाती है, उसे भी इनकार करने का अधिकार है। बता दें कि मंगलवार को अदालत ने 1977 में दिल्ली में हुए एक गैंगरेप मामले की सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की।

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निचली अदालत के फैसले को रखा बरकरार

आपको बता दें कि अदालत ने मामले की सुनवाई करते हुए दोषियों को बची हुई सजा भुगतने के लिए सरेंडर करने के लिए चार हफ्ते का समय दिया है। इससे पहले दिल्ली हाईकोर्ट ने 2009 में सुनवाई करते हुए निचली अदालत के फैसले के उलट निर्णय सुनाया था। हालांकि अब एक बार फिर से देश की सर्वोच्च अदालत ने निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा है, जिसमें सभी चारों दोषियों को 10 वर्ष की सजा सुनाई गई थी।

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SC ने हाईकोर्ट के फैसले से असहमती जताई

आपको बता दें कि न्यायाधीश आर भानुमती और इंदिरा बनर्जी की बेंच ने सुनवाई करते हुए कहा कि दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले में कई विसंगतियां हैं। कोर्ट ने केवल इस आधार पर ही आरोपियों को बरी करने का आदेश दिया क्योंकि उन्होंने महिला के खिलाफ बुरा चरित्र होने और वेश्यावृति में संलिप्त होने की शिकायत दर्ज कराई थी। कोर्ट के आदेश में कहा गया था कि चारों आरोपियों को गलत तरीके से फंसाया गया था। दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने आदेश में उन तीन पुलिसवालों के खिलाफ भी शिकायत दर्ज करने के आदेश दिए थे जिसमें कहा गया कि चारों दोषियों पर गलत तरीके से कार्रवाई की गई। हालांकि अब सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले से असहमती जाहिर की और कहा कि ट्राइल कोर्ट का फैसला सही है।

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ट्राइल कोर्ट का क्या था फैसला

आपको बता दें कि ट्राइल कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा था कि यदि कोई महिला के चरित्र पर सवाल उठाता है तो भी इसका मतलब यह कतई नहीं होता है कि आप उसके साथ जबरदस्ती, बिना सहमती के शारीरिक संबंध बनाए या फिर उसका रेप कर दें। इस आधार पर कोर्ट ने सभी चारों आरोपियों को 10 वर्ष की सजा सुनाई थी। कोर्ट ने कहा कि कानून में यह स्पष्ट प्रावधान है कि रेप पीड़िता की गवाही या बयान ही पर्याप्त है यदि सही पाया जाता है, तो फिर सभी आरोपियों को दोषी करार दिया जा सकता है। तमाम सबूतों के आधार पर उनपर मुकदमा चलाया जा सकता है।