
विशेष: किसानों के लिए कभी रहा “लाल सोना” अब उनके लिए बन गया जहर
जय प्रकाश@पत्रिका
मुरादाबाद: आपकी थाली में और जिसके बिना लगभग हर सब्जी अधूरी है। इस टमाटर को आप बखूबी जानते होंगे। इसी लाल सोने से टमाटर के किसान कभी खुशहाल थे। लेकिन टमाटर के बिगड़े भाव ने टमाटर किसानों की रोजी रोटी पर संकट खड़ा कर दिया है। क्यूंकि एकाएक टमाटर के भाव गिरने से अकेले मुरादाबाद मंडल में कई सौ हेक्टेयर में टमाटर यूं ही पड़ा है। लेकिन खरीददार नहीं मिल रहे। ये हाल तब है जब केंद्र और प्रदेश सरकार किसानों को उनकी फसलों का पचास फीसदी मुनाफा देने की बात करती है। जबकि हालात ये हैं कि अगर किसानों को लागत का पैसा ही मिल जाए तब भी गनीमत है। फ़िलहाल अभी तक स्थानीय स्तर पर अभी कोई राहत नहीं मिली है।
इस सीजन में नहीं बढे भाव
पिछले कुछ सालों से ऑफ सीजन में लगातार टमाटर की कीमतें बढ़ रही थीं। जिससे किसानों को इस फसल में मुनाफे की आस जगी थी और आसपास के किसानों ने इस नगदी फसल को करना शुरू किया। एक दो सीजन तो बढ़िया गये जिस पर खुद किसान भी यकीं नहीं कर पा रहे। किसान इस तपन में कड़ी मेहनत करते थे। जिसका उनको फल भी मिलता था। टमाटर 10 रुपये से लेकर 30 रुपये किलो के हिसाब से बिकता था। हर बार की तरह इस बार भी जिले के कुंदरकी और बिलारी क्षेत्र के किसानों ने किसानों ने इसी उम्मीद के साथ टमाटर की फसल लगाई थी। लेकिन उन्हें क्या पता था कि इस बार भाव इतना गिर जाएगा कि वे अपनी लागत भी नहीं निकाल पाएंगे।
मायूस हो चुके किसान परिवार
लगातार मेहनत करने के बाद भी उचित लाभ न मिल पाने का दुख उन किसानों के सिवा और कोई महसूस नहीं कर सकता। सत्तर साल की उम्र पार कर चुकी राजवती कहती हैं कि टमाटर की फसल उनके लिए गले में फंसी हड्डी बन गयी है, जिसे न तो निगल सकती हैं और न ही उगल। राजवती के घर से निकल कर जब हम खेतों की तरफ गए तो राजवती का बेटा सुनील अपने पिता और बच्चों के साथ टमाटर जमा करते नजर आया।
इतनी आती लागत
चेहरे पर उदासी लिए सुनील बताते हैं कि दो लाख कर्ज लेकर खेत में फसल उगाई थी। लेकिन अब जब फसल तैयार हो गई तो कोई टमाटर खरीदने को तैयार ही नहीं है। सुनील का कहना है कि एक बीघा टमाटर तैयार करने में दस से पन्द्रह हजार की लागत आती है। सुनील बताते हैं कि दिन भर मेहनत के बाद तैयार 30 किलो टमाटर के एक कैरेट की कीमत मंडियों में पच्चीस से तीस रुपये ही मिलती है। यह फसल की तुड़ाई में लगने वाली कीमत के बराबर होती है।
बच्चों के भविष्य को लेकर चिंतित
खेतों से टमाटर तोड़ कर फेंक रही वीरवती से जब हमने पूछा तो उन्होंने बताया कि वह सोच रही थीं कि मुनाफा होने पर बच्चों को अच्छे से पढ़ा-लिखा सकेंगी, लेकिन अब यह सपना ही लगता है।
न सरकार न अधिकारीयों ने ली सुध
पिछले कई महीनों से धूप-छांव सहकर फसल तैयार करने वाले किसान यह नहीं सोच पा रहे हैं कि फसल के बोने के लिए उन्होंने जो कर्ज लिया है, उसे किस तरह चुका पाएंगे। फिलहाल टमाटर किसान फसल का भाव न मिलने से बेहद परेशान है और भुखमरी और कर्ज में डूबने की कगार पर है।
Published on:
17 Jun 2018, 5:18 PM IST
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