
मुरैना में संत बने हवलदार की अनोखी संघर्षगाथा (फोटो सोर्स: RAJPUT FB Post)
Morena News : एक अफसर ने मामूली कहासुनी के बाद सीआरपीएफ के एक हवलदार की वर्दी उतरवा दी। यही नहीं कुछ समय बाद नौकरी से भी बर्खास्त करा दिया। लेकिन, देश सेवा के जुनून के चलते बर्खास्त शख्स ने अपने हक की लड़ाई लड़ी। इस दौरान वो मंदिरों पर संत बनकर भी रहे, ताकि परिवार की जिम्मेदारियां निभा सकें। पूरे 26 साल कोर्ट में केस लड़ते रहे और आखिरकार हाईकोर्ट से केस जीत गए। अब उन्होंने एक बार फिर संत का चोला उतारकर सीआरपीएफ की वर्दी पहन ली है। संघर्ष, आस्था और अपने हक की लड़ाई की अनोखी कहानी मध्य प्रदेश के मुरैना जिले के 50 वर्षीय गिरवरसिंह तोमर की है, जिसे जानकर आप हैरान रह जाएंगे।
जिले के छिछावली गांव में रहने गिरवरसिंह पुत्र दामोदरसिंह तोमर को देश सेवा के प्रेम के चलते सेना में भर्ती होने का जुनुन था। इसी जुनून के चलते किशोर अवस्था में ही उन्होंने सेना में भर्ती होने की तैयारियां शुरु कर दी थीं। कड़ी मेहनत के बाद साल 1991 में वो सीआरपीएफ में हवलदार के पद पर चुन लिए गए। यही नहीं, 8 साल तक उनकी नौकरी अच्छी खासी चलती रही। प्रमोशन लिस्ट में नाम आने ही वाला था, कि साल 1999 के शुरू में सीआरपीएफ के एक बड़े अफसर से किसी बात पर उनकी मामूली बहस हो गई।
गिरवरसिंह के अनुसार, हमारे अधिकारी काफी सीनियर थे, लेकिन तब भी हम हक पर थे, जिसके चलते हम अपनी बात पर अड़िग रहे, लेकिन ये बात उन्हें इतनी नागवार गुजरी कि, उन्होंने हमें न सिर्फ निलंबित कराया, विभागीय जांच बैठाकर 21 अक्टूबर 1999 को सीआरपीएफ से बर्खास्त ही करा दिया। कुछ समय तो मन काफी अशांत रहा, जिसके चलते काफी दिन के लिए खुद को घर में बंद कर लिया। लेकिन, घर का भरण पोषण भी हमारे ही कांधो पर था, जिसके चलते आगे चलकर परिवार पर आजीविका का संकट आ गया। कुछ समय गांव से बाहर जाकर मजदूरी भी की, लेकिन देश सेवा का मौका छूट जाने के कारण मन की अशांति बढ़ती गई।
फिर एक दिन अपने गांव छिछावली से एक किलोमीटर दूरी पर स्थित बारहद्वारी मंदिर चले गए। यहां चार-पांच साल रहे, ताकि मन को शांति मिल सके। लेकिन, यहां भी मन न लगने पर 20 साल पहले मुरैना के गुफा मंदिर आ गए। यहां संत बनकर मंदिर में पूजा-पाठ और मंदिर के पुजारी की सेवा में जुट गए। मंदिर के मुख्य पुजारी ने उन्हें गिरवरदास महाराज नाम दिया।
इसी बीच मुरैना आने के बाद भी सीआरफीएफ से बर्खास्तगी का दुख कम नहीं हुआ तो कार्रवाई के विरोध में उन्होंने इलाहबाद हाईकोर्ट में साल 1999 में केस दायर कर दिया। साल 2007 में कोर्ट ने उनके पक्ष में फैसला सुनाया, लेकिन सीआरपीएफ ने इस फैसले के खिलाफ स्टे ले लिया। इसके बाद गिरवरसिंह ने हाईकोर्ट की डबल बैंच में अपील कर दी, जहां कोर्ट ने 28 अगस्त 2025 को सीआरपीएफ को आदेश पारित किया कि, 3 महीने में गिरवरसिंह को दोबारा जॉइन किया जाए।
लेकिन, हाईकोर्ट का आदेश होने के 6 महीने बाद तक ज्वाइनिंग नहीं हुई। इसके चलते एक बार फिर कोर्ट के जरिए सीआरपीएफ को नोटिस भिजवाए गए। सीआरपीएफ ने 26 साल पुराने मामले की फाइलें ढूंढ़ने में समय लगने का तर्क देते हुए समय मांगा। अंत में बीते 26 अगस्त को सीआरपीएफ ने गिरवरसिंह को एक बार फिर उनकी वर्दी लौटाते हुए नौकरी पर रखने का आदेश दे दिया। फिलहाल, उनकी पोस्टिंग छत्तीसगढ़ के बीजापुर में की गई है। गिरवरसिंह का कहना है कि, अबतक अगर वो कार्यरत रहते तो कई बार प्रमोट हो चुके होते। ऐसे में अब वो आगे अपने प्रमोशन के लिए भी कानूनी लड़ाई लड़ेंगे।
गिरवरसिंह के अनुसार, कोरट ने उनकी बर्खास्ती को एक अफसर की सनक माना, जो गलत था। इस कार्रवाई को उन्होंने इलाहबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी। लेकिन, 26 साल चली इस कानूनी जंग ने उनके देश प्रेम के चलते सीआरपीएफ में वापस भर्ती होने के जुनून को कम नहीं किया। मंदिर में सेवाकार के रूप में कार्य करके गिरवारसिंह ने अपने परिवार के भरण पोषणा की जजिम्मेदारी भी संभाली गिरवरसिंह के परिवार में पत्नी मंजू देवी, दो बेटी शिवानी, राधा और दो बेटे अभिषेक व कृष्णा हैं। उन्होंने कड़ी जद्दोजहद करते हुए अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाई,जिसका परिणाम ये रहा कि, बड़ा बेटा अभिषेक एयरफोर्स का जवान है, जबकि, दूसरा पढ़ाई करते हुए देश सेवा के ही किसी कार्य में जाने का इच्छुक है। इसी के साथ गिरवरसिंह अपनी दोनों बेटियों की शादी भी कर चुके हैं।
इधर, गिरवरसिंह के परीश्रम के बारे में बताते हुए मुरैना गुफा मंदिर के महामंडलेश्वर शिवशरण महाराज महंत का कहना है कि, गुफा मंदिर पर गिरवरदास करीब 20 साल सेवा करते रहे। वो अपने पूजा-पाठ और भक्ति में मस्त रहते थे। बताते भी थे कि, पहले वो सीआरपीएफ में थे, किसी बात पर एक अफसर ने नौकरी से निकलवा दिया, केस चल रहा है। वो केस की तारीखों पर बड़ी फिक्र के साथ हर बार जाते थे। मंदिर प्रबंधन उनके देश प्रेम की भावनाओं की खासा सराहना करता और हम उनके परीश्रम को देख उन्हें इंसाफ मिलने की कामना करते रहे। जब वो केस जीते और ज्वाइनिंग के लिए बुलाया गया, तब उन्हें मंदिर छोड़ना था। लेकिन मंदिर से जाते वक्त वो बेहद भावुक थे। फिलहाल, हम सभी को प्रसन्नता है कि, उनका 26 साल का संघर्ष व तपस्या रंग लाई और उन्हें इंसाफ मिला।
Updated on:
02 Sept 2026 09:19 am
Published on:
02 Sept 2026 09:12 am
