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‘इस्लाम स्वीकारने की वजह से OBC वर्ग का लाभ नहीं छीन सकते’: बॉम्बे हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, कांग्रेस पार्षद की कुर्सी बची

Bombay High Court: बॉम्बे हाई कोर्ट ने उरण नगर परिषद की कांग्रेस नगरसेविका नंदा नामदेव म्हात्रे उर्फ नाहिदा इरफान ठाकुर के जाति प्रमाण पत्र को अवैध ठहराने वाले फैसले को रद्द कर दिया है।
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मुंबई

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Dinesh Dubey

Aug 31, 2026

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बॉम्बे हाई कोर्ट (Photo: IANS)

Inter Faith Marriage OBC Rules: अंतरधार्मिक विवाह करने या धर्मांतरण कर इस्लाम अपनाने मात्र से किसी व्यक्ति का ओबीसी (आगरी समुदाय) जाति का लाभ समाप्त नहीं होता। इसके साथ ही बॉम्बे हाई कोर्ट ने उरण नगर परिषद की कांग्रेस नगरसेविका (पार्षद) नंदा नामदेव म्हात्रे उर्फ नाहिदा इरफान ठाकुर की याचिका को स्वीकार कर लिया है। न्यायमूर्ति रियाज छागला और न्यायमूर्ति फिरदौस पूनावाला की पीठ ने रायगढ़ जिला जाति प्रमाण पत्र जांच समिति के उस फैसले को रद्द कर दिया है, जिसमें नगरसेविका के अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) प्रमाण पत्र को अवैध घोषित किया गया था।

न्यायमूर्ति रियाज छागला और न्यायमूर्ति फिरदौस पूनीवाला की खंडपीठ ने समिति को राज्य सरकार के 29 जनवरी 1983 और 3 जून 1996 के जीआर पर विचार करते हुए नंदा म्हात्रे को दोबारा सुनवाई का मौका देने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने समिति को 23 नवंबर तक नया फैसला लेने को कहा है।

मुस्लिम व्यक्ति से शादी और धर्म परिवर्तन के बाद उठा विवाद

नंदा म्हात्रे पिछले वर्ष हुए उरण नगर परिषद चुनाव में ओबीसी आगरी वर्ग से निर्वाचित हुई थीं। बाद में उनके जाति प्रमाणपत्र को लेकर विवाद खड़ा हो गया। इसके बाद जाति प्रमाणपत्र सत्यापन समिति ने 10 अगस्त को उनका जाति प्रमाणपत्र अवैध घोषित कर दिया था। समिति के समक्ष यह तर्क रखा गया था कि नंदा म्हात्रे ने मुस्लिम व्यक्ति से अंतरधार्मिक विवाह किया और इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया है। ऐसे में उन्हें ओबीसी आरक्षण का लाभ नहीं दिया जा सकता। समिति के इस फैसले के खिलाफ नंदा म्हात्रे ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

1983 के GR का दिया गया हवाला

याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में दलील दी गई कि अंतरधार्मिक विवाह करने से ओबोसी लाभ समाप्त नहीं होता। उन्होंने राज्य सरकार के पहले के शासन निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि 1983 के जीआर में यह लाभ सभी धर्मों के लोगों पर लागू किया गया था। 1979 के शासन निर्णय में यह प्रावधान हिंदू और सिख धर्मों के संबंध में था। इसके बाद 29 जनवरी 1983 के शासन निर्णय के जरिए इसे सभी धर्मों के लिए लागू किया गया। 3 जून 1996 के शासन निर्णय में भी इसी प्रावधान को दोहराया गया।

याचिका में आरोप लगाया गया कि इन शासन निर्णयों पर उचित विचार किए बिना ही समिति ने नंदा म्हात्रे का जाति प्रमाणपत्र अमान्य ठहरा दिया।

हाई कोर्ट ने समिति के फैसले पर लगाई रोक

जबकि, सरकारी वकील ने समिति के फैसले का बचाव किया, लेकिन हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता की दलील को स्वीकार करते हुए समिति का आदेश रद्द कर दिया और मामले की दोबारा सुनवाई के निर्देश दिए।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जब तक समिति नए सिरे से फैसला नहीं लेती, तब तक नगर परिषद नंदा म्हात्रे के नगरसेवक पद को लेकर कोई निर्णय नहीं लेगी। अगर समिति का नया फैसला उनके खिलाफ आता है, तो उसके बाद भी दो सप्ताह तक नगर परिषद उनके पद के संबंध में कोई कार्रवाई नहीं कर सकेगी। साथ ही 23 नवंबर तक समिति को अपना फैसला सुनाने के लिए कहा गया है।