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Passive Euthanasia: इच्छा मृत्यु पर महाराष्ट्र सरकार का बड़ा फैसला, हर अस्पताल में बनेगा मेडिकल पैनल

Ichha Mrityu: महाराष्ट्र सरकार ने इच्छा मृत्यु (Passive Euthanasia) से जुड़े मामलों में नई व्यवस्था लागू करने का फैसला किया है। अब किसी भी अस्पताल में ऐसे संवेदनशील मामलों पर एक व्यक्ति नहीं, बल्कि विशेषज्ञ डॉक्टरों का मेडिकल पैनल राय देगा।
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Euthanasia Cases ichha-mrityu

Euthanasia Cases ichha-mrityu

Maharashtra Passive Euthanasia Medical Panel: क्या कोई इंसान अपनी ऐसी बीमारी की स्थिति में, जहां से वापसी नामुमकिन हो, वेंटिलेटर और मशीनों के सहारे जबरन जिंदा रहने से इनकार कर सकता है? क्या हमें सम्मान के साथ इस दुनिया से विदा होने का अधिकार है? इन बेहद संवेदनशील और गंभीर सवालों पर महाराष्ट्र सरकार ने एक ऐतिहासिक कदम उठाया है।

सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक आदेश का पालन करते हुए राज्य सरकार ने अब निजी (प्राइवेट) अस्पतालों को भी 'निष्क्रिय इच्छामृत्यु' (Passive Euthanasia) और 'लिविंग विल' (Living Will) के मामलों को संभालने के लिए विशेष मेडिकल पैनल बनाने का निर्देश दिया है। सरकार के इस फैसले के बाद अब मरीजों को घिसटती हुई दर्दनाक जिंदगी से सम्मानजनक मुक्ति पाने का कानूनी अधिकार आसानी से मिल सकेगा।

सुप्रीम कोर्ट का आदेश और हरीश राणा का वह दर्दनाक मामला

यह पूरा मामला 11 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट द्वारा हरीश राणा बनाम भारत सरकार केस में दिए गए फैसले से जुड़ा है। पंजाब यूनिवर्सिटी में बीटेक के छात्र रहे हरीश राणा साल 2013 में एक इमारत की चौथी मंजिल की बालकनी से गिर गए थे। सिर में गंभीर चोट आने के कारण वह 13 साल तक वेजिटेटिव स्टेट (कोमा जैसी स्थिति) में रहे। आखिरकार, सुप्रीम कोर्ट ने उनके दर्द को समझा और एम्स (AIIMS), दिल्ली में उनके लाइफ सपोर्ट सिस्टम, कृत्रिम भोजन और पानी को हटाने की अनुमति दे दी, जिसके बाद उन्होंने अंतिम सांस ली। हरीश राणा देश के पहले ऐसे व्यक्ति बने जिन्हें कोर्ट ने पैसिव इच्छा मृत्यु की अनुमति दी।

क्या है पैसिव यूथेनेशिया और लिविंग विल?

पैसिव यूथेनेशिया (Passive Euthanasia): इसका मतलब है कि जब कोई मरीज लाइलाज स्थिति में हो, तो उसे कृत्रिम रूप से जिंदा रखने वाले वेंटिलेटर या लाइफ सपोर्ट सिस्टम को हटा लेना ताकि वह प्राकृतिक रूप से शांति से दम तोड़ सके।

लिविंग विल (Living Will): यह एक अग्रिम वसीयतनामा होता है, जिसमें कोई भी स्वस्थ व्यक्ति पहले से यह लिख कर दे सकता है कि अगर भविष्य में वह कभी ऐसी स्थिति में पहुंच जाए जहां उसके ठीक होने की उम्मीद न हो, तो उसे मशीनों के सहारे जबरन जिंदा न रखा जाए।

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