
AI प्रतीकात्मक फोटो
Adivasi water struggle:महाराष्ट्र के अपर वैतरणा बांध के ठीक ऊपर स्थित आदिवासी गांव दापुरमल की कहानी जल त्रासदी का एक जीवंत उदाहरण है। बांध के विशाल जलभंडार से घिरा होने के बावजूद, इस गांव के नसीब में बूंद-बूंद पानी के लिए संघर्ष लिखा है। यहां पानी लाना घर का कोई सामान्य काम नहीं, बल्कि हर दिन लड़ी जाने वाली एक 'जंग' है।
रिपोर्ट् के अनुसार जैसे ही गर्मियों की आहट होती है और गांव के प्राकृतिक वर्षा जल स्रोत सूखने लगते हैं, यहां की महिलाओं और छोटी बच्चियों का जीवन दूभर हो जाता है। उनकी दिनचर्या सूरज निकलने से पहले ही शुरू हो जाती है और काम के साथ पानी की तलाश में निकल जाते हैं।
आपको बता दें कि पानी की तलाश में यहां की महिलाओं और नन्ही बच्चियों को पथरीले और खड़ी ढलान वाले रास्तों पर 6 से 8 किलोमीटर तक पैदल चलना पड़ता है। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, सिर पर पानी से भरे भारी बर्तन (मटके) लेकर तपती धूप में ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर चढ़ना न केवल थकाने वाला है, बल्कि जोखिम भरा भी है। पानी लाने की इस एक यात्रा में कम से कम 4 घंटे का समय लगता है।
TIO की रिपोर्ट के मुताबिक यहां पर जीवन जीने के लिए छोटी बच्चियां, जिनकी उम्र अभी खेलने-पढ़ने की है, वे अपने शरीर के वजन से ज्यादा पानी का बोझ ढोने को मजबूर हैं। यह विडंबना ही है कि जो गांव एशिया के बड़े बांधों में से एक के बिल्कुल करीब बसा है, वहां की नई पीढ़ी का बचपन पानी ढोने की भेंट चढ़ रहा है।
दापुरमल की स्थिति विकास के दावों पर सवालिया निशान लगाती है। अपर वैतरणा बांध से मुंबई जैसे बड़े शहरों की प्यास बुझती है, लेकिन इसके मुहाने पर बैठे इन आदिवासियों को आज भी अपनी बुनियादी जरूरत के लिए मीलों की कठिन चढ़ाई करनी पड़ रही है। वहीं, इस मामले को लेकर ग्रामीणों का कहना है कि हर साल सर्दियां खत्म होते ही उनकी "जल-यात्रा" शुरू हो जाती है, जो मानसून आने तक इसी तरह जारी रहती है।
Updated on:
11 May 2026 06:39 pm
Published on:
11 May 2026 06:39 pm
