
Mumbai Migrant workers : कोरोना नहीं, घर की याद की बुखार सेे तप रहे प्रवासी श्रमिक
बिनोद पाण्डेय
मुंबई. घर से बार-बार फोन आ रहा हैं, दादी, मां, पिता और परिवार के सदस्य यही बोल रहे हैं कि काम धंधा नहीं है तो काहे वहां बइठे हो, चल आओ। लेकिन, घर वाले हमारी मजबूरी नहीं समझ रहे, ट्रेन नहीं, बस नहीं, गाड़ी-घोड़ा नहीं तो उड़ के जाएंगे क्या। बार-बार समझाता हूं, कोई समझने को तैयार नहीं है, मुझे देखने को सब तड़प रहे हैं, उनकी इसी तड़प से मैं घर जाना चाहता हूं। उत्तर प्रदेश के माऊ जिला के जयराम साहनी यह कहकर रो पड़ते हैं। पिछले कई वर्षों से वह मुंबई, सूरत जैसे महानगरों में रोजी-रोजगार के सिलसिल में प्रवासी हो चुके हैं। खाना बांटने के दौरान एक परिवार में वह चला गया जहां कोरोना पॉजिटिव था, बस फिर उन्हें भी उनके घर में कोरोन्टाइन कर दिया गया। यह वाक्या नहीं, ऐसे सैकड़ों-हजारों उदाहरण है, जो होम सिकनेस कह दे या परिवार से लगाव, घर जाने को बेचैन है।
रिश्तों की बुनावट कह दे या संकट की घड़ी में परिवार की जरूरत। मुंबई के हजारों प्रवासी श्रमिक अपने गांव लौटने को बेचैन है। बिहार, यूपी, एमपी, राजस्थान, उड़ीसा आदि शहरों के लाखों लोग इसके लिए कुर्ला और बांद्रा स्टेशनों पर पहुंच कर सोशल डिस्टेसिंग की धज्जियां भी उड़ा चुके हैं। काम दोबारा शुरू होने की अनिश्चतता उनके सब्र की परीक्षा ले रही है।
सरकारें भी सक्रिय, नेता कर रहे बंदोबस्त
प्रवासियों के इस छलकते दर्द को लेकर इन राज्यों की सरकारें भी इन्हें घर वापस लाने की कोशिश में जुटी है। महानगरों के नेता भी अपनी कोशिशों को बताने में लगे हैं, भले इसमें उनकी राजनीति क्यों ना छिपी हो। गुजरात में नवसारी के सांसद सी आर पाटील ने मूल गांव जाने को इच्छुक लोगों से बजाप्ता विवरण भी मंगवाने शुरू कर दिए तो उनके घर के बाहर सैकड़ों लोगों की कतारें लग गई।
गांव मेें अनाज क कमी नहीं
बिहार के बड़हरा प्रखंड के संतोष कहते हैं कि उनका काम-धंधा बंद है, सो घर जाने की इच्छा है, पर विवशता है। परिवार से दूर कमाने आए हैं, लेकिन काम नहीं तो रहने का क्या फायदा, फिलहाल परिस्थतिवश रुकना पड़ेगा। बनारस के समीप एक छोटे से गांव में रहने वाले हुकुमचंद पिछले 10 वर्ष से मुंबई में इलेक्ट्रिशियन का काम करते हैं, उनका काम बंद है, किराए के कमरे में दिन गुजार रहे हैं, राशन-पानी की कमी नहीं है, लेकिन वह भी जाने को बेचैन है कि यहां तो कुछ महीने निकल जाएंगे, लेकिन गांव में रहेंगे तो कम से कम चावल-गेहूं, अनाज की कमी नहीं होगी, कहीं से व्यवस्था हो जाएगी।
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प्रवासियों की चिंता
बिहार सरकार प्र्रवासियों की सतत चिंता कर रही है। प्रवासियों के खाते में हजार रुपए डाले जा रहे हैं, मुंबई जैसे महानगरों में बिहार फाउंडेशन समेत अन्य संस्थाओं की ओर से राहत कार्य जारी है। श्रमिकों के बिहार लौटने के संबंध में नीतिगत निर्णय की तैयारी की जा रही है, हम पूरी व्यवस्था करेंगे।
डॉ. अमरदीप, प्रदेश मीडिया प्रभारी, जदयू, बिहार
प्रवासियों को उनके गांवों में अनाज की दिक्कत नहीं है, काम भी दिक्कत नहीं होगी। योगी सरकार ने मनरेगा और दूसरे कामों का पिटारा खोल दिया है, सरकार की कोशिश है कि गांव लौटने वालों को गांव में ही रोजगार दिया जाए।
राजकुमार, भाजपा नेता, लखनऊ
गांवों में नहीं प्रवेश
महानगरों या अन्य राज्यों में काम करनेवाले कर्मचारियों-श्रमिकों को सीधे गांव में आने की अनुमति नहीं है। गांव में प्रवेश से पहले उन्हें पंचायत भवन में रहना होगा, जांच में स्वस्थ्य पाए जाने पर ही वे अपने घरों में जा पाएंगे।
सुरेन्द्र नाथ पाण्डेय, ग्रामीण, आरा, बिहार
Published on:
27 Apr 2020 07:00 am
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