
पीएम मोदी के साथ एकनाथ शिंदे और उनके बेटे श्रीकांत (Photo: IANS/File)
Shiv Sena UBT MPs Rebel: महाराष्ट्र की राजनीति में पिछले दो दिनों से चर्चा का केंद्र बने ‘ऑपरेशन टाइगर’ के पीछे आखिर असली रणनीतिकार कौन है? इसका स्पष्ट जवाब अब तक नहीं मिल सका है। लेकिन उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के बेटे और कल्याण से लोक सभा सांसद डॉ. श्रीकांत शिंदे ने इस पूरे ‘ऑपरेशन टाइगर’ में पर्दे के पीछे रहकर बेहद अहम भूमिका निभाई। बागी सांसदों के साथ तालमेल और पूरे समन्वय की मुख्य जिम्मेदारी उन्हीं के कंधों पर थी, जिसके चलते वे पिछले कुछ दिनों से दिल्ली में ही डेरा डाले हुए थे। यही वजह है कि उन्हें ऑपरेशन टाइगर का 'फील्ड कमांडर' माना जा रहा है।
बताया जा रहा है कि ऑपरेशन टाइगर को सफल बनाने के लिए श्रीकांत शिंदे कई दिनों से दिल्ली में सक्रिय थे। कथित तौर पर उद्धव ठाकरे गुट के सांसदों के साथ लगातार संवाद बनाए रखने, उनकी शंकाओं का समाधान करने और पूरे घटनाक्रम को गोपनीय रखने की जिम्मेदारी उन्हीं के पास थी।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि किसी भी बड़े राजनीतिक ऑपरेशन में सबसे बड़ी चुनौती आखिरी समय तक एकजुटता बनाए रखना होती है। इस मोर्चे पर श्रीकांत शिंदे ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
18 जून को शिवसेना ठाकरे गुट ने दिल्ली में अपने संसदीय दल की एक बेहद महत्वपूर्ण बैठक बुलाई थी। इस बैठक के लिए पार्टी की ओर से सभी सांसदों को बकायदा एक आधिकारिक 'व्हिप' भी जारी किया गया था। लेकिन इसके बावजूद लोकसभा के कुल नौ सांसदों में से केवल तीन सांसद ही इस बैठक में शामिल होने पहुंचे। बैठक में केवल अरविंद सावंत, अनिल देसाई और राजाभाऊ वाजे ही उपस्थित रहे। दूसरी तरफ, संजय जाधव, संजय देशमुख, नागेश पाटिल आष्टीकर, ओमराजे निंबालकर, भाऊसाहेब वाकचौरे और संजय दीना पाटिल समेत कुल छह सांसद इस बैठक से गैरहजर रहे।
दावा है कि बैठक से पहले कथित बागी सांसदों को एकजुट बनाए रखने के लिए लगातार संपर्क और समन्वय का काम श्रीकांत शिंदे की टीम ने किया।
मिली जानकारी के अनुसार, बगावत का रुख अपनाने वाले यह सभी छह सांसद दिल्ली के आलीशान 'द लीला' होटल में ठहरे हुए थे। ठाकरे गुट के नेताओं द्वारा इन सांसदों से किसी भी प्रकार का संपर्क साधने या फिर उनका मन बदलने की कोशिशों को पूरी तरह नाकाम करने के लिए, उन्हें बैठक शुरू होने से पहले ही दिल्ली से राजस्थान के जयपुर शिफ्ट कर दिया गया। इसके पीछे का मकसद बिल्कुल साफ था कि कोई भी बागी सांसद किसी भी हाल में ठाकरे गुट की बैठक में न पहुंच सके और उनका यह नया गुट पूरी तरह से एकजुट बना रहे।
इस पूरे बड़े राजनीतिक घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा 17 जून की रात को हुआ एक स्पेशल कॉन्फरेंस कॉल था। बताया जा रहा है कि उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने इन सभी छह बागी सांसदों के साथ फोन पर करीब 30 मिनट तक बेहद विस्तार से चर्चा की। सबसे खास बात यह रही कि जिन दो सांसदों ओमराजे निंबालकर और संजय दीना पाटिल को लेकर राजनीतिक गलियारों में सबसे ज्यादा संशय बना हुआ था, वे दोनों भी इस कॉल में जुड़े थे। बातचीत के दौरान एकनाथ शिंदे ने सभी को भरोसा देते हुए कहा कि पूरी शिवसेना आपके पीछे चट्टान की तरह खड़ी रहेगी, जिसके बाद इन सांसदों का निर्णय पूरी तरह पक्का हो गया।
मंगलवार की मध्यरात्रि के बाद से ही 'ऑपरेशन टाइगर' ने बहुत तेजी से रफ्तार पकड़ी। सांसदों को दिल्ली पहुंचाने का काम शुरू हुआ। रिपोर्ट्स के अनुसार, सबसे पहले नागेश पाटिल आष्टीकर 16 जून की तड़के सुबह करीब डेढ़ बजे एक प्राइवेट जेट से नांदेड़ से दिल्ली पहुंचे। इसके बाद संजय देशमुख और संजय जाधव भी एक अन्य निजी विमान से दिल्ली पहुंचे। भाऊसाहेब वाकचौरे हैदराबाद के रास्ते दिल्ली पहुंचे, जबकि संजय दीना पाटिल और मंत्री प्रताप सरनाईक भी बाद में दिल्ली में दाखिल हुए। दूसरी तरफ, एकनाथ शिंदे खुद मुंबई से जयपुर होते हुए तड़के सुबह करीब 3 बजे दिल्ली पहुंचे और उनके बाद सुबह साढ़े 4 बजे श्रीकांत शिंदे भी दिल्ली पहुंच गए। ओमराजे निंबालकर भी पुणे से सीधे दिल्ली के लिए रवाना हुए थे।
17 जून की सुबह करीब 7 बजे सांसद श्रीकांत शिंदे और ओमराजे निंबालकर ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के आवास पर जाकर उनसे मुलाकात की। इसके बाद सुबह लगभग सवा 10 बजे बाकी बचे पांचों सांसदों ने भी स्पीकर से मुलाकात कर उन्हें अपना आधिकारिक पत्र सौंप दिया। इस पत्र में सांसदों ने स्पष्ट रूप से उल्लेख किया है कि वे एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली मूल शिवसेना में शामिल हो रहे हैं, और इसके साथ ही उन्होंने लोकसभा में अपने बैठने की व्यवस्था को भी बदलने की मांग की। हालांकि अभी तक इस दावे की कोई आधिकारिक पुष्टि सामने नहीं आई है।
साल 2022 में शिवसेना के 40 विधायकों और 12 लोक सभा सांसदों की बगावत के बाद, अब इसे पार्टी के भीतर दूसरी सबसे बड़ी टूट बताया जा रहा है। गुरुवार को हुई संसदीय दल की बैठक में नौ में से छह सांसदों के न पहुंचने से अब इस बात पर लगभग मुहर लग चुकी है कि इन सांसदों ने उद्धव ठाकरे से अलग एक नई राजनीतिक राह चुन ली है।
Published on:
18 Jun 2026 04:44 pm
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