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महाराष्ट्र में बीमार पिता की जान बचाने के लिए कीचड़ में 3 KM बैलगाड़ी हांकता रहा बेटा, बीच सड़क पर ही डॉक्टर ने शुरू किया इलाज!

Chhatrapati Sambhajinagar:महाराष्ट्र के छत्रपती संभाजीनगर जिले के कन्नड तालुका में भारी बारिश और बदहाल सड़क के कारण एम्बुलेंस गांव तक नहीं पहुंच सकी। मजबूर बेटे ने अपने बीमार पिता को बैलगाड़ी में लिटाकर करीब तीन किलोमीटर कीचड़ भरे रास्ते से डॉक्टर तक पहुंचाया, जहां बीच सड़क पर ही प्राथमिक इलाज शुरू किया गया। घटना ने ग्रामीण बुनियादी ढांचे और स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
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मुंबई

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Imran Sheikh

Jul 09, 2026

Maharashtra News

समाचार से संबंधित AI Generated Photo

Maharashtra News: एक तरफ हमारा देश चांद-सूरज को छू रहा है, 5G स्पीड और 'डिजिटल क्रांति' के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं। लेकिन दूसरी तरफ, देश के ग्रामीण इलाकों से आज भी ऐसी तस्वीरें सामने आती हैं जो दिल दहला देती हैं और हमारे सिस्टम को कटघरे में खड़ा करती हैं। महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर जिले के कन्नड तालुका से एक ऐसा ही मामला सामने आया है। यहां एक बुजुर्ग मरीज को वक्त पर अस्पताल पहुंचाने के लिए एम्बुलेंस तक नसीब नहीं हुई। मुसलाधार बारिश की वजह से सड़क पर इस कदर कीचड़ फैला था कि सरकारी गाड़ियां तो दूर, डॉक्टर की बाइक तक नहीं निकल सकी। आखिरकार, एक बेबस बेटे ने अपने बीमार पिता की जान बचाने के लिए उन्हें बैलगाड़ी में लिटाया और कीचड़ को पार करते हुए तीन किलोमीटर का सफर तय किया।

बेटे ने लगाई गुहार, डॉक्टर ने निभाया फर्ज

मराठी टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, कन्नड तालुका के रुईखेडा गांव के रहने वाले बुजुर्ग रुस्तुम दहातोंडे की तबीयत अचानक बिगड़ गई। उनकी हालत चिंताजनक देख उनके बेटे रामू दहातोंडे घबरा गए। उन्होंने बिना वक्त गंवाए पास के हतनूर गांव के डॉक्टर विवेक अकोलकर को फोन किया और उनसे तुरंत गांव आने की गुहार लगाई। डॉक्टर ने भी इंसानियत दिखाई और अपनी बाइक उठाकर रुईखेडा गांव के लिए निकल पड़े।

लेकिन, हतनूर से रुईखेडा के बीच का रास्ता किसी नरक से कम नहीं था। भारी बारिश के कारण पूरी सड़क दलदल बन चुकी थी। कीचड़ इतना ज्यादा था कि डॉक्टर साहब की मोटरसाइकिल आगे बढ़ ही नहीं सकी और उन्हें आधे रास्ते में ही रुकना पड़ा।

बीच सड़क पर, बैलगाड़ी में ही शुरू हुआ इलाज

जब रामू को पता चला कि कीचड़ की वजह से डॉक्टर गांव तक नहीं पहुंच पा रहे हैं, तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। एक तरफ पिता की उखड़ती सांसें थीं और दूसरी तरफ कीचड़ से बंद रास्ता। लेकिन रामू ने हार नहीं मानी। उन्होंने तुरंत अपनी बैलगाड़ी निकाली, बीमार पिता को उसमें लिटाया और घुटने भर कीचड़ में बैलगाड़ी हांकते हुए निकल पड़े। करीब 3 किलोमीटर का दर्दनाक सफर तय करके रामू वहां पहुंचे जहां डॉक्टर रुके हुए थे। इसके बाद डॉक्टर विवेक अकोलकर ने भी बिना देर किए, बीच सड़क पर खड़ी उसी बैलगाड़ी को ही अस्पताल का बेड बनाया और बुजुर्ग रुस्तुम दहातोंडे का प्राथमिक इलाज शुरू किया।

कागजों पर मंजूर है सड़क, जमीन पर सिर्फ दलदल!

हैरानी की बात तो यह है कि हतनूर-रुईखेडा सड़क को बनाने की मंजूरी सरकारी फाइलों में बहुत पहले ही मिल चुकी है। लेकिन अफसरों की लापरवाही और ठेकेदारों के ढीले रवैये के कारण यह काम सालों से लटका हुआ है। सरकारें गांवों के विकास के चाहे जितने ढोल पीट लें, लेकिन जमीनी हकीकत यही है कि आज भी इमरजेंसी के वक्त लोगों को एम्बुलेंस की जगह बैलगाड़ी का सहारा लेना पड़ रहा है। इस घटना का वीडियो और तस्वीरें सामने आने के बाद से पूरे इलाके के ग्रामीणों में प्रशासन के खिलाफ भारी गुस्सा है। लोग सोशल मीडिया पर लगातार इस बदहाली पर सवाल उठा रहे हैं।

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