
नागौर के बालवा रोड डपिंग यार्ड के हालात
नागौर. प्रदेश के 309 नगरीय निकायों में चुनावी की तैयारियां चल रही है। नामांकन प्रक्रिया पूरी हो चुकी है और 9 व 11 सितम्बर को मतदान होना है। राजनीतिक दलों के साथ प्रत्याशी शहरों को साफ-सुथरा बनाने, नियमित कचरा उठाने और बेहतर सुविधाएं देने के वादे कर रहे हैं, लेकिन सरकार के विधानसभा में दिए आंकड़े इन दावों की जमीनी हकीकत पर बड़ा सवाल खड़ा कर रहे हैं। कई शहरों में कचरा उठाने के बाद भी उसके अंतिम निस्तारण की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। ऐसे में कचरा एक जगह से उठकर दूसरी जगह पहुंच रहा है, समस्या खत्म नहीं हो रही।
शहरों को साफ-सुथरा बनाने के वादों और सरकारी दावों के बीच राजस्थान की कचरा व्यवस्था खुद कचरे में दबती नजर आ रही है। प्रदेश के 309 नगरीय निकायों में रोजाना 10,108.43 टन कचरा निकल रहा है, लेकिन उसे निस्तारित करने के लिए फिलहाल संचालित प्लांटों की क्षमता महज 5,098.32 टन प्रतिदिन है। यानी रोज निकलने वाले कचरे का करीब आधा हिस्सा ही मौजूदा प्रसंस्करण क्षमता के दायरे में है। शेष 5,010.11 टन कचरे के लिए प्रभावी निस्तारण व्यवस्था का सवाल खड़ा है।
309 निकाय, प्लांट सिर्फ 175
स्वायत्त शासन विभाग के अनुसार प्रदेश में ठोस अपशिष्ट प्रसंस्करण के 175 प्लांट ही वर्तमान में कार्यरत हैं, जो 151 निकायों में संचालित हो रहे हैं और इनकी क्षमता 5,098.32 टन प्रतिदिन है। यानी प्रदेश के 309 नगरीय निकायों में से 158 में अभी प्लांट ही नहीं है। संख्या बताती है कि अभी भी बड़ी संख्या में निकायों को प्रभावी प्रसंस्करण व्यवस्था से जोडऩा बाकी है। इसके साथ प्लांट्स की क्षमता और प्रतिदिन निकलने वाले कचरे की मात्रा के बीच का अंतर भी बहुत बड़ा है, जो व्यवस्था की कमजोरी उजागर करता है।
निर्माणाधीन प्लांटों की लंबी कतार
सरकार अब भविष्य की क्षमता बढ़ाने की तैयारी कर रही है। प्रदेश में 202 ठोस अपशिष्ट प्रसंस्करण संयंत्र निर्माणाधीन हैं, जिनकी क्षमता 5,043.68 टन प्रतिदिन है। इसके अलावा 94 प्लांट के लिए निविदा प्रक्रिया चल रही है, जिनकी क्षमता 970.51 टन प्रतिदिन बताई गई है। सवाल यह है कि जब तक ये प्लांट धरातल पर उतरेंगे, तब तक रोज बढ़ते कचरे का क्या होगा?
2,001 करोड़ मंजूर, खर्च सिर्फ 281 करोड़
कचरा प्रबंधन के लिए धन की कमी का तर्क भी आंकड़ों के सामने कमजोर पड़ता है। पिछले तीन वित्तीय वर्षों में केन्द्र सरकार, राज्य सरकार और नगरीय निकायों के स्तर पर कुल 2,001.19 करोड़ रुपए स्वीकृत किए गए, लेकिन खर्च सिर्फ 281.44 करोड़ रुपए हुए। यानी स्वीकृत राशि का करीब 14 फीसदी ही धरातल पर खर्च हो सका।
गत तीन वित्तीय वर्षों में स्वीकृत एवं व्यय राशि
संबंधित - स्वीकृत राशि - व्यय राशि
केन्द्र सरकार - 562.28 - 119.54
राज्य सरकार - 527.65 - 79.70
निकाय - 911.26 - 82.21
कुल- 2001.19 - 281.44 (राशि करोड़ में)
कचरा उठ रहा, अलग नहीं हो रहा
कचरा प्रबंधन की सबसे कमजोर कड़ी घर से ही सामने आ रही है। सरकार ने प्रदेश में डोर-टू-डोर कचरा संग्रहण की औसत दर 82 फीसदी बताई है, लेकिन स्रोत पर गीले और सूखे कचरे को अलग करने की औसत दर महज 41 फीसदी है। यानी कचरा घरों से उठ तो रहा है, लेकिन उसका पृथक्करण आधे से भी कम स्तर पर है। जब गीला-सूखा कचरा एक साथ आएगा तो वैज्ञानिक प्रसंस्करण और रिसाइक्लिंग की पूरी प्रक्रिया प्रभावित होना तय है।
सरकार के निर्देश कागजों पर, कचरा सड़कोंपर
स्वायत्त शासन विभाग की अवर शासन सचिव डॉ. गरिमा शर्मा के अनुसार प्लास्टिक वेस्ट, ई-वेस्ट और कंस्ट्रक्शन एंड डिमोलिशन वेस्ट के पृथक संग्रहण, परिवहन, प्रसंस्करण और वैज्ञानिक निस्तारण के लिए निकायों को लगातार निर्देश दिए जा रहे हैं। इस संबंध में 27 मार्च से 20 जून 2026 की अवधि के बीच सभी निकायों और जिला कलक्टर्स को छह पत्र लिखे जा चुके हैं।
बड़ा सवाल
नगर निकाय चुनाव में साफ-सफाई के वादे फिर जोर पकड़ रहे हैं, लेकिन सरकारी आंकड़े बताते हैं कि राजस्थान की शहरी कचरा व्यवस्था अभी भी कागजों, निर्माणाधीन प्लांटों और लंबित निविदाओं के बीच उलझी हुई है। असली सवाल सरकार के निर्देशों का नहीं, उनके जमीन पर असर का है। यदि रोजाना 10 हजार टन से ज्यादा कचरा पैदा हो रहा है और वर्तमान में संचालित प्लांट सिर्फ करीब 5 हजार टन प्रतिदिन की क्षमता रखते हैं, तो बाकी कचरा आखिर कहां जा रहा है? शहरों में दिखाई देने वाले कचरे के ढेर इस सवाल का जवाब खुद देते नजर आते हैं।
Updated on:
07 Sept 2026 11:08 am
Published on:
07 Sept 2026 11:08 am
