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105 साल के बुजुर्ग कैदी को मिली आजादी, SC ने कहा- बाकी जिंदगी परिवार के साथ बिताएं

Rasik Chandra Mandal Case: सुप्रीम कोर्ट ने 105 साल के बुजुर्ग कैदी रसिक मंडल को स्थायी रूप से रिहा कर दिया है। 1988 के हत्या मामले में सजा काट रहे रसिक को कोर्ट ने परिवार के साथ जीवन बिताने की राहत दी। जानें क्या हैं पूरा मामला...
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भारत

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Pratiksha Gupta

Aug 22, 2026

life sentence release, Rasik Chandra Mandal case

105 साल के रसिक मंडल को सुप्रीम कोर्ट से उम्रकैद की सजा में राहत मिली (फोटो सोर्स- IANS)

Rasik Chandra Mandal Case: सुप्रीम कोर्ट ने 105 वर्ष के उम्रकैद के दोषी रसिक मंडल को आखिरकार सलाखों से आजादी मिल गई है। कोर्ट ने उसे जेल से स्थायी रूप से रिहा करने का आदेश दिया है। शीर्ष अदालत ने मामले की सुनवाई के दौरान साफ कहा कि इस उम्र में अब उन्हें जेल में रखने का कोई मतलब नहीं है। उन्हें अपनी जिंदगी के बचे हुए दिन अपने परिवार के साथ खुशी से बिताने चाहिए।

सुनवाई के दौरान जज बोले- 'क्या वह अभी जीवित हैं?'

शुक्रवार को जब यह मामला सुप्रीम कोर्ट की बेंच के सामने आया, तो जजों ने केस की फाइल देखते ही सबसे पहले सवाल पूछा कि क्या वह अभी जीवित हैं? कोर्ट ने कहा कि जब वह इतने ज्यादा बुजुर्ग हो चुके हैं, तो उन्हें बार-बार पैरोल देने के बजाय पूरी तरह से रिहा क्यों न कर दिया जाए। पश्चिम बंगाल सरकार के वकील ने भी कोर्ट की बात से सहमति जताई। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने रसिक मंडल की अर्जी मंजूर करते हुए उन्हें हमेशा के लिए जेल से आजाद करने का हुक्म सुना दिया।

68 साल की उम्र में हुए थे गिरफ्तार

रसिक चंद्र मंडल का जन्म साल 1920 में पश्चिम बंगाल के मालदा जिले के एक छोटे से गांव में हुआ था। 9 नवंबर 1988 को मालदा के मानिकचक पुलिस स्टेशन में हत्या का एक मामला दर्ज हुआ था। उस वक्त रसिक की उम्र 68 साल थी और पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया था। लंबी सुनवाई के बाद दिसंबर 1994 में निचली अदालत ने उन्हें हत्या का दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई।

24 साल बाद हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट से झटका

सजा के खिलाफ रसिक मंडल ने कलकत्ता हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। हालांकि, कानूनी प्रक्रिया की लंबी देरी के कारण 24 साल बाद 2018 में हाईकोर्ट ने उसकी याचिका खारिज कर दी। इसके बाद 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने भी उसकी याचिका को खारिज कर दिया था।

100 की उम्र में बेटे ने खटखटाया सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा

उम्र बढ़ने और बीमारियों की वजह से रसिक को जेल से बालुरघाट के एक सुधार गृह में शिफ्ट कर दिया गया था। जब रसिक करीब 100 साल के हुए, तब साल 2020 में उनके बेटे ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने पिता की ढलती उम्र और खराब तबीयत का हवाला देकर रिहाई की मांग की थी। सुप्रीम कोर्ट ने मानवीय आधार पर 29 नवंबर 2024 को रसिक को अंतरिम पैरोल दी थी। अब अदालत ने अपने उसी फैसले को स्थायी करते हुए 105 साल के बुजुर्ग को पूरी तरह से रिहा कर दिया है।