
कोर्ट (प्रतिकात्मक फोटो)
एक व्यक्ति जो कभी मुंबई बम धमाकों के आरोपियों में से एक रहा हो, वह सलाखों के पीछे से निकलकर अब वकील बन चुका है। कभी कोर्ट के कटघरे में आरोपी के तौर पर खड़ा था। वह अब कोर्ट में अपने पक्षकारों को बचाने के लिए दलील दे रहा है। 36 वर्षीय नदीम अख्तर अशफाक शेख ने हिंदुस्तान टाइम्स से बातचीत में बताया कि पिछले 14 साल उनके जीवन के सबसे बेहद कठीन रहे हैं। इस दौरान चाहे कोर्ट में सुनवाई के लिए जाना हो या ठाणे के लॉ कॉलेज में परीक्षा देनी हो, हर जगह वह पुलिस व सुरक्षाबल की निगरानी में रहते थे। काम खत्म होते ही उन्हें वापस जेल पहुंचा दिया जाता था।
नदीम अख्तर अशफाक शेख ने कहा कि 10 फरवरी को बॉम्बे हाईकोर्ट से जमानत मिलने के बाद बतौर वकील वह प्रोफेशनल जीवन की शुरुआत की। शेख ने कहा कि वह जेल के दिनों के दौरान LLB की पढ़ाई से हासिल किए गए कानूनी ज्ञान का इस्तेमाल दूसरे आरोपियों का बचाव करने के लिए करने के लिए करेंगे। नदीम ने कहा कि नामांकन प्रमाणपत्र के लिए आवेदन के बाद महाराष्ट्र-गोवा बार काउंसिल से प्रमाणपत्र मिलते ही वकील वाला काला गाउन पहनकर कोर्ट में पेश होना शुरू कर दिया।
नदीम ने मीडिया से बातचीत के दौरान बताया कि वकील वाला काला गाउन पहनकर कोर्ट में खड़ा होना। उनके लिए सबसे अधिक भावुक पल था। उन्होंने कहा कि कभी मैं आरोपी बनकर कटघरे में खड़ा रहता था। आज कोर्ट में वकील बनकर अपने मुव्वकिल का बचाव कर रहा था। नदीम ने कहा, 'एक सीनियर लॉयर जो मुझे अक्सर आरोपी बनकर कोर्ट में पेशा होता देखते थे, जब मैं वकील बना तो उन्होंने खुशी से 500 रुपए भेंट दिया।' नदीम ने कहा कि जेल में रहते हुए वकालत की पढ़ाई पूरी की। इसके लिए वह हमेशा भारतीय संविधान के प्रति शुक्रगुजार रहेंगे।
बिहार के दरभंगा में जन्मे नदीम 2002 में परिवार के साथ मुंबई आकर बायकुला में बस गए थे। पढ़ाई के साथ-साथ उन्होंने रिश्तेदार के सिम कार्ड कारोबार में हाथ बंटाया और बाद में बीकॉम में दाखिला लिया। इस दौरान एक पिज्जा डिलीवरी कंपनी में पार्ट-टाइम नौकरी भी की। 13 जुलाई 2011 को मुंबई सीरियल बम ब्लास्ट में मुंबई पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार किया। इस मामले में कुल 11 आरोपी बनाए गए थे।
नदीम ने कहा कि हमले के कुछ आरोपियों ने उनके रिश्तेदार के दुकान से सिम कार्ड खरीदे थे। इस वजह से उनकी पुलिस ने उन्हें शक के आधार पर गिरफ्तार किया। इसके बाद उनकी पूरी जिंदगी बदल गई। वह करीब 14 साल तक मुंबई के ऑर्थर रोड स्थित जेल के जेल की सलाखों के पीछे कैद रहे।
नदीम ने कहा कि जेल में ओपन यूनिवर्सिटी सुविधा का फायदा उठाते हुए BA में एडमिशन लिया। 2019 CET परीक्षा पास कर ठाणे के एक लॉ कॉलेज में एडमिशन लिया। इस दौरान उनकी पढ़ाई का पूरा खर्च जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने उठाया। उन्होंने कहा कि जब वे कोर्ट से परीक्षा देने के लिए ठाणे स्थित कॉलेज जाते थे। इस दौरान यात्रा का खर्च उन्हें वहन करना पड़ता था।
नदीम ने कहा कि 2017 में सेशन कोर्ट से जमानत खारिज होने के बाद हाईकोर्ट का रुख किया। उनका हाईकोर्ट में केस लड़ रहे अनस ने कहा कि अभियोजन पक्ष ने 400 से ज्यादा गवाहों से पूछताछ की योजना बनाई थी, लेकिन एक दशक में सिर्फ 167 गवाहों से ही पूछताछ हो सकी। इस दौरान नदीम के पिता का भी निधन हो गया। वकील अनस ने कहा कि हाई-प्रोफाइल मामलों में विचाराधीन कैदियों की जिंदगी बुरी तरह प्रभावित होती है। उनका करियर रुक जाता है। निजी जिंदगी पूरी तरह से तबाह हो जाती थी।
कोर्ट ने हाल में नदीम को जमानत देते हुए कहा कि नजदीकी भविष्य में मुकदमा पूरा होने की संभावना नहीं है। इसके बाद नदीम के लिए आपराधिक वकील बनने का रास्ता खुल गया।नदीम ने बताया कि जुलाई में उन्होंने पहला केस लिया, जो एक हत्या के आरोपी का था। इसके बाद तीन और मामलों में वे पेश हुए, जिनमें एक केस वे मुफ्त में लड़ रहे हैं। अब तक फीस के तौर पर उन्होंने 50,000 रुपये कमाए हैं।
Updated on:
7 Sep 2026, 1:07 PM IST
Published on:
7 Sep 2026, 1:07 PM IST
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