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जब आप के आंतरिक लोकपाल को ही बैठक में नहीं आने दिया गया, चर्चा से पहले लिए नेताओं के साइन

राघव चड्ढा के आप में 'टॉक्सिक माहौल' वाले बयान के बीच पढ़िए उन दो घटनाओं के बारे में जिनका जिक्र पूर्व नेता मयंक गांधी ने काफी पहले किया है।

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Arvind Kejriwal raghav chaddha news

दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल। (फोटो: ANI)

सोमवार (27 अप्रैल) को राज्य सभा के सभापति ने राघव चड्ढा सहित आम आदमी पार्टी (आप) के सात सांसदों के भाजपा में विलय को मंजूरी दे दी। 14वें साल में चल रही आप में यह सबसे बड़ी बगावत है। इसका सूत्रधार राघव चड्ढा को माना जा रहा है। छह सांसदों के साथ आप छोड़ कर भाजपा में जाने के लिए चड्ढा को बड़ी संख्या में लोग सोशल मीडिया पर भला-बुरा कह रहे हैं।

चड्ढा ने सोमवार को एक वीडियो जारी कर अपने कदम पर सफाई दी है। चड्ढा का कहना है कि पार्टी में 'टॉक्सिक माहौल' हो गया था, काम नहीं करने दिया जा रहा था, संसद में बोलने से रोका जा रहा था, इसलिए उन्होंने और छह सांसदों ने नए मंच के साथ जुड़ कर 'पॉज़िटिव पॉलिटिक्स' करने का विकल्प चुना।

राघव चड्ढा ने बताया कि कुछ सालों से उन्हें पार्टी का माहौल ठीक नहीं लगने लगा था, लेकिन 'टॉक्सिक माहौल' के बारे में कोई खास या नई जानकारी नहीं दी। वैसे, अरविंद केजरीवाल को छोड़ कर जाने वाले सभी लोग पार्टी चलाने के उनके रवैये को लेकर उनकी आलोचना करते रहे हैं और उन पर 'तानाशाही' बर्ताव करने का आरोप लगाते रहे हैं।

सालों पहले (नवम्बर 2015) आप से अलग हुए मयंक गांधी ने तो किताब (AAP & Down) लिख कर ऐसी कई घटनाओं का जिक्र किया है, जिनमें बताया गया है कि अरविंद केजरीवाल ने किस तरह मनमर्जी से फैसले लिए। ऐसी ही एक घटना प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव को पार्टी से निकाले जाने की है।

28 मार्च, 2015 को पार्टी की राष्ट्रीय परिषद (National Council) की मीटिंग तय थी। मीटिंग शुरू होने में कुछ ही घंटे बाकी थे। तभी एडमिरल (रि.) एल. रामदास को पार्टी महासचिव पंकज गुप्ता का एक संदेश मिला। रामदास आम आदमी पार्टी के आंतरिक लोकपाल थे। गुप्ता ने उनसे कहा था कि अनावश्यक वाद-विवाद से बचने के लिए अच्छा होगा कि वह बैठक में शामिल नहीं हों।

बैठक में नहीं आने के इस निर्देश से रामदास बड़े क्षुब्ध हुए। उन्होंने बैठक के लिए अपनी पूरी तैयारी भी कर ली थी। उन्होंने तय कर लिया था कि चुनावों में अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाने के लिए वह नेतृत्व को सामूहिक रूप से जिम्मेदार ठहराएंगे और नेताओं से निजी स्वार्थ से ऊपर उठ कर काम करने के लिए कहेंगे।

गांधी लिखते हैं, 'जब तक मैं पहुंचा, लोग बड़ी संख्या में 'योगेंद्र यादव मुर्दाबाद', 'प्रशांत भूषण मुर्दाबाद' के नारे लगा रहे थे। उनके हाथों में पोस्टर थे और वे दोनों को 'गद्दार' बुला रहे थे। स्पष्ट था कि सारी योजना पहले से बनाई जा चुकी थी।'
बक़ौल मयंक, इसी बीच अंदर एक कमरे में पार्टी के सीनियर वॉलंटियर्स काउंसिल के सदस्यों से एक प्रस्ताव पर दस्तखत करवा रहे थे। यह प्रस्ताव योगेंद्र और प्रशांत को हटाने का था। इसे पहले से तैयार करवा लिया गया था।

इसके बाद अरविंद भाषण देने आए। उन्होंने कहा कि योगेंद्र और प्रशांत ने पार्टी के साथ धोखा किया है। फिर शांति भूषण को देखते हुए उन्होंने अपने सुर बदल लिए। उन्होंने कार्यकारिणी सदस्यों से सवाल किया कि उनके साथ क्या किया जाए जो पार्टी से ऊपर किरण बेदी को रखते हों (शांति भूषण ही वह शख्स थे, जिन्होंने कहा था कि सीएम पद के लिए किरण बेदी योग्य उम्मीदवार रहेंगी)। केजरीवाल के यह कहते ही कपिल मिश्रा की अगुआई में कुछ कार्यकर्ता शांति भूषण पर चिल्लाने लगे- गद्दारों को हटाओ। कुछ पल के लिए तो ऐसी स्थिति बन गई कि लगने लगा कि कहीं 90 साल के शांति भूषण के साथ हाथापाई न हो जाए। पर, गनीमत रही कि ऐसा कुछ हुआ नहीं।

अरविंद का इमोशनल भाषण जारी रहा। अरविंद बोले, 'मैंने इस पार्टी के लिए खून-पसीना बहाया है। मैं इसे टूटने नहीं दूंगा। या तो योगेंद्र और प्रशांत को हटाइए या मुझे पार्टी के हर दायित्व से मुक्त कीजिए। इसके बाद वह बैठक से बाहर चले गए।

आप के सदस्य रमजान चौधरी ने केजरीवाल को रोकने की कोशिश की। उन्होंने उनसे कहा कि पार्टी का नेता होने के नाते उन्हें कार्यकर्ताओं की बातें सुननी चाहिए। मयंक लिखते हैं, 'मेरी आंखों के सामने अरविंद ने उन्हें झिड़क दिया। वहां कुछ बाउंसर्स आ गए। उन्होंने हाथ और पैर पकड़ कर रमजान को मीटिंग से बाहर कर दिया।' योगेंद्र, प्रशांत, प्रोफेसर आनंद कुमार और अजीत झा को राष्ट्रीय परिषद से बाहर करने का प्रस्ताव पढ़ा गया और कहा गया कि प्रस्ताव को 247 लोगों का समर्थन है।

मयंक गांधी ने एक और वाकये का जिक्र किताब में किया है। आप 2012 के अंत (नवम्बर) में बनी थी। इसके बाद लोक सभा का पहला चुनाव 2014 में हुआ था। इस चुनाव में पार्टी अच्छा नहीं कर पाई। दिल्ली में भी नहीं। दिल्ली की सातों लोक सभा सीटें बीजेपी ले गई।

2014 के लोक सभा चुनाव में AAP ने देश भर में 434 उम्मीदवार उतारे थे। इनमें से 414 की जमानत जब्त हो गई थी। पार्टी को इस चुनाव में 2.1% वोट और पंजाब से चार सीटें मिली थीं। 2013 में दिल्ली विधान सभा के अपने पहले ही चुनाव में AAP ने अच्छा प्रदर्शन (28 सीटें जीती) कर शीला दीक्षित को सत्ता से बाहर कर दिया था। हालांकि, पार्टी की सरकार कुछ ही समय के लिए रही।

2014 लोक सभा चुनाव के नतीजे आने के बाद आप की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की पहली ही बैठक में अरविंद केजरीवाल बुरी तरह भड़क गए थे। उस बैठक को याद करते हुए मयंक गांधी 'आप एंड डाउन' में लिखते हैं- पहले ही चुनाव में वोट के साथ-साथ कुछ सीटें भी मिल जाने पर वक्ता बधाई दिए जा रहे थे। अरविंद केजरीवाल अपना फोन देखते हुए बेमन से उन्हें सुन रहे थे और अंदर ही अंदर गुस्सा भी रहे थे। कुछ देर बाद तो वह फट पड़े। कहने लगे, 'मैं यहां हारे हुए लोगों की तरह बात करने नहीं आया और न ही जो मिला है उस पर खुशी मनाने की मेरी योजना है। हमें या तो जीतना है या फिर पार्टी पर ताला जड़ कर घर चले जाना है।'

संजू भाई और पंकज गुप्ता ने कहा कि भविष्य में हम तय प्रक्रियाओं का पालन कर और अच्छा करने की कोशिश करेंगे। इसके बाद तो अरविंद का गुस्सा और बढ़ गया। वह खड़े होकर चिल्लाने लगे, 'क्या प्रक्रिया तय करने के लिए पार्टी बनी है या पार्टी के लिए प्रक्रिया बनी है?'

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