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‘शिवसेना से लेकर अकाली दल तक’, कैसे एक-एक कर क्षेत्रीय दलों का वर्चस्व खत्म करती गई बीजेपी

How BJP Weakened Regional Parties: पश्चिम बंगाल में टीएमसी के संकट और शिवसेना-जेडीयू जैसे दलों की कमजोर होती स्थिति के बीच एक बार फिर यह बहस तेज हो गई है कि क्या बीजेपी की रणनीति ने देश में क्षेत्रीय दलों के वर्चस्व को खत्म कर दिया है।

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भारत

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Ashib Khan

Jun 22, 2026

BJP strategy against regional parties

पीएम नरेंद्र मोदी (बाएं) और अमित शाह (Photo-IANS)

BJP Strategy Against Regional Parties: पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव हारने के बाद ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस अपने सबसे बड़े संकट से गुजर रही है। विधानसभा में ही नहीं संसद में भी पार्टी टूट चुकी है। इसके अलावा शिवसेना के 6 सांसद भी शिंदे गुट में शामिल होने की चर्चा चल रही है। देश में क्षेत्रीय दलों को कमजोर करने में बीजेपी की रणनीति शामिल है।

दरअसल, बीजेपी को अच्छी तरह पता था कि राष्ट्रीय स्तर पर प्रभुत्व स्थापित करने की उसकी राह में सबसे बड़ी चुनौती क्षेत्रीय पार्टियां ही हैं। इसलिए उसने ऐसी रणनीतियां अपनाईं, जिनसे इन दलों को कमजोर कर उनकी राजनीतिक जमीन पर खुद कब्जा किया जा सके।

बीजेपी ने क्या अपनाई रणनीति

बता दें कि बीजेपी ने क्षेत्रीय दलों का इस्तेमाल अपनी ताकत बढ़ाने के लिए किया, लेकिन वह उन्हें अपने के लिए चुनौती भी मानती थी। इसलिए पार्टी ने एक रणनीति अपनाई कि पहले क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन करना है, फिर उसके वोट बैंक का इस्तेमाल कर खुद को मजबूत करना और अंत में उसी पार्टी को हाशिए पर धकेल दिया। 

आइए जानते है कि किन-किन राज्यों में बीजेपी ने पहले क्षेत्रीय दलों के साथ चुनाव लड़ा और फिर मजबूत होकर उनका वर्चस्व कम कर दिया… 

बीजेपी ने क्षेत्रीय दलों का वर्चस्व किया कम

महाराष्ट्र में 2014 तक शिवसेना बड़े भाई के रूप में उभरी, लेकिन बीजेपी ने अपनी ताकत बढ़ाई। 2014 विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने शिवसेना से ज्यादा सीटें जीतीं। इसके बाद शिवसेना और एनसीपी में टूट कराकर उसने अपनी स्थिति और मजबूत कर ली। वहीं अब शिंदे गुट के साथ सत्ता बरकरार रखते हुए बीजेपी ने महाराष्ट्र में अपना वर्चस्व बढ़ाया। क्षेत्रीय पहचान वाली शिवसेना का प्रभाव काफी घटा।

हरियाणा में भी बीजेपी ने लोकदल और हरियाणा विकास पार्टी के साथ गठबंधन किया, लेकिन 2014 के बाद खुद इतनी मजबूत हो गई कि क्षेत्रीय दल लगभग समाप्त हो गए।

पंजाब से ओडिशा और बिहार तक एक ही कहानी

पंजाब में अकाली दल के साथ गठबंधन ने बीजेपी को राज्य में पैर जमाने का मौका दिया। आज अकाली दल लगभग अप्रासंगिक हो चुका है। ओडिशा में बीजेपी ने बीजद के साथ गठबंधन करके अपनी ताकत बढ़ाई और बाद में उसे भी कमजोर कर दिया।

बिहार में भी ऐसा ही पैटर्न देखने को मिल रहा है, जहां नीतीश कुमार की जेडीयू लगातार कमजोर हो रही है और पहली बार बीजेपी का अपना मुख्यमंत्री राज्य की कमान संभाल रहा है।

क्षेत्रीय दलों का स्वर्णिम दौर कब रहा

देश की राजनीति में 1989 से 2014 तक क्षेत्रीय दलों का स्वर्णिम दौर माना जाता है। इन 25 वर्षों के दौरान केंद्र में सरकार बनाने के लिए क्षेत्रीय दलों का समर्थन अनिवार्य था। दरअसल, कांग्रेस ने बीजेपी को सत्ता से दूर रखने के लिए क्षेत्रीय दलों के साथ मिलकर संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) बनाया। वहीं बीजेपी ने भी महसूस किया कि क्षेत्रीय दलों के बिना वह सफल नहीं हो सकती। इसलिए उसने शिवसेना, अकाली दल, जनता दल, जनता दल (सेक्युलर) और लोकदल जैसे दलों के साथ गठबंधन किए।

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