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उद्योगों की चिमनियों से निकलने वाली कार्बन डाइऑक्साइड को अब उपयोगी उत्पाद बनाने के कच्चे माल के रूप में इस्तेमाल करने की तैयारी है। कार्बन कैप्चर, उपयोग और भंडारण (सीसीयूएस) तकनीक के जरिए उत्सर्जन से पहले कार्बन डाइऑक्साइड को अलग किया जाएगा। इसके बाद इससे निर्माण सामग्री, रसायन और ईंधन जैसे उत्पाद बनाए जा सकेंगे या इसे जमीन के भीतर सुरक्षित भंडारित किया जा सकेगा। केंद्र सरकार ने इस तकनीक को बढ़ावा देने के लिए पांच वर्षों में 20 हजार करोड़ रुपए की योजना बनाई है। राजस्थान और मध्यप्रदेश के औद्योगिक क्षेत्रों में भी इसके विस्तार की संभावनाएं हैं। केंद्रीय बजट 2026-27 में सरकार ने कार्बन कैप्चर, उपयोग और भंडारण को बढ़ावा देने के लिए पांच वर्षों में 20 हजार करोड़ रुपए आवंटित किए हैं। हालांकि, इस तकनीक का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल इसकी लागत, ऊर्जा की जरूरत, कार्बन के सुरक्षित परिवहन और भंडारण पर निर्भर करेगा। कार्बन डाइऑक्साइड को उत्पादों में इस्तेमाल करने से ही हर स्थिति में उत्सर्जन स्थायी रूप से खत्म नहीं होता। इसलिए तकनीक की सफलता इस बात से तय होगी कि वास्तव में कितना कार्बन उत्सर्जन रोका गया और कितनी मात्रा लंबे समय तक सुरक्षित रखी जा सकी।
फैक्ट्रियों और बिजली संयंत्रों से निकलने वाली गैसों में से कार्बन डाइऑक्साइड को अलग किया जाता है। इसके बाद इसे शुद्ध कर नमी हटाई जाती है और परिवहन के लिए दबाव देकर सघन किया जाता है।
कार्बन डाइऑक्साइड से कंक्रीट, यूरिया, ग्रीन मेथनॉल और अन्य रसायन बनाए जा सकते हैं। इसका उपयोग कुछ औद्योगिक प्रक्रियाओं में भी होता है। दूसरी ओर, इसे जमीन के नीचे स्थित उपयुक्त भूगर्भीय संरचनाओं, जैसे पुराने तेल-गैस भंडार, गहरे लवणीय जलभृत और बेसाल्ट चट्टानों में इंजेक्ट कर लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है।
नीति आयोग की सीसीयूएस नीति के मुताबिक इस तकनीक की जरूरत उन उद्योगों में ज्यादा है, जहां उत्सर्जन घटाना कठिन है। इनमें सीमेंट, इस्पात, तेल एवं गैस, पेट्रोकेमिकल, रसायन और उर्वरक उद्योग शामिल हैं। यूरिया और ग्रीन मेथनॉल जैसे उत्पादों में भी इसके उपयोग की संभावनाएं हैं।
राजस्थान और मध्यप्रदेश के लिए यह तकनीक इसलिए अहम हो सकती है, क्योंकि दोनों राज्यों में सीमेंट उद्योग के बड़े उत्पादन केंद्र हैं। अप्रेल तक देश में कार्बन कैप्चर और उपयोग की तीन परियोजनाएं मध्यप्रदेश, तमिलनाडु और महाराष्ट्र में संचालित है। वहीं छह निर्माणाधीन या क्रियान्वयन के चरण में थीं। जबकि 16 परियोजनाएं प्रस्तावित थीं। इनमें राजस्थान में दो और मध्यप्रदेश में एक परियोजना शामिल है। वहीं नीति आयोग की रिपोर्ट में राजस्थान के चित्तौडग़ढ़, सिरोही और पाली तथा मध्यप्रदेश के सतना जैसे सीमेंट औद्योगिक क्षेत्रों में कार्बन कैप्चर की संभावनाएं बताई हैं। चित्तौडग़ढ़ स्थित जेके सीमेंट में प्रस्तावित परीक्षण केंद्र की योजना में प्रतिदिन दो टन कार्बन डाइऑक्साइड एकत्रित करने और 0.4 टन का उपयोग हल्के कंक्रीट उत्पादों व ओलेफिन बनाने की पहल की गई। इसमें राष्ट्रीय सीमेंट एवं भवन सामग्री परिषद और आइआइटी रुड़की की भागीदारी रही।
मई 2026 में आइआइटी बॉम्बे में भारत की पहली एकीकृत कार्बन कैप्चर, उपयोग और भंडारण फील्ड प्रयोगशाला का उद्घटन किया गया। इस स्वदेशी संयंत्र में औद्योगिक उत्सर्जन और परिवेशी हवा से प्रतिदिन तीन टन तक कार्बन डाइऑक्साइड एकत्रित करने की क्षमता है। इसमें गैर-पेयजल का इस्तेमाल कर कार्बन डाइऑक्साइड को कार्बोनेट और बाइकार्बोनेट जैसे उपयोगी उत्पादों में बदला जा सकता है।
Published on:
31 Oct 2026, 3:00 AM IST
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