
डीके शिवकुमार सीएम पद की शपथ लेंगे (Photo-IANS)
Karnataka New CM DK Shivakumar: कर्नाटक में बुधवार को डीके शिवकुमार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने जा रहे हैं। डीके का एक छोटे से गांव से सीएम की कुर्सी तक पहुंचने का सफर आसान नहीं रहा है। बताया जाता है कि डीके शिवकुमार कभी हार मानने वालों में से नहीं है। बचपन में खेल से लेकर सत्ता के खेल तक डीके ने कभी हार नहीं मानी और यही वजह ने उन्हें सीएम की कुर्सी तक पहुंचाया है।
बेंगलुरु से करीब 80 किलोमीटर दूर स्थित छोटे से गांव डोड्डालहल्ली से उनका सफर शुरू हुआ था। शिवकुमार बचपन से ही बेहद जिद्दी और अपनी मंजिल को हासिल करने वाले स्वभाव के थे। वे अपने दोस्तों के साथ गिल्ली-डंडा, कबड्डी, गोली और अन्य पारंपरिक खेल खेलते थे। यदि किसी खेल में हार जाते, तो तब तक दोबारा खेलते रहते जब तक जीत हासिल न कर लें। घर भी तभी लौटते थे जब जीत उनके नाम हो जाती थी।
डीके शिवकुमार के बारे में उनके बचपन के दोस्तों ने भी बहुत बातें बताई। डीके के दोस्त एन.बी. बसवराजू और चिक्का स्वामी ने कहा कि पढ़ाई के लिए बेंगलुरु जाने के बाद भी शिवकुमार महीने में दो बार गांव जरूर आते थे और गर्मियों की छुट्टियां दोस्तों के साथ बिताते थे।
डीके शिवकुमार ने छात्र राजनीति से अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत की थी। हालांकि उनके करीबी मानते थे कि वे राजनीति में बड़ा मुकाम हासिल करेंगे, लेकिन मुख्यमंत्री बनेंगे, इसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी।
डीके शिवकुमार कनकपुरा से विधायक हैं। 2008 में यहां से चुनाव जीतने के बाद डीके ने तस्वीर बदल दी। सड़कें, पार्क और सिंचाई परियोजनाओं के जरिए उन्होंने विकास को नई दिशा दी। ग्रामीणों को भरोसा है कि मुख्यमंत्री बनने के बाद वे पूरे कर्नाटक में इसी तरह विकास कार्यों को आगे बढ़ाएंगे और एक स्थायी राजनीतिक विरासत छोड़ेंगे।
डीके शिवकुमार की गांव के पातालदम्मा मंदिर, मरम्मा मंदिर और पहाड़ी पर स्थित शिवलादप्पना मंदिर में उनकी गहरी आस्था रही है। बताया जाता है कि मुख्यमंत्री बनने की मनोकामना के चलते उन्होंने कई वर्षों से मांसाहार का त्याग कर रखा था। उनके करीबी मानते हैं कि मेहनत और ईश्वर में विश्वास का फल उन्हें अब मिला है।
डीके शिवकुमार की राजनीतिक यात्रा में उनके भाई डीके सुरेश की भूमिका बेहद अहम रही है। दोनों भाइयों को लोग 'राम-लक्ष्मण' की जोड़ी कहते हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार, शिवकुमार का कोई भी बड़ा राजनीतिक फैसला सुरेश की सलाह के बिना नहीं लिया जाता था। मुख्यमंत्री बनाने के लक्ष्य को लेकर सुरेश ने वर्षों तक लगातार मेहनत की और हर कदम पर अपने भाई का साथ दिया।
Updated on:
03 Jun 2026 11:00 am
Published on:
03 Jun 2026 11:00 am
