
प्यार के पागलपन में मुस्लिम बन गया था यह गैंगस्टर (एक प्रतीकात्मक AI इमेज)
वेंकटेश बग्गा रेड्डी बड़ा ही खूंखार अपराधी था। वह खुद को मां काली का कट्टर भक्त बताता था। उसे खून पीने का नशा था। वह चावल में भी खून मिला कर खाता था। जानवरों का खून नहीं मिलने पर अपना खून ही चावल में मिला देता था। वह कच्चा मांस भी खाता था। पुलिस से पूछताछ में भी वह तभी कुछ उगलता था जब उसे बकरी का खून पीने के लिए दिया जाता था।
बग्गा मूल रूप से मुशिराबाद (हैदराबाद) का रहने वाला था। वह पढ़ाई नौवीं में ही छोड़ कर वेल्डर का काम करने लगा था। 1989 में किसी हाजी भाई ने उसे अपना बॉडीगार्ड बना लिया और वह बंबई (अब मुंबई) आ गया। वह मुलुंड के एक बार में नौकरी करने लगा।
बाद में चेंबूर के एक बार में डिंपल दादा की नजर उस पर पड़ी। उसने उसे अपने गैंग में ले लिया। उसे एक बड़े कारोबारी के बेटे को अगवा करने का काम दिया गया। बदले में एक लाख रुपये देने की बात हुई। लेकिन, रेड्डी ने यह काम नहीं किया और हैदराबाद भाग गया।
बग्गा मुसलमानों को पसंद नहीं करता था। 1992-93 के दंगों में उसने अनेक मुस्लिमों की जान ली। इसके लिए उसे गिरफ्तार किया गया। सितंबर, 1993 में जमानत पर छूटने के बाद वह एक बार फिर बंबई आया। उसे एक बार फिर मुलुंड के एक बार में नौकरी मिली। वहां वह तमाम गैंगस्टर्स के संपर्क में आया।
बग्गा को मुसलमानों से नफरत थी, लेकिन उसे इश्क भी एक मुस्लिम लड़की से ही हुआ। लड़की का नाम था शहनाज। उसकी मोहब्बत में वह इस कदर पागल हुआ कि धर्म भी बदल लिया। उसने शहनाज से शादी की। इसका असर यह हुआ कि खून-खराबे को लेकर उसका जुनून थोड़ा कम हुआ।
बग्गा बंबई के सबसे महंगे शूटर्स में से एक था, लेकिन शादी के बाद वह मार-काट कम करके दूसरे तरह के गुनाह करने लगा। पकड़ा गया तो हिरासत से भाग निकला। वह मलेशिया चला गया। वहां जाकर छोटा राजन के गिरोह में शामिल हो गया और ड्रग्स का कारोबार करने लगा। लेकिन, यह साझेदारी ज्यादा टिकी नहीं।
भारत लौट कर बग्गा ने हैदराबाद में अपना गैंग बनाया और अपहरण-फिरौती जैसे धंधे करने लगा। खास बात यह थी कि वह इस अवैध धंधे में भी पैसों का लेनदेन चेक से करता था। 2008 में एक साथी ने ही उसके साथ दगाबाजी की और पुलिस की कार्रवाई में बग्गा मारा गया।
दुबला था तो नाम पड़ गया सलीम हड्डी: सलीम हड्डी अबू सलेम गैंग का खतरनाक शूटर था। सलेम अंडरवर्ल्ड का पहला माफिया डॉन था, जिसने उत्तर प्रदेश से शूटर लाना शुरू किया था। वह इन लड़कों को उन बिल्डर्स को डराने-धमकाने के लिए भेजता था जो पैसे देने में आनाकानी करते थे। इसके लिए बिल्डर के दरवाजे पर फायरिंग करवाना, शीशे चटका देना या ऑफिस में घुस कर मैनेजर को डराने के लिए बंदूक लहराना जैसी हरकतें करवाता था। बाद में इन शूटर्स को कत्ल करने के लिए भी भेजा जाने लगा। इन लड़कों का मुंबई में अपराध का कोई रिकॉर्ड होता नहीं था, तो पुलिस के लिए कुछ पता करना टेढ़ी खीर हो जाता था। इन गुर्गों से सलेम एक के बाद एक कत्ल करवा रहा था और पुलिस लाचार लग रही थी।
सलेम का खौफ बढ़ता ही जा रहा था। यह देख कर नए-नए शूटर्स के बीच उसके गैंग में शामिल होने की होड़ भी बढ़ रही थी।
सलेम के गुर्गों ने उसे एक नए 'मुर्गे' की खबर दी। नाम था ओम प्रकाश कुकरेजा। चेंबूर के कुकरेजा बिल्डर्स का मालिक। पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक कुकरेजा राजन गैंग को पैसे देता था। सलेम ने उससे पैसे मांगे तो उसने मना कर दिया और अपने दफ्तर की सुरक्षा बढ़ा दी।
सलेम ने अपने दो शूटर्स को कुकरेजा का 'काम तमाम' करने का ऑर्डर दे दिया। ये दो शूटर्स थे सलीम हड्डी और राजेश इग्वे।
18 सितंबर, 1995 को सलेम के ये दोनों शूटर्स कुकरेजा के दफ्तर में घुस गए। उन्होंने न केवल कुकरेजा को मार दिया, बल्कि उस वक्त ऑफिस में मौजूद कर्मचारियों की भी जान ले ली।
सलीम और राजेश को सलेम गैंग में शामिल हुए ज्यादा दिन नहीं हुए थे। सलीम का शरीर कंकाल जैसा था। इसीलिए उसके नाम में 'हड्डी' जोड़ा गया था। इग्वे पुलिस अफसर था। उसे नौकरी से सस्पेंड किया गया तो आलीशान ज़िंदगी जीने की चाह में वह सलेम गैंग में शामिल हो गया था। लेकिन, उसकी ज़िंदगी ही नहीं बची। कुकरेजा के कत्ल के बाद पुलिस ने इन दोनों को 'एनकाउंटर स्टाइल' में ढेर कर दिया।
एक और सलीम की कहानी: यह सलीम असल में सानिया भंगी था, लेकिन मुस्लिम लड़की से शादी के बाद धर्म बदल कर सलीम बन गया था। वह कमाठीपुरा में अंडरवर्ल्ड डॉन आलमजेब-अमीरजादा के हेडक्वार्टर का मुलाजिम था। वह ऑफिस की साफ-सफाई और बाकी व्यवस्था संभालता था। नामी फिल्म प्रोड्यूसर मुशीर अहमद को अगवा करके इसी ऑफिस में रखा गया था।
मुशीर को फिरौती के लिए वर्ली के भीड़-भाड़ वाली जगह से दिन-दहाड़े उठा लिया गया था। पुलिस को भनक तक नहीं लगी। न वारदात के पहले और न ही बाद में। पुलिस को इस वारदात की जानकारी तभी हुई जब एक्टर दिलीप कुमार खुद पुलिस के पास इस मामले को लेकर गए। की रिपोर्ट लिखवाई। मूशीर उस फिल्म (शक्ति) के प्रोड्यूसर थे जिसमें अमिताभ बच्चन और दिलीप कुमार एक साथ थे।
केस की जांच के सिलसिले में पुलिस आलमजेब के ऑफिस पहुंची तो वहां केवल सलीम ही मिला। पुलिस उसे उठा लाई। थोड़ी मशक्कत के बाद जब उसने कबूल कर लिया की मुशीर को अगवा करने के बाद उसी बिल्डिंग में रखा गया था। उसने आलमजेब को पकड़ने के लिए जरूरी सुराग भी पुलिस को दिए।
दाऊद इब्राहिम ने गवली गैंग पर ताबड़तोड़ हमला बोल कर उसके कई लोगों को मार दिया था। उधर से भी बदला लेने की ठानी गई। एक बार तो एक ही अटैक में दाऊद के गुर्गों ने गवली गैंग के छह मजबूत लोगों को ढेर कर दिया था। तब उधर से भी करारा जवाब देने की ठानी गई और इब्राहिम पारकर को मारने का फैसला हुआ।
पारकर जूनियर फिल्म आर्टिस्ट था और नागपाड़ा में कादरी होटल का मालिक भी था। 26 जुलाई, 1992 को दोपहर बाद वह होटल से बाहर निकला। उसका ड्राइवर सलीम पटेल भी साथ ही था। होटल के बाहर चार लोग तेजी से उसकी ओर आए। उन्होंने शर्ट के अंदर से बंदूकें निकालीं और दोनों को गोलियां मार कर भाग गए। पारकर पटेल से मदद के लिए चिल्लाते हुए गिर पड़ा। जब तक उसे अस्पताल ले जाया गया, तब तक जान जा चुकी थी।
Updated on:
30 Apr 2026 08:41 pm
Published on:
30 Apr 2026 08:03 pm
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