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स्मृति ईरानी को बीजेपी नेता ने शूटिंग करते देखा और तय कर लिया कि इसे पार्टी में लाना है

स्मृति ईरानी की भाजपा में एंट्री कैसे हुई? आते ही उन्हें कौन सा बड़ा काम मिला? अगले ही साल नरेंद्र मोदी का इस्तीफा मांग कर उन्होंने जो बड़ा विवाद खड़ा कर लिया, उससे कैसे निकलीं? और भी बहुत कुछ...पढ़िए इस आलेख में।
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Smrit Irani always enjoys Narendra Modi's blessings

2005 में पहली बार नरेंद्र मोदी ने स्मृति ईरानी के सिर पर हाथ रखा था। तब से हमेशा उनका आशीर्वाद बना ही रहा है। (Photo Source: AI)

भाजपा में स्मृति ईरानी का 23 साल का सफर जितना शानदार रहा, उतना बहुत कम नेताओं का रह पाता है। खास बात यह है कि 2003 में भाजपा में शामिल होने के बाद से ही उन्हें एक के बाद एक बेहतर अवसर मिलते गए। इस बीच कई मौके ऐसे आए, जब कई लोगों को लगा कि भाजपा में अब स्मृति यादों में ही रह जाएंगी। लेकिन, हर बार उन्होंने नए सिरे से वापसी की। 2024 लोक सभा चुनाव हारने के बाद अगस्त 2026 में पार्टी महासचिव बन कर एक बार फिर उन्होंने ऐसा ही किया है।

स्मृति जब भाजपा में आईं तो वह दौर भले ही अटल-आडवाणी का था, लेकिन नरेंद्र मोदी भी पार्टी के बड़े नेता थे। वह अटलजी के कामों से प्रभावित थीं और इसीलिए 2003 में उन्होंने भाजपा जॉइन करने की पेशकश सहज स्वीकार कर ली थी।

ऐसे भाजपा में आई थीं स्मृति ईरानी

यह बात सही है कि अटल बिहारी वाजपेयी से प्रभावित होकर ही स्मृति भाजपा में आई थीं। यह उन दिनों की बात है, जब स्मृति की गर्भ में उनकी बेटी जोइश पल रही थीं। स्मृति उन दिनों टीवी की बड़ी स्टार थीं। एकता कपूर के धारावाहिक 'क्योंकि सास भी कभी बहू थी' की तुलसी वीरानी का उनका किरदार घर-घर में औरतों की जुबान पर था। बेटी को जन्म देने के लिए छुट्टी लेने से पहले वह ज्यादा से ज्यादा एपिसोड की शूटिंग निपटा लेना चाहती थीं। एक दिन मुंबई के पास दहानु में पति के फार्म हाउस पर उन्होंने शूटिंग के लिए पूरी टीम को बुलाया हुआ था। वहां शूटिंग देखने के लिए भीड़ जमा हो गई। दर्शकों में एक थीं मनीषा चौधरी। चौधरी भाजपा की नेता थीं। उन्होंने तय किया कि वह स्मृति को भाजपा में आने का न्योता देंगी। एक दिन उन्होंने कुछ महिला नेताओं को साथ लिया और स्मृति के घर पहुंच गईं। उन्होंने अपना परिचय दिया और भाजपा के बारे में बताया। स्मृति ने कहा कि वह अटलजी के काम से बहुत प्रभावित हैं। इस तरह 2003 में एक दिन प्रमोद महाजन, गोपीनाथ मुंडे और मुख्तार अब्बास नकवी की मौजूदगी में स्मृति भाजपा की सदस्य बन गईं।

आते ही भाजपा ने काम पर लगाया...दिन में प्रचार, रात में शूटिंग

2003 में राजस्थान में विधान सभा चुनाव हो रहे थे। भाजपा ने वसुंधरा राजे को राजस्थान का प्रमुख बना कर राज्य की राजनीति में उतारा था। यह निर्णय कई नेताओं को रास नहीं आया। प्रमोद महाजन को राज्य भाजपा में बगावत की भनक लग गई थी। उन्होंने महाराष्ट्र से करीब सौ युवा भाजपा कार्यकर्ताओं को राजस्थान भेजा। उनमें से एक स्मृति भी थीं। जोइश तब सिर्फ दो महीने की थी। इसलिए महाजन उन्हें भेजने में झिझक रहे थे, लेकिन स्मृति तैयार थीं।

स्मृति ने एक इंटरव्यू में बताया था, 'मैं पूरी रात शूटिंग करती। तड़के घर आती, बेटी को दूध पिलाती, घर पर सारा इंतजाम दुरुस्त करती और 8.30 बजे हवाईअड्डे पर होती। दिन भर प्रचार करने के बाद शाम 6.0-6.30 बजे घर लौट कर नहाती और बच्ची को दूध पिला कर शूटिंग के लिए निकल जाती।'

बीजेपी में आने के अगले ही साल खड़ा किया बड़ा विवाद

भाजपा ने स्मृति की कड़ी मेहनत देखी और एक साल के भीतर ही उन्हें महाराष्ट्र महिला मोर्चा का उपाध्यक्ष बना दिया। लेकिन, 2004 में उन्होंने गुजरात में एक बयान दिया जो नरेंद्र मोदी के खिलाफ था। मोदी तब गुजरात के मुख्यमंत्री थे। गुजरात दंगों को लेकर उन दिनों उनकी काफी आलोचना हुआ करती थी। 2004 के लोक सभा चुनाव में बीजेपी की हार को भी इससे जोड़ा जा रहा था। इसी क्रम में स्मृति ने कहा, 'नरेंद्र मोदी इस्तीफा दे देते तो यह साबित होता कि भाजपा वाकई बाकी पार्टियों से अलग है।' उन्होंने इसके लिए अटल जयंती (25 दिसंबर) के दिन आमरण अनशन शुरू करने की भी घोषणा कर दी। वैसे कुछ ही घंटों बाद उन्होंने बयान वापस भी ले लिया। कहा जाता है कि उनसे कहा गया था कि बयान वापस नहीं लेने की स्थिति में अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी।

मोदी के खिलाफ बयान देने के बाद कई नेताओं को लगा कि स्मृति को इसकी कीमत चुकानी होगी, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। दो महीने बाद एलके आडवाणी के घर एक कार्यक्रम में वह मोदी से मिलीं तो उनके पैर छुए। मोदी ने भी स्मृति के सिर पर हाथ रख दिया। 'कारवां' मैगजीन की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इसके पीछे आडवाणी ही थे। इस कार्यक्रम से पहले स्मृति दिल्ली में आडवाणी और गुजरात में मोदी से मिल चुकी थीं।

12 साल बाद खोला था मोदी से मुलाकात का राज

2016 में बरखा दत्त को दिए एक इंटरव्यू में स्मृति ने मोदी का इस्तीफा मांगने संबंधी बयान पर सार्वजनिक रूप से अपनी स्थिति स्पष्ट की थी। उन्होंने कहा था, 'तब मैं राजनीति में बच्ची थी, मोदी जी बीजेपी के स्टार थे। वह मुझे पार्टी से बरखास्त करवा सकते थे या मुझे आगे बढ़ाने से रुकवा सकते थे। लेकिन, उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया। वह मेरे साथ बैठे और पूछा- मुझे बताओ कि तुम इस नतीजे पर पहुंची कैसे?' बक़ौल स्मृति, उन्होंने जवाब दिया कि वह मीडिया में छपी बातों के प्रभाव में आ गई थीं। तब मोदी ने कहा था, 'मुझे अखबारों के संपादकीय के आधार पर मत परखो। मेरे काम के आधार पर मेरा मूल्यांकन करो। मुझे तुमसे माफी नहीं चाहिए। मेरे किसी एक काम को देख कर उसे सफल बनाने में मदद कर सको तो पार्टी के लिए यही करो।

लोग कहते थे- आपको गोली मार सकते हैं, पति ने कर रखी थी बचाव की तैयारी

मोदी के खिलाफ बयान देने के बावजूद स्मृति के प्रति मोदी की नाराजगी कभी जाहिर नहीं हुई। 2011 में स्मृति को पहली बार राज्य सभा भेजा गया तो गुजरात से ही भेजा गया और उनके नामांकन के वक्त मोदी भी मौजूद रहे। 2014 के लोक सभा चुनाव में जब मोदी भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार थे तो स्मृति को भी लोक सभा चुनाव लड़ाया गया। वह भी राहुल गांधी कि खिलाफ, अमेठी से। स्मृति चुनाव हार गईं, फिर भी मोदी ने उन्हें अपनी पहली कैबिनेट में जगह दी।

स्मृति के पहले लोक सभा चुनाव के बारे में निधि शर्मा ने अपनी किताब 'She, The Leader, Women In Inian Politics' में उनके ही हवाले से लिखा है कि तब कई लोगों ने उनसे कहा था कि प्रचार के दौरान उन पर गोली चल सकती है। यह बात उन्होंने पार्टी में किसी को नहीं बताई, लेकिन पति जुबिन को मालूम थी। जुबिन ने ऐसी स्थिति में तुरंत गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल पहुंचाने के लिए इंतजाम सोच रखा था। उन्होंने अमेठी से सबसे कम समय में लखनऊ हवाईअड्डा और वहां से गुरुग्राम लाने की योजना सोच रखी थी। हालांकि, ऐसी नौबत नहीं आई और प्रचार के लिए कम समय मिलने के बावजूद स्मृति अच्छी संख्या में वोट ले आई थीं। अगली बार तो वह जीत भी गईं।

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