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ISRO Aditya L1: एक दुर्लभ संयोग के तहत भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के सौर उपग्रह आदित्य एल-1 और यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ईएसए) के सूर्य मिशन प्रोबा-3 ने एक साथ सूर्य से निकलने वाली दो प्रचंड सौर ज्वालाओं (कोरोनल मास इजेक्शन, सीएमई) का संयुक्त अध्ययन किया है।
बेंगलूरु स्थित भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान (आइआइए) के वैज्ञानिकों ने अपने अंतरराष्ट्रीय सहयोगियों के साथ सूर्य के अति सक्रिय क्षेत्र से निकली इन सौर लपटों के द्रव्यमान, घनत्व और ऊर्जा का विश्लेषण किया। इसरो ने कहा है कि दोनों सूर्य मिशनों से मिले आंकड़े सौर विस्फोटों के शुरुआती चरण को समझने में काफी मददगार साबित हुए हैं। कोरोनल मास इजेक्शन (सीएमई) सूर्य से निकलने वाले विशाल विस्फोट होते हैं, जिनमें चुंबकीय क्षेत्र से युक्त प्लाज्मा बड़ी मात्रा में अंतरिक्ष में फैलता है। जब ये विस्फोट पृथ्वी की दिशा में आते हैं, तो पृथ्वी के आसपास के अंतरिक्ष वातावरण को प्रभावित करते हैं। इनके कारण उपग्रहों, संचार प्रणालियों और अंतरिक्ष मौसम पर व्यापक असर पडता है।
इसरो ने कहा है कि 14 और 16 सितम्बर 2025 को सूर्य से जब प्रचंड ज्वालाएं (सीएमई) निकलीं, तो आदित्य एल-1 पर लगे उपकरण विजिबल एमिशन लाइन कोरोनाग्राफ (वीईएलसी) और प्रोबा के एसपिक्स (एएसपीआइआइसीएस) ने उन्हें कैद किया। दोनों उपकरणों ने सूर्य कोरोना के लगभग एक ही क्षेत्र का एक साथ और अलग-अलग ढंग से अवलोकन किया। दोनों उपग्रहों से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर वैज्ञानिकों ने सौर ज्वालाओं के आकार, गति, द्रव्यमान और तापमान का अनुमान लगाया। जुलाई 2025 से लेकर दिसम्बर 2025 तक सिर्फ दो ही सौर विस्फोट हुए और दोनों मामलों में वीईएलसी (आदित्य एल-1) ने घटना को सबसे पहले शुरुआती चरण में पकड़ा। वैज्ञानिकों के लिए सूर्य के बेहद करीब इन विस्फोटों का अध्ययन करना बेहद चुनौतीपूर्ण रहा है, लेकिन आदित्य-एल-1 और प्रोबा-3 के संयुक्त अवलोकनों से अब इन प्रक्रियाओं को बेहतर ढंग से समझने में मदद मिल रही है। दोनों उपग्रह एक-दूसरे के पूरक साबित हो रहे हैं।
अध्ययन से पता चला कि 14 सितम्बर का सौर विस्फोट 645 किलोमीटर प्रति सेकेंड की गति से आगे बढ़ा, जबकि 16 सितंबर घटना में गति लगभग 145 किलोमीटर प्रति सेकंड थी। दूसरे सौर विस्फोट (16 सिमतम्बर) का घनत्व ऊंचाई बढऩे के साथ ही घटने लगा, यानी शुरुआती चरण में इसके काफी प्रचंड होने के प्रमाण मिले। इसके अलावा 14 सितम्बर की घटना में सौर ज्वालाओं की कुल ऊर्जा में तापीय ऊर्जा केवल 1 फीसदी थी, जबकि 16 सितम्बर की घटना में तापीय ऊर्जा गतिज ऊर्जा के बराबर हो गई। दोनों घटनाओं के विश्लेषण में चुंबकीय ऊर्जा का अनुमान गतिज ऊर्जा के बराबर या उससे अधिक पाया गया।
इसरो ने कहा है कि हैलो आर्बिट में चक्कर लगा रहे दोनों उपग्रहों की आपस में दूरी लगभग 150 किलोमीटर है। आदित्य एल-1 का प्रक्षेपण 2 सितंबर 2023 को किया था और उसे 6 जनवरी 2024 को हैलो आर्बिट में स्थापित किया। वहीं, प्रोबा-3 का प्रक्षेपण भी इसरो ने ही 5 दिसंबर 2024 को श्रीहरिकोटा से पीएसएलवी से किया था। वैज्ञानिकों के अनुसार, इस तरह के समन्वित अवलोकन भविष्य में सौर ज्वालाओं के द्रव्यमान, घनत्व और ऊर्जा वितरण को बेहतर ढंग से मापने में मदद मिलेगी। इससे सूर्य से निकलने वाले विस्फोटों की भौतिक प्रक्रियाओं को समझने और पृथ्वी के आसपास के अंतरिक्ष मौसम पर उनके संभावित प्रभावों का आकलन कर बेहतर भविष्यवाणी की जा सकेगी।
Published on:
17 Oct 2026 01:00 am
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