
भारतीय सेना को मिलेगी कहर बरपाने वाली जैवलिन मिसाइल (सोर्स: एक्स यूजर Dillip Mahapatra और Vivek Singh स्क्रीनशॉट)
India-US Defense Deal: यूक्रेन युद्ध में रूसी टैंकों के खिलाफ अपनी क्षमता दिखा चुकी अमेरिकी जैवलिन मिसाइल अब भारतीय सेना की ताकत बढ़ाने जा रही है। भारत ने इस घातक एंटी-टैंक सिस्टम की खरीद को आगे बढ़ा दिया है। अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने भी इसे भारत-अमेरिका रक्षा साझेदारी के लिए अहम कदम बताया है। खास बात यह है कि दोनों देश भविष्य में इसके भारत में निर्माण की संभावनाओं पर भी काम कर रहे हैं। ऐसे में सवाल है कि आखिर जैवलिन में ऐसा क्या खास है, जो इसे भारतीय सेना के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है?
दरअसल, जैवलिन एक मैन-पोर्टेबल एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल सिस्टम है। यानी इसे सैनिक अपने साथ लेकर आसानी से एक जगह से दूसरी जगह ले जा सकते हैं। यही वजह है कि पहाड़ी और सीमावर्ती क्षेत्रों में यह काफी उपयोगी साबित हो सकती है।
इसकी सबसे खासियत है फायर एंड फॉरगेट तकनीक। सैनिक लक्ष्य को लॉक करता है और मिसाइल दाग देता है। इसके बाद मिसाइल खुद अपने लक्ष्य को ट्रैक करती है। ऑपरेटर को लगातार इसकी दिशा नियंत्रित करने की जरूरत नहीं पड़ती।
मिसाइल में इन्फ्रारेड सीकर लगा है। इससे यह दिन और रात दोनों समय लक्ष्य की पहचान कर सकती है। खराब मौसम में भी इसका इस्तेमाल किया जा सकता है।
जैवलिन की सबसे चर्चित क्षमता इसका टॉप-अटैक मोड है। इसमें मिसाइल सीधे टैंक के सामने से हमला करने के बजाय ऊपर उठकर उसके कमजोर ऊपरी हिस्से पर वार कर सकती है।
किसी टैंक की छत आमतौर पर उसके सामने वाले हिस्से जितनी मजबूत नहीं होती। इसलिए यह तकनीक भारी बख्तरबंद वाहनों के खिलाफ काफी प्रभावी हो सकती है। जरूरत पड़ने पर जैवलिन डायरेक्ट-अटैक मोड में भी इस्तेमाल की जा सकती है। इसकी रेंज करीब 4 किलोमीटर तक बताई जाती है। सिस्टम का वजन लगभग 22.3 किलोग्राम है। मिसाइल लॉन्च होने के बाद सैनिक तुरंत अपनी जगह बदल सकते हैं। इससे दुश्मन की जवाबी कार्रवाई से बचने में मदद मिल सकती है।
भारत के लिए जैवलिन की अहमियत सिर्फ इसकी मारक क्षमता तक सीमित नहीं है। भारत की सीमाओं पर कई ऐसे इलाके हैं, जहां भारी हथियारों को तेजी से पहुंचाना मुश्किल होता है।
लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश जैसे ऊंचाई वाले क्षेत्रों में हल्का और पोर्टेबल एंटी-टैंक सिस्टम सैनिकों के लिए उपयोगी हो सकता है। चीन या पाकिस्तान की तरफ से बख्तरबंद वाहनों के इस्तेमाल की स्थिति में यह हर मोर्चे पर तैनात जवानों को अतिरिक्त क्षमता देगा। बता दें इस सौदे में मिसाइलों और लॉन्चिंग यूनिट के साथ प्रशिक्षण सिमुलेटर, स्पेयर पार्ट्स और तकनीकी सहायता भी शामिल है। सेना ने इस गाइडेड मिसाइल प्रणाली को खरीदने के लिए आधिकारिक हस्ताक्षर भी कर दिए हैं। इस 292 करोड़ रुपये के सौदे के तहत सेना को 100 जैवलिन मिसाइलें और 25 स्पेशल लॉन्चिंग यूनिट मिलेंगी।
जैवलिन को अमेरिकी कंपनियों लॉकहीड मार्टिन और रेथियॉन के संयुक्त उपक्रम ने विकसित किया है। अब भारत की कोशिश सिर्फ इसे खरीदने तक सीमित नहीं रहने की है। अगर इसके उत्पादन की तकनीक और निर्माण क्षमता भारत में आती है, तो यह देश की रक्षा आत्मनिर्भरता के लिए भी बड़ा कदम साबित हो सकता है।
Updated on:
29 Aug 2026 01:36 pm
Published on:
29 Aug 2026 01:36 pm
