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‘अगर मंत्री के घर कैश मिलता तो FIR से बच पाते?’ जस्टिस वर्मा केस पर वकील हरीश साल्वे और महेश जेठमलानी ने उठाए सवाल

Judiciary Harish Salve: हरीश साल्वे और महेश जेठमलानी ने न्यायपालिका में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने के लिए सुधारों की मांग की। CJI सूर्यकांत ने जजों की शिकायत व्यवस्था और कॉलेजियम का बचाव किया।
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भारत

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Saurabh Mall

Sep 15, 2026

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फोटो में वकील हरीश साल्वे (इमेज सोर्स- आईएएनएस)

Justice Yashwant Varma Case Judicial Complaint Redressal: न्यायपालिका की पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। जाने-माने वकील हरीश साल्वे और महेश जेठमलानी ने न्यायपालिका में बड़े सुधारों की बात कही। दोनों ने कहा कि लोगों का भरोसा बनाए रखने के लिए शिकायतों से निपटने की व्यवस्था और ज्यादा पारदर्शिता होनी चाहिए।

बता दें ये मुद्दा राम जेठमलानी मेमोरियल लेक्चर के दौरान उठा। इस दौरान ‘चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया’ सूर्यकांत ने भी सवालों के जवाब दिए। साथ ही उन्होंने जजों के खिलाफ शिकायतों से निपटने वाली मौजूदा व्यवस्था का बचाव किया।

जस्टिस यशवंत वर्मा केस पर उठे सवाल

महेश जेठमलानी ने पिछले साल मार्च में जस्टिस यशवंत वर्मा के घर से कथित तौर पर जलता हुआ कैश मिलने की घटना का जिक्र किया। उन्होंने सवाल उठाया कि इस मामले में FIR क्यों दर्ज नहीं की गई, जबकि जज ने जांच रद्द करने के लिए बार-बार SC का दरवाजा खटखटाया था। इस मामले में पारदर्शिता बेहद जरूरी है।

यही नहीं हरीश साल्वे ने भी इसी मुद्दे पर तीखा सवाल किया। उन्होंने पूछा कि अगर ऐसी ही घटना किसी मंत्री के घर पर होती, तो क्या उसे FIR से राहत मिलती? इस पर अदालत का रुख क्या होता?

शिकायतों की व्यवस्था पर CJI का जवाब

ऐसे में जवाब देते हुए CJI सूर्यकांत ने कहा कि जजों के खिलाफ शिकायतों से निपटने के लिए न्यायपालिका के भीतर एक व्यवस्था मौजूद है। उनके मुताबिक यह सिस्टम मजबूत, जवाबदेह और तेज है। उन्होंने माना कि किसी भी व्यवस्था में सुधार की गुंजाइश रहती है। लेकिन उन्होंने भरोसा दिलाया कि जजों के खिलाफ शिकायतों को गंभीरता से देखा जाता है।

CJI ने यह भी कहा कि कई शिकायतें ऐसे लोगों की ओर से आती हैं, जो कोर्ट का फैसला अपने खिलाफ जाने के बाद नाराज होते हैं। उन्होंने सवाल किया कि क्या ऐसी शिकायतों पर फैसला सार्वजनिक करना सही होगा? अगर हर शिकायत को पब्लिक डोमेन में डाल दिया जाए, तो इसका असर जजों और पूरी न्यायपालिका पर क्या पड़ेगा?
आपने कभी सोचा है…जजों और ज्यूडिशियरी का क्या होगा?

नियुक्तियों और कोर्ट की निगरानी पर भी बहस

हरीश साल्वे ने अदालतों की भूमिका को लेकर भी अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि कोर्ट को अपने मूल क्षेत्र यानी कानून पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने कोर्ट की निगरानी में होने वाली जांच पर भी सवाल उठाए। साल्वे ने 2G स्पेक्ट्रम, कोयला ब्लॉक आवंटन और हवाला मामलों का उदाहरण दिया। उनका तर्क था कि जब अदालत जांच की निगरानी करती है, तो जांच एजेंसी की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है।

वहीं, जेठमलानी ने संवैधानिक अदालतों में जजों की नियुक्ति और ट्रांसफर में ज्यादा पारदर्शिता की मांग की। उन्होंने फेवरिटिज्म और भाई-भतीजावाद की आशंकाओं को दूर करने के लिए सुधार की जरूरत बताई।

CJI सूर्यकांत ने कॉलेजियम सिस्टम का बचाव किया। उन्होंने कहा कि यह व्यवस्था पिछले कुछ वर्षों में विकसित हुई है। सरकार के साथ सलाह-मशविरा कर नियुक्तियां और ट्रांसफर होते हैं। इसलिए इसके प्रभाव को लेकर संदेह की जरूरत नहीं है। बता दें इस पूरी बहस का केंद्र एक ही सवाल रहा- न्यायपालिका की स्वतंत्रता कायम रखते हुए उसमें पारदर्शिता और जवाबदेही कैसे बढ़ाई जाए।

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