
'वंदे मातरम' के अपमान पर सजा का प्रावधान वाले कानून से क्या हासिल होगा? इस पर विमर्श जरूरी है। (Image Designed by AI)
Vande Mataram Amendment Bill: 1905 का बंगाल। विभाजन के विरुद्ध उठता जनाक्रोश अभी गांवों और नगरों की धीमी फुसफुसाहट में आकार ले रहा है। मिट्टी की दीवारों वाले एक छोटे घर में एक मां तेल का दीपक जलाती है और अपने आठ वर्ष के बेटे को पास बैठाकर धीमे स्वर में “वन्दे मातरम्” सिखाती है। बच्चा हर शब्द का अर्थ नहीं जानता, पर मां की आवाज में भूमि के प्रति प्रेम, बंटवारे की पीड़ा और स्वतंत्र होने की आकांक्षा सुन लेता है।
यह कहीं लिखित मां-बेटे की जीवनी नहीं, बल्कि एक प्रतीकात्मक दृश्य है। फिर भी इसके भीतर का भाव ऐतिहासिक रूप से सच्चा है। बंग-भंग विरोधी आंदोलन के समय असंख्य परिवारों, विद्यार्थियों, कार्यकर्ताओं और सामान्य नागरिकों के लिए “वन्दे मातरम्” गीत से बढ़कर साहस, स्वाभिमान और सामूहिक पहचान का स्वर बन चुका था।
बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने “वन्दे मातरम्” की रचना 1870 के दशक में की थी। बाद में इसे उनके उपन्यास ‘आनंद मठ’ में स्थान मिला। इस रचना ने भारतभूमि को किसी अमूर्त भूखंड के रूप में नहीं, बल्कि जीवन देने वाली माता के रूप में देखा - उसकी धरती, जल, हरियाली और शक्ति को एक भावसूत्र में बांधा। इसी कारण अलग-अलग भाषा और क्षेत्र के लोग भी इसमें अपना साझा देश पहचान सके।
1896 में कलकत्ता में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने इसे गाया। 1905 के बंगाल विभाजन और स्वदेशी आंदोलन के दौर में यही स्वर जुलूसों, सभाओं और जन प्रतिरोध की पहचान बन गया। ब्रिटिश सत्ता के सामने संसाधनहीन भारतीयों के पास हमेशा हथियार नहीं थे, पर उनके पास एक ऐसा संबोधन था जो भयभीत व्यक्ति को समुदाय का सदस्य बना देता था - “मैं अकेला नहीं हूं; हम एक मातृभूमि की संतान हैं।”
स्वाधीनता आंदोलन में इस गीत का प्रभाव केवल उत्तेजना पैदा करना नहीं था। उसने राजनीतिक विचार को भावनात्मक भाषा दी। स्वतंत्रता, जो सामान्य व्यक्ति को दूर की संवैधानिक धारणा लग सकती थी, मां की गरिमा और घर की रक्षा का निकट अनुभव बन गई। यही किसी राष्ट्रीय प्रतीक की गहरी शक्ति है: वह विविधताओं को मिटाता नहीं, उन्हें एक बड़े, साझा दायित्व से जोड़ता है।
स्वतंत्र भारत ने इस ऐतिहासिक भूमिका को भुलाया नहीं। 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने राष्ट्रीय गान के प्रश्न पर औपचारिक प्रस्ताव के स्थान पर अध्यक्षीय वक्तव्य दिया। उन्होंने कहा कि “जन गण मन” भारत का राष्ट्रीय गान होगा और स्वतंत्रता-संग्राम में ऐतिहासिक भूमिका निभाने वाले “वन्दे मातरम्” को उसके समान सम्मान दिया जाएगा तथा उसका दर्जा भी समान होगा। यह घोषणा हमारे गणराज्य के जन्म से दो दिन पहले राष्ट्रीय स्मृति और संवैधानिक भावना के बीच एक महत्वपूर्ण सेतु बनी।
इसके बावजूद वैधानिक स्थिति में एक स्पष्ट अंतर बना रहा। राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम, 1971 राष्ट्रीय ध्वज, संविधान और राष्ट्रीय गान से संबंधित अपमान या व्यवधान के लिए प्रावधान करता है। इसकी धारा 3 के अंतर्गत जानबूझकर राष्ट्रीय गान का गायन रोकना अथवा उसे गा रही सभा में बाधा डालना दंडनीय है। किंतु इसी प्रकार का विशिष्ट प्रावधान राष्ट्रीय गीत के लिए नहीं था। भावनात्मक और ऐतिहासिक सम्मान मौजूद था, पर गायन में जानबूझकर बाधा के विरुद्ध स्पष्ट वैधानिक संरक्षण नहीं।
इसी अंतर को संबोधित करने के लिए राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण (संशोधन) विधेयक, 2026 को 24 जुलाई 2026 को राज्यसभा में प्रस्तुत किया गया। विधेयक धारा 3 के स्थान पर नया प्रावधान रखने का प्रस्ताव करता है। इसके अनुसार कोई व्यक्ति यदि जानबूझकर राष्ट्रीय गान या राष्ट्रीय गीत का गायन रोकता है, अथवा ऐसी गायनरत सभा में व्यवधान पैदा करता है, तो उसे तीन वर्ष तक का कारावास, जुर्माना अथवा दोनों हो सकते हैं।
यहां विधेयक की वास्तविक सीमा समझना आवश्यक है। इसका प्रभावी प्रावधान हर नागरिक को गीत गाने के लिए बाध्य नहीं करता; वह किसी गायन को जानबूझकर रोकने या गायनरत सभा को बाधित करने को दंडित करने का प्रस्ताव करता है। प्रस्तुत पाठ विद्यालयों में इसका गायन अनिवार्य नहीं बनाता और न सभी अंतरों को गाने का आदेश देता है। इसे लागू कानून कहना भी अभी गलत होगा। विधेयक को संसदीय प्रक्रिया पूरी करनी होगी, दोनों सदनों की स्वीकृति लेनी होगी और राष्ट्रपति की अनुमति प्राप्त करनी होगी।
मेरे विचार में इस विधायी पहल का मूल उद्देश्य उचित और स्वागतयोग्य है। जिस रचना को संविधान सभा के अध्यक्ष ने राष्ट्रीय गान के समान सम्मान और दर्जा देने की बात कही, उसके गायन को जानबूझकर बाधित किए जाने के विरुद्ध स्पष्ट संरक्षण होना ऐतिहासिक निरंतरता की दृष्टि से तर्कसंगत है। लेकिन समर्थन का अर्थ यह नहीं कि कानून के प्रयोग पर प्रश्न पूछना देशभक्ति के विरुद्ध है।
“जानबूझकर” और “बाधा” जैसे शब्दों की व्याख्या सावधानी से होनी चाहिए, ताकि मौन, अनजानी चूक, वैध असहमति या अंतरात्मा की स्वतंत्रता को अपराध न बना दिया जाए। राष्ट्रीय सम्मान और संवैधानिक स्वतंत्रता परस्पर विरोधी नहीं; दोनों की रक्षा ही भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता है।
क्या देशप्रेम दंड विधान से पैदा किया जा सकता है? सीधा उत्तर है: नहीं। किसी हृदय में राष्ट्र के लिए प्रेम पुलिस, अदालत या दंड की शक्ति से नहीं डाला जा सकता। विवश होकर गाया गया गीत नागरिक चरित्र का प्रमाण नहीं होता।
फिर कानून की भूमिका क्या है? कानून प्रेम उत्पन्न नहीं कर सकता, पर वह उस गरिमापूर्ण सार्वजनिक स्थान की रक्षा कर सकता है जिसमें लोग अपने राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान करते हैं। जैसे पुस्तकालय ज्ञान नहीं भरता, पर अध्ययन के लिए अनुशासित वातावरण बनाता है; वैसे ही मर्यादित कानून श्रद्धा नहीं बनाता, पर जानबूझकर किए जाने वाले व्यवधान से उसकी अभिव्यक्ति को सुरक्षित रख सकता है। बशर्ते उसका क्रियान्वयन सटीकता और निष्पक्षता से हो।
स्थायी सम्मान की असली पाठशाला परिवार, विद्यालय और समाज है। आज का बच्चा मोबाइल फोन, छोटे वीडियो और लगातार बदलती सूचनाओं के बीच बड़ा हो रहा है। उसे “वन्दे मातरम्” केवल याद करने योग्य पंक्तियों के रूप में पढ़ाया गया तो गीत परीक्षा के बाद स्मृति से उतर सकता है। लेकिन यदि उसे बताया जाए कि बंगाल विभाजन क्या था, स्वदेशी आंदोलन क्यों उठा, बंकिमचंद्र ने मातृभूमि को इस रूप में क्यों देखा और एक गीत ने भय में बंटे लोगों को कैसे साझा साहस दिया, तो शब्द इतिहास से जुड़ेंगे और इतिहास जीवन-मूल्य बनेगा।
बच्चों को यह भी समझाना होगा कि राष्ट्रीय गीत का सम्मान केवल सावधान मुद्रा में खड़े होने तक सीमित नहीं है। यदि हम “माता” कहकर भूमि को नमन करें, लेकिन सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाएं, रिश्वत को सामान्य मानें, स्त्रियों का अनादर करें, जाति या भाषा के आधार पर मनुष्यों को बांटें, कर्तव्य से बचें या पर्यावरण को नष्ट करें, तो हमारा उच्चारण और आचरण एक-दूसरे का खंडन करेंगे।
“वन्दे मातरम्” का आधुनिक अर्थ ईमानदार काम, अनुशासन, सार्वजनिक सेवा, सामाजिक एकता और राष्ट्र के संसाधनों के प्रति जिम्मेदारी होना चाहिए। शिक्षक इसे इतिहास से जोड़ें, माता-पिता इसे आचरण से समझाएं, नागरिक इसे कर्तव्य में बदलें और राज्य इसके सम्मान की रक्षा करते समय संवैधानिक संयम रखे - तभी गीत पीढ़ियों के बीच जीवित विरासत बनेगा।
मुझे 1905 के उस कल्पित कमरे में जलता छोटा दीपक आज के भारत के लिए भी अर्थवान लगता है। उस समय वह पराधीनता के अंधकार में आशा का प्रकाश था; आज वह हमें याद दिलाता है कि स्वतंत्रता प्राप्त कर लेना अंतिम पड़ाव नहीं, उसके योग्य नागरिक बनना निरंतर साधना है।
विधेयक इतिहास के एक अधूरे वैधानिक प्रश्न को संबोधित करने का अवसर देता है। संसद को उस पर गंभीर, शांत और संविधानसम्मत चर्चा करनी चाहिए। समर्थन और आपत्ति - दोनों को राष्ट्रहित की कसौटी पर सुना जाना चाहिए। अंततः किसी राष्ट्रीय गीत की सबसे मजबूत सुरक्षा दंड की कठोरता नहीं, करोड़ों नागरिकों का जिम्मेदार चरित्र होता है।
“वन्दे मातरम्” केवल हमारे अतीत का गीत नहीं; यह वर्तमान का दायित्व और भारत के भविष्य की विरासत है।
(लेखक अमरेश राय चुनावी रणनीतिकार, राजनीतिक नेतृत्व प्रशिक्षक और जन-केंद्रित राजनीतिक अभियानों के विशेषज्ञ हैं। व्यक्त विचार निजी हैं।)
Updated on:
27 Jul 2026 04:32 pm
Published on:
27 Jul 2026 03:12 pm
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