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Rural Education Reform: पत्रिका मंडे इंटरव्यूः ‘गांव के स्कूल पंचायतों को संभालने दें, देखिए कैसे नहीं सुधरते’

SM Vijayanand Interview: सरकारी स्कूलों की जिम्मेदारी पंचायतों को देने का विचार केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं, बल्कि स्थानीय जवाबदेही का मॉडल है। विजयानंद ने शिक्षा के साथ स्वास्थ्य और युवाओं की भागीदारी को भी पंचायतों से जोड़ने की जरूरत बताई है।
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Gram Panchayat Development Plan

Gram Panchayat Development Plan:ग्राम पंचायत डेवलपमेंट प्लान (फोटो सोर्स : patrika)

Gram Panchayat Development Plan (GPDP): सरकारी स्कूलों के हालात पर पिछले कुछ हफ्तों से काफी चर्चा हो रही है। करीब एक दशक पहले देश में ग्राम पंचायत डेवलपमेंट प्लान (जीपीडीपी) की शुरुआत करने वाले पूर्व पंचायती राज सचिव एमएस विजयानंद ने दावा किया है कि अगर पंचायतें स्कूलों को संभालें तो इनके हालात सुधरने से कोई नहीं रोक सकेगा।

केरल के मुख्य सचिव रहते हुए एसएम विजयानंद ने 1996 में जनकीय सूत्रणम अभियान से 15 साल पंचायत संस्थाओं को मजबूत किया। बीते सप्ताह वे जयपुर में पंचायत से जुड़े एक कार्यक्रम में शामिल हुए, जहां पत्रिका ने उनसे गांवों के विकास और शिक्षा में सुधार के लिए पंचायतों की भूमिका और उनके मौजूदा हालात पर बातचीत की। पढ़िए उन्होंने स्कूलों से लेकर जेन-जी तक के लिए क्या कहा :
साक्षात्कार: ग्राम पंचायत डेवलपमेंट प्लान के प्रणेता एसएम विजयानंद से विशेष बातचीत

स्कूलों को बेहतर बनाने में पंचायतों की क्या भूमिका हो सकती है?

  • पंचायतें गांवों के हालात और लोगों को गहराई से जानती और समझती हैं। मैं यह तो नहीं कहता कि वे स्कूल में पढ़ाने का तरीका बेहतर कर सकते हैं, लेकिन इमारतें से लेकर संचालन में सुधार ला सकते हैं। केरल का ही उदाहरण लीजिए। वहां जनकीय सूत्रणम अभियान के दौरान देखने को मिला कि कोई बच्चा अगर दो-तीन दिन स्कूल नहीं आता तो शिक्षक सीधे गांव के सरपंच को रिपोर्ट करते। अक्सर सरपंच उस बच्चे के पिता को परिचित निकलते। वे सीधे पिता से बात करते। अगले दिन बच्चा स्कूल पहुंच जाता।लेकिन इससे शिक्षकों पर पंचायतों का अनावश्यक नियंत्रण भी तो आ सकता है?
  • केरल में पंचायतों को प्राथमिक स्कूलों पर नियंत्रण मिला। वे शिक्षक को स्कूल से लंबे समय अनुपस्थित रहने पर दंडित या ट्रांसफर कर सकते थे, उनकी हाजिरी पुख्ता करने के लिए जरूरी कदम भी उठाते हैं। लेकिन वेतन राज्य सरकार देती है। इसे अनावश्यक नियंत्रण नहीं कहना चाहिए।इसके क्या लाभ मिले?
  • स्कूलों का दायित्व पंचायतों के पास होने पर बच्चों और गांव के साथ साथ शिक्षकों को भी लाभ है। शिक्षकों को बच्चों का नामांकन बढ़ाने, बच्चों को स्कूल छोड़ने से रोकने और बुनियादी सुविधाओं का इंतजाम करने में काफी मदद मिलती है। उन्हें शिक्षा विभाग के भरोसे नहीं रहना पड़ता।

गांवों के विकास से जुड़े कामों व निर्णयों में नागरिकों की भागीदारी कैसे बढ़ेगी?

  • अधिकतर जगह महिला स्वयं सहायता समूह पहले से मौजूद हैं, इनकी सक्रियता बढ़ती है तो गांव समृद्ध होते हैं। कई महिलाएं पंचायत से जुड़े कामों के दौरान अपने बच्चों को साथ लाती हैं। ऐसे में को गांव के लिए प्रस्तावित कामों के लिए निर्णय लेने की प्रक्रिया में शामिल करें तो 60 फीसदी तक भागीदारी सुनिश्चित हो जाती है।नई पीढ़ी या कहें जेन-जी की भागीदारी भी कैसे बढ़ाएं?
  • राजस्थान इस मामले में देश के लिए नजीर बन सकता है। जेन-जी और जेन-अल्फा को बाल सभाओं के जरिए जोड़ा जा सकता है। यहीं सबसे पहले 2014 में उन्नत भारत अभियान के जरिए आइआइटी के छात्रों और गांवों को आपस में जोड़ा गया। वे मिलकर गांवों के लिए तकनीकी विकास पर काम कर सकते हैं। इन्हें पंचायतों को अपने कामों में हिस्सेदार बनाना चाहिए।

यह सब तो पहले से है, फिर दिक्कत कहां है?

  • सबसे बड़ी दिक्कत विश्वास जीतने की है। अगर ग्रामीणों और खासतौर पर युवाओं को यह दिखेगा कि 6-7 साल से चुनाव नहीं हो रहे, तो एक लोकतांत्रिक संस्था की विश्वसनीयता कहां से बढ़ेगी? अगर विश्वास नहीं होगा तो भागीदारी कैसे आएगी? केवल राजस्थान ही नहीं, तमिलनाडु, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, यूपी में भी यही हालात बन रहे हैं। इसका समाधान हमें जल्द निकालना होगा।और किन क्षेत्रों में पंचायतें बेहतर काम कर सकती हैं?
  • शिक्षा के बाद स्वास्थ्य एक अहम क्षेत्र हैं, जिस पर निगरानी की ताकत पंचायतों के मिलनी चाहिए। स्वास्थ्य केंद्र पर चिकित्सक नहीं है, आ नहीं रहा है, जरूरी सुविधाएं नहीं हैं, पंचायत इन्हें दूर करने में मदद कर सकती है।

जीपीडीपी का आज कैसे मूल्यांकन करेंगे?

  • यह एक बेहद सोची समझी योजना है। पूरे देश में इसे प्रभावी बनाने की जरूरत है। गांव अपने विकास की योजनाएं खुद बनाएंगे तो वे ज्यादा प्रभावी होंगी। मुझे इसके अनुपालन की स्थिति को लेकर कुछ आपत्तियां जरूर हैं, लेकिन ऊपर से कोई योजना लाकर गांव में लागू करने से यह योजना कहीं बेहतर है।

अभिषेक यादव