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क्यों स्कूल में बहुत मार पड़ती थी सोनम वांगचुक को? चीन के साथ उनका पंगा है पुराना!

Sonam Wangchuk Education: दिल्ली के जंतर-मंतर पर अनशन कर रहे सोनम वांगचुक ने अपने बचपन के संघर्षों का जिक्र करते हुए बताया कि उन्हें स्कूल में अक्सर टीचर की मार और सजा मिलती थी। जानिए कैसे बिना स्कूल के शुरुआती बचपन, अंग्रेजी भाषा की चुनौती और शिक्षा व्यवस्था पर उनके विचारों ने उन्हें देश के प्रमुख शिक्षा सुधारकों में शामिल किया।
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सोनम वांगचुक (Photo-IANS)

Sonam Wangchuk Latest News:सोनम वांगचुक इंजीनियर हैं, इनोवेटर, सोशल एक्टिविस्ट और शिक्षा सुधारक भी हैं। लेकिन क्या आपको पता है कि शुरुआती दिनों में उन्हें टीचर की मार मिलती थी। लगभग हर दूसरे दिन उन्हें पनिशमेंट के तौर पर क्लास से बाहर खड़ा किया जाता था?

जिस गांव में रहते थे, वहां नहीं था कोई स्कूल

पिछले 19 दिन से दिल्ली के जंतर-मंतर पर भूख हड़ताल पर बैठे सोनम वांगचुक ने कुछ वक्त पहले एक इंटरव्यू में अपने जीवन से जुड़ी कई दिलचस्प बातें बताई थीं। सोनम लद्दाख के जिस गांव में रहते थे, वहां कोई स्कूल नहीं था। 9 साल की उम्र तक वह नहीं जानते थे कि स्कूल अंदर से कैसा दिखता है, मगर इन 9 सालों में उन्होंने वह सबकुछ सीखा जो शायद किताबी ज्ञान में संभव नहीं था। लेकिन 9 साल के बाद जब स्कूल की यात्रा शुरू हुई, तो उनके हिस्से में सबसे ज्यादा कुछ आया तो वो थी – टीचर से मार।

बुरे स्कूल से स्कूल न होना अच्छा

सोनम वांगचुक देश की शिक्षा व्यवस्था और स्कूलों में पढ़ाई के तरीके से खुश नहीं हैं। वह खुद को भाग्यशाली मानते हैं कि उनके गांव में उस समय कोई स्कूल नहीं था। उनका कहना है कि बुरे स्कूल से अच्छा है, स्कूल का न होना। अगर मैं अपने बचपन के शुरुआती दिनों में स्कूल चला जाता, तो शायद वो नहीं सीख पाता तो मैंने सीखा। सीखने के लिए स्कूल और किताबों की जरूरत नहीं होती, इसके लिए उत्सुकता और प्यार चाहिए।

9 साल की उम्र के बाद सोनम का उनके एक रिश्तेदार के कहने पर श्रीनगर के स्कूल में दाखिला कराया गया। ये एक इंग्लिश मीडियम स्कूल था। जबकि सोनम का इंग्लिश से दूर का रिश्ता भी नहीं था, इसलिए उन्हें टीचर की खूब मार खानी पड़ती। इंटरव्यू में सोनम ने कहा – क्लास में मेरा अधिकांश समय पनिशमेंट में बीतता था। या तो मुझे सबसे पीछे हाथ खड़े रखने की सजा दी जाती, या फिर क्लास से ही बाहर कर दिया जाता। मेरे जैसा बच्चा, जिसे इंग्लिश का एक शब्द नहीं पता था, उसे पूरी की पूरी अंग्रेजी में प्रकाशित किताब थमा दी गई। टीचर ने कभी मेरी परेशानी समझने की कोशिश नहीं की, यही आज भी स्कूलों में होता है, शिक्षक ये नहीं जानना चाहते कि बच्चा अगर कमजोर है, तो उसकी वजह क्या है। हालांकि, मैंने पनिशमेंट को भी इन्जॉय किया और हर पल को कुछ न कुछ नया सीखने का मौका मानकर चलता रहा।

नींव मजबूत थी, इसलिए डटा रहा

सोनम वांगचुक के मुताबिक, अधिकांश शिक्षक केवल यही जानते हैं कि बच्चों में साइंस या मैथ कैसे ठूँसनी है। वे बच्चे की परेशानी को समझने की कोशिश नहीं करते और यही सबसे बड़ी गलती है। शिक्षकों में सहानुभूति की कमी है। सोनम का कहना है कि चूंकि उनकी नींव बहुत मजबूत थी, इसलिए वह स्कूल के एकदम अलग माहौल में भी अपनी सीखने की ललल को जिंदा रख पाए और आगे बढ़ पाए। स्कूल के दिनों में सोनम को केवल लद्दाखी भाषा आती थी, इस वजह से उन्हें काफी परेशानी का सामना करना पड़ता था। आज वह 9 से अधिक भाषाएं जानते हैं। वह चीनी भाषा भी सीख रहे हैं।

चीन ने पहुंचाया नुकसान

चीन का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया था कि कैसे चीन उनके खिलाफ डिजिटल साजिश रचता आया है। सोनम ने चीनी समान के बहिष्कार को लेकर 2020 में अभियान चलाया था। उनके इस कैंपेन को भारी समर्थन मिला और इससे चीन नाराज हो गया। इसके बाद चीन द्वारा उनके यूट्यूब को पूरी तरह सप्रेस किया गया, ताकि वो ज्यादा लोगों तक न पहुंच सके।

सोनम वांगचुक का कहना है कि पूरी दुनिया में चीन के खिलाफ बोलने वालों के साथ यही किया जाता है- उनकी डिजिटल रीच सीमित की जाती है। हालांकि, वह यह भी कहते हैं - ‘रात भर का है मेहमान अंधेरा, किसके रोके रुका है सवेरा’।