
Deepak Prakash: बिहार के मंत्री पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: क्या 6 महीने की संवैधानिक छूट बार-बार मिल सकती है? (फोटो सोर्स:@DeepakRLM)
Bihar Minister Deepak Prakash: बिहार के पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश के मामले ने देश में संवैधानिक व्यवस्था और मंत्रियों की नियुक्ति को लेकर नई बहस छेड़ दी है। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को बिहार सरकार से स्पष्ट जवाब मांगा कि आखिर कोई मंत्री बिना विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य बने छह महीने से अधिक समय तक पद पर कैसे बना रह सकता है।
मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने दोटूक लहजे में कहा कि यह विशुद्ध रूप से कानून का प्रश्न है और सरकार को यह स्पष्ट करना ही होगा कि कोई व्यक्ति बिना चुनाव जीते छह महीने की तय सीमा के बाद भी पद पर कैसे बना हुआ है।
याचिका के अनुसार दीपक प्रकाश पहले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सरकार में करीब चार महीने 26 दिन तक मंत्री रहे। इसके बाद 15 अप्रैल 2026 को सरकार बदलने के साथ उनका कार्यकाल समाप्त हो गया।
करीब 22 दिन तक वे मंत्री नहीं रहे, लेकिन 7 मई को सम्राट चौधरी के नेतृत्व में बनी नई सरकार में उन्हें फिर से मंत्री पद की शपथ दिला दी गई। हालांकि इस दौरान भी वे विधानसभा या विधान परिषद के सदस्य नहीं बने।
याचिकाकर्ता का कहना है कि दोनों कार्यकाल को जोड़ने पर दीपक प्रकाश बिना निर्वाचित हुए छह महीने से अधिक समय तक मंत्री पद पर बने रहे हैं। इसलिए उनकी नियुक्ति संविधान की भावना के खिलाफ है और इसे "संविधान के साथ छल" माना जाना चाहिए।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 164(4) मुख्यमंत्री या मंत्री बनने वाले ऐसे व्यक्ति को अधिकतम छह महीने की छूट देता है, जो उस समय विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य नहीं हो। इस अवधि के भीतर उसे किसी एक सदन का सदस्य बनना अनिवार्य होता है।
यदि छह महीने के भीतर सदस्यता हासिल नहीं होती तो संबंधित व्यक्ति को मंत्री पद छोड़ना पड़ता है। इसी प्रावधान की व्याख्या को लेकर अब सुप्रीम कोर्ट में कानूनी बहस हो रही है।
इस मामले की सबसे अहम बात यह है कि दीपक प्रकाश लगातार छह महीने मंत्री नहीं रहे। उनके दो अलग-अलग कार्यकाल हैं, जिनके बीच 22 दिन का अंतर रहा।
अब सवाल यह है कि क्या सरकार बदलने या दोबारा शपथ लेने के बाद छह महीने की संवैधानिक अवधि फिर से शुरू मानी जाएगी, या पहले का कार्यकाल भी इसमें जोड़ा जाएगा?
यदि अदालत यह मानती है कि कुल अवधि की गणना होगी, तो भविष्य में किसी भी सरकार के लिए इस तरह दोबारा शपथ दिलाकर संवैधानिक सीमा से बचना आसान नहीं रहेगा।
भारतीय राजनीति में ऐसे कई उदाहरण रहे हैं, जब मुख्यमंत्री या मंत्री बनने के बाद छह महीने के भीतर सदन की सदस्यता हासिल की गई।
इन सभी मामलों में संवैधानिक समयसीमा का पालन किया गया। लेकिन बिहार का मामला इसलिए अलग माना जा रहा है क्योंकि यहां विवाद छह महीने की अवधि के दोबारा इस्तेमाल को लेकर है।
कानूनी जानकारों का कहना है कि अनुच्छेद 164(4) का उद्देश्य किसी व्यक्ति को अनिश्चितकाल तक बिना जनता का प्रतिनिधि बने मंत्री बनाए रखना नहीं है। यह केवल अस्थायी व्यवस्था है ताकि सरकार गठन में व्यावहारिक कठिनाइयों का समाधान हो सके।
यदि अदालत यह स्पष्ट कर देती है कि छह महीने की अवधि बार-बार नहीं ली जा सकती, तो यह फैसला भविष्य में केंद्र और राज्यों की सभी सरकारों के लिए महत्वपूर्ण संवैधानिक मिसाल बन जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट के आगामी फैसले से केवल बिहार सरकार की स्थिति ही स्पष्ट नहीं होगी, बल्कि यह भी तय होगा कि संविधान के अनुच्छेद 164(4) की सीमा क्या है और क्या कोई सरकार मंत्री पद की शपथ दोहराकर छह महीने की समयसीमा को फिर से शुरू मान सकती है।
देश की संवैधानिक व्यवस्था और राजनीतिक नियुक्तियों के लिहाज से यह मामला आने वाले समय में एक ऐतिहासिक न्यायिक व्याख्या का आधार बन सकता है।
Updated on:
30 Jul 2026 01:59 pm
Published on:
30 Jul 2026 01:09 pm
