
फाइल फोटो- पत्रिका
NEET UG 2026 Paper Leak: नीट-यूजी 2026 पेपर लीक को लेकर देशभर में हुए छात्र प्रदर्शनों के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बड़ी राहत दी है। अदालत ने प्रदर्शन के दौरान गिरफ्तार या हिरासत में लिए गए 18 वर्ष से कम आयु के उन छात्रों को तत्काल रिहा करने का निर्देश दिया है, जिनका कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि फिलहाल छात्रों के खिलाफ कोई दंडात्मक या जबरन कार्रवाई न की जाए। साथ ही, अदालत ने प्रदर्शनों से जुड़े सभी इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को सुरक्षित रखने का आदेश दिया। कोर्ट ने कहा कि उसके समक्ष रखे गए आरोप प्रथम दृष्टया स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच की मांग करते हैं।
अदालत ने कहा, 'सभी राज्यों को निर्देश दिया जाता है कि छात्र प्रदर्शनों के दौरान गिरफ्तार या हिरासत में लिए गए 18 वर्ष से कम आयु के उन बच्चों को रिहा किया जाए, जिनका कोई आपराधिक इतिहास नहीं है।'
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि छात्र प्रदर्शनों से जुड़े मामलों में गिरफ्तार ऐसे अन्य लोगों को भी रिहा किया जाए, जिनका कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है। हालांकि, इन मामलों की जांच कानून के अनुसार जारी रहेगी।
ये निर्देश भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुनवाई के दौरान दिए। पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल थे। अदालत उन याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी, जिनमें जंतर-मंतर समेत देश के कई राज्यों में हुए छात्र प्रदर्शनों के दौरान पुलिस पर अत्यधिक बल प्रयोग करने के आरोप लगाए गए हैं।
याचिकाओं में आरोप लगाया गया है कि नीट-यूजी 2026 पेपर लीक के विरोध में प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर लाठीचार्ज किया गया, पेलेट गन, आंसू गैस और इलेक्ट्रिक हथियारों का इस्तेमाल किया गया, जो संविधान के अनुच्छेद 14, 19, 20 और 21 का उल्लंघन है।
कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं के उन आरोपों का भी संज्ञान लिया, जिनमें कहा गया कि पेलेट गन के इस्तेमाल से गंभीर चोटें आईं। एक प्रदर्शनकारी की कथित रूप से आंखों की रोशनी चली गई। कीलों वाली लाठियों से स्थायी विकलांगता हुई। एक मीडियाकर्मी पर गंभीर हमला किया गया। सादे कपड़ों में मौजूद कुछ पुलिसकर्मियों सहित पुलिस द्वारा हिंसा की गई।
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने जुनैद मलिक नामक एक प्रदर्शन स्वयंसेवक की ओर से दायर अलग याचिका का उल्लेख किया। उन्होंने आरोप लगाया गया है कि मलिक और उसके परिवार के साथ पुलिस ने मारपीट की। हालांकि, अदालत ने कहा कि इस चरण में वह व्यक्तिगत तथ्यों की जांच नहीं कर रही है। फिर भी उसने माना कि प्रथम दृष्टया छात्रों पर हिंसक हमलों के आरोप सामने आए हैं, जिनकी निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच आवश्यक है।
सीजेआई ने कहा, 'यदि हम हर व्यक्तिगत तथ्य की जांच करने लगें… तो फिलहाल सबसे संतुलित भाषा यही होगी कि प्रथम दृष्टया हिंसा का मामला बनता है। इसी कारण हम इन मामलों की सुनवाई कर रहे हैं।' अदालत ने बिहार से जुड़े उन आरोपों का भी उल्लेख किया, जिनमें कहा गया कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कथित तौर पर एके-47 का इस्तेमाल किया गया।
केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि केंद्र को स्वतंत्र जांच पर कोई आपत्ति नहीं है। हालांकि, उन्होंने अदालत से यह भी अनुरोध किया कि पुलिसकर्मियों पर हुए कथित हमलों के आरोपों पर भी विचार किया जाए। उन्होंने कहा कि जहां एक ओर याचिकाकर्ता पुलिस की बर्बरता का आरोप लगा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर यह भी आरोप हैं कि कुछ आदतन अपराधी और असामाजिक तत्व प्रदर्शन स्थलों में घुस आए और 200 से अधिक पुलिसकर्मियों को घायल कर दिया।
सॉलिसिटर जनरल ने कहा, 'यदि पुलिस ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ बर्बरता की है तो उन्हें दंडित किया जाना चाहिए। लेकिन एक पक्ष की अपनी सच्चाई है, दूसरे पक्ष की अपनी और फिर एक वास्तविक सच्चाई भी होती है।' उन्होंने आगे कहा कि केंद्र सरकार का मानना नहीं है कि छात्रों ने पुलिस पर हमला किया। उन्होंने कहा, 'आदतन अपराधी, उपद्रवी और अवांछित तत्व प्रदर्शन स्थलों में घुसे और उन्होंने पुलिस पर हमला किया। हमें नहीं लगता कि छात्र पुलिस पर हमला करेंगे।'
इस पर अदालत ने कहा कि पुलिसकर्मियों पर हमले के आरोपों की भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। सीजेआई ने कहा, 'पुलिसकर्मियों के साथ हुई घटनाओं की भी जांच जरूरी है। यह पता लगाया जाना चाहिए कि उन पर हमला छात्रों ने किया या किसी अन्य ने।' इस पर सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि राज्यों का भी यही मत है कि पुलिस पर हिंसक हमले छात्रों ने नहीं, बल्कि उपद्रवियों ने किए।
सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि फिलहाल उसके समक्ष मौजूद आरोप स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच का आधार बनाते हैं। अदालत ने कहा, 'याचिकाकर्ताओं द्वारा लगाए गए आरोप इस स्तर पर स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच का मामला बनाते हैं। ऐसी जांच में पुलिसकर्मियों पर हमले और हिंसा के आरोपों की भी जांच की जाएगी।' हालांकि, स्वतंत्र जांच के आदेश से पहले अदालत ने दिल्ली सरकार और अन्य संबंधित राज्यों को अपना पक्ष रखने के लिए समय देना उचित माना। इसके बाद अदालत ने महाराष्ट्र, बिहार, केरल, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और अन्य संबंधित राज्यों के मुख्य सचिवों को नोटिस जारी किया।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि छात्र प्रदर्शनों से जुड़े सभी सीसीटीवी फुटेज, ड्रोन फुटेज, बॉडी कैमरा रिकॉर्डिंग, वायरलेस संचार और अन्य सभी डिजिटल साक्ष्यों को सुरक्षित रखा जाए। अदालत ने संबंधित अधिकारियों और पुलिस को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि ये डिजिटल साक्ष्य सुरक्षित रहें और अगली सुनवाई तक इन्हें सार्वजनिक न किया जाए। साथ ही अदालत ने स्पष्ट किया कि दर्ज एफआईआर की जांच जारी रह सकती है, लेकिन फिलहाल छात्रों के खिलाफ कोई दंडात्मक या जबरन कार्रवाई नहीं की जाएगी।
Updated on:
28 Jul 2026 02:19 pm
Published on:
28 Jul 2026 01:57 pm
