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स्कूलों में लड़कियों के वॉशरूम की कमी पर SC सख्त, 98,000 स्कूलों का मुद्दा फिर पहुंचा सुप्रीम कोर्ट

School Sanitation: स्कूलों में वॉशरूम की कमी को लेकर दायर PIL को सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व में इस मामले में फैसला सुनाने वाली बेंच को भेजने के निर्देश दिए हैं।
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Supreme Court PIL

स्कूलों में लड़कियों के वॉशरूम की कमी पर SC सख्त, photo source@AI

School Sanitation: सुप्रीम कोर्ट में सरकारी स्कूलों में लड़कियों के लिए वॉशरूम और साफ-सफाई की सुविधाओं की कमी को उजागर करने वाली एक PIL पर निर्देश दिए गए हैं। शीर्ष कोर्ट ने संबंधित PIL को उस बेंच के सामने रखने के निर्देश दिए, जिसने पहले इस मामले में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। इस फैसले में पीरियड्स के स्वास्थ्य को जीवन और शिक्षा के मौलिक अधिकार का एक हिस्सा माना गया था।

SC के चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची एवं जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने रीपक कंसल द्वारा केंद्र और अन्य अथॉरिटीज, जिनमें कई राज्य और केंद्र शासित प्रदेश शामिल हैं, के खिलाफ दायर याचिका में दलीलों पर ध्यान दिया।

98,000 से ज्यादा स्कूलों में वॉशरूम नहीं

CJI ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही याचिका में उठाए गए मुद्दों से निपटने के लिए एक पूरा फैसला सुना चुका है और याचिकाकर्ता के वकील से पहले के फैसले और निर्देशों को वेरिफाई करने के लिए कहा। वकील ने NITI आयोग की एक रिपोर्ट का जिक्र किया, जिसमें कहा गया था कि 98,000 से ज्यादा स्कूलों में लड़कियों के लिए अभी भी काम करने वाले वॉशरूम नहीं हैं। उन्होंने कहा कि इस अर्जी पर आगे बढ़ने से पहले वह कोर्ट के पिछले फैसले में दिए गए निर्देशों की जांच करेंगे।

इसके बाद बेंच ने कहा कि जस्टिस जे. बी. पारदीवाला की अगुवाई वाली बेंच ने 30 जनवरी को एक डिटेल्ड फैसला पहले ही पास कर दिया था और कहा कि इस PIL पर भी वही बेंच विचार करे, यह सही होगा। बेंच ने कहा, "इस PIL में उठाए गए मुद्दे बहुत जरूरी हैं।" इसके बाद मामले को जस्टिस पारदीवाला की अगुवाई वाली बेंच के सामने लिस्ट करने का निर्देश दिया गया।

30 जनवरी को बेंच ने सुनाया था फैसला

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और आर. महादेवन के 30 जनवरी के फैसले में सम्मानजनक मासिक धर्म स्वास्थ्य के अधिकार को संविधान के तहत गारंटी वाले जीवन और शिक्षा के अधिकार का हिस्सा माना गया था। अहम फैसले में शीर्ष कोर्ट ने सभी राज्यों और UTs को हर स्कूल, चाहे वह सरकारी हो, अनुदान पाने वाला हो या प्राइवेट हो, काम करने लायक और जेंडर के हिसाब से अलग-अलग टॉयलेट तथा इस्तेमाल करने योग्य पानी की कनेक्टिविटी देने के निर्देश दिए थे।

जस्टिस पारदीवाला ने फैसले में कहा था, "पीरियड से सजा खत्म होनी चाहिए, लड़की की पढ़ाई नहीं।" कोर्ट ने माना था कि आर्टिकल 21 के तहत जीने के अधिकार में मेंस्ट्रुअल हेल्थ का अधिकार भी शामिल है और कहा था कि सुरक्षित, असरदार और सस्ते मेंस्ट्रुअल हाइजीन के तरीकों तक पहुंच लड़की की गरिमा और पढ़ाई में हिस्सा लेने के लिए जरूरी है।

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