
सिर्फ शक के आधार पर जेल में रखना गलत। TISS छात्र अभिरूप पॉल को कोर्ट से जमानत। (सोर्स-ANI)
TISS Student Abhirup Ashim Paul: ‘टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज’ (TISS) के छात्र अभिरूप आशिम पॉल को मुंबई की एक अदालत ने बड़ी राहत दी है। उन्हें उमर खालिद और शरजील इमाम के समर्थन में नारे लगाने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। अदालत ने उन्हें जमानत दे दी। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि केवल शक के आधार पर किसी युवा को जेल में रखना उचित नहीं है। साथ ही, माओवादी विचारधारा से जुड़ी किताबों की PDF मिलने को भी अपने आप में किसी अपराध का सबूत नहीं माना जा सकता।
बता दें पूरा मामला 12 अक्टूबर 2025 का है। उस दिन TISS कैंपस में दिवंगत प्रोफेसर जीएन साईबाबा की पुण्यतिथि पर एक कार्यक्रम आयोजित किया गया था। यह कार्यक्रम संस्थान की अनुमति के बिना होने का आरोप है।
प्रॉसिक्यूशन के मुताबिक, कार्यक्रम के दौरान कुछ छात्रों ने उमर खालिद और शरजील इमाम की रिहाई की मांग को लेकर नारे लगाए थे। दोनों इस समय UAPA से जुड़े एक मामले में जेल में बंद हैं। इसी मामले में TISS रजिस्ट्रार की शिकायत के आधार पर FIR दर्ज की गई। पुलिस ने अभिरूप पॉल पर भी गंभीर आरोप लगाए। पुलिस का दावा था कि उनकी गतिविधियां देश के लिए खतरा पैदा कर सकती हैं और उनका उद्देश्य समुदाय में नफरत फैलाना हो सकता है। बता दें सेशन कोर्ट से अग्रिम जमानत नहीं मिलने के बाद पॉल को 7 अगस्त को गिरफ्तार किया गया था।
मामले की सुनवाई एडिशनल चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट दत्तात्रेय शंकरराव खेडेकर की अदालत में हुई। कोर्ट ने माना कि पॉल से पहले ही पर्याप्त समय तक हिरासत में पूछताछ की जा चुकी है। अदालत ने जांच के रिकॉर्ड को भी देखा। कोर्ट को ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं मिला, जिससे पॉल का संबंध किसी माओवादी संगठन या दूसरे प्रतिबंधित संगठन से साबित हो सके।
जज ने कहा कि सिर्फ माओवाद पर लिखी किताबों की PDF रखना किसी व्यक्ति को माओवादी नहीं बना देता। इसी तरह, जेल में बंद किसी एक्टिविस्ट के समर्थन में कैंपस में नारे लगाना भी अपने आप में देश विरोधी गतिविधि नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसे पर्याप्त सबूत नहीं हैं, जो पहली नजर में पॉल की गतिविधियों को देश विरोधी गतिविधियों या किसी प्रतिबंधित संगठन से जोड़ सकें।
अदालत ने यह भी कहा कि पॉल का प्रोग्रेसिव स्टूडेंट्स फोरम से जुड़ा होना अपने आप में अपराध नहीं है। किसी कार्यक्रम में शामिल होना और नारे लगाना भी तब तक आपराधिक जिम्मेदारी तय करने के लिए पर्याप्त नहीं है, जब तक उसके पीछे अपराध से जुड़ा ठोस सबूत न हो। जांच एजेंसी यह भी स्पष्ट नहीं कर पाई कि पॉल ने सोशल मीडिया के जरिए किसी प्रतिबंधित नेटवर्क को बनाने या उससे फायदा उठाने का प्रयास कैसे किया।
कोर्ट ने बॉम्बे हाई कोर्ट के उस आदेश का भी हवाला दिया, जिसमें सह-आरोपी कामाख्या दास को इसी तरह के मामले में गिरफ्तारी से सुरक्षा मिली थी। अदालत ने पॉल को पर्सनल बॉन्ड और 1 लाख रुपये की प्रोविजनल कैश सिक्योरिटी पर रिहा करने का आदेश दिया। कोर्ट की इस टिप्पणी से मामले में अभिरूप पॉल को फिलहाल बड़ी राहत मिली है।
Updated on:
11 Sept 2026 11:37 am
Published on:
11 Sept 2026 11:37 am
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