
PM Modi Abuse : PM पर कथित आपत्तिजनक टिप्पणी का मामला, हाईकोर्ट ने FIR रद्द करने से किया इनकार (फोटो सोर्स:thc.nic.in)
Prime Minister Abusive Language Case: सोशल मीडिया पर राजनीतिक आलोचना करना लोकतंत्र का अहम हिस्सा है, लेकिन भाषा की मर्यादा टूटने पर कानून की कार्रवाई का रास्ता भी खुल सकता है। त्रिपुरा हाईकोर्ट ने प्रधानमंत्री के खिलाफ कथित आपत्तिजनक और अपमानजनक टिप्पणियों से जुड़े मामलों को रद्द करने से इनकार करते हुए इसी फर्क को रेखांकित किया है। अदालत ने साफ किया कि संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति की आलोचना और उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने वाली कथित अभद्र भाषा को एक ही नजर से नहीं देखा जा सकता।
त्रिपुरा हाईकोर्ट ने प्रधानमंत्री के खिलाफ कथित आपत्तिजनक टिप्पणियों से जुड़े आपराधिक मामलों को खत्म करने से इनकार कर दिया है। अदालत ने कहा कि राजनीतिक असहमति और आलोचना लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा हैं, लेकिन सोशल मीडिया पर किसी व्यक्ति के खिलाफ अपमानजनक, मानहानिकारक या दुर्भावनापूर्ण भाषा का इस्तेमाल अपने आप में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का संरक्षण नहीं पा जाता।
यह मामला कंटेंट क्रिएटर माधबी बिस्वास चक्रवर्ती की ओर से दाखिल दो याचिकाओं से जुड़ा था। उन्होंने ईस्ट अगरतला और वेस्ट अगरतला थानों में दर्ज FIR तथा बाद में दाखिल चार्जशीट को रद्द करने की मांग की थी।
पुलिस की शिकायतों के अनुसार, याचिकाकर्ता ने प्रधानमंत्री के लिए कथित तौर पर आपत्तिजनक और अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया था। इसके अलावा अगरतला के मेयर को लेकर भी कथित तौर पर आपत्तिजनक टिप्पणी किए जाने का आरोप था।
मामले में त्रिपुरेश्वरी माता को लेकर की गई कथित आपत्तिजनक टिप्पणी का भी उल्लेख सामने आया। राज्य की ओर से अदालत में कहा गया कि इन टिप्पणियों से लोगों की भावनाएं आहत हुईं और जांच के दौरान प्रथम दृष्टया मामला सामने आया है।
अदालत ने FIR में दर्ज आरोपों को देखते हुए कहा कि प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि प्रधानमंत्री और राज्य के मेयर के खिलाफ इस्तेमाल किए गए शब्द उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने की मंशा से किए गए थे।
आरोपों के सिलसिले में माधबी बिस्वास चक्रवर्ती को गिरफ्तार किया गया था। बाद में हाईकोर्ट ने 7 जनवरी को उन्हें अंतरिम जमानत दी। पुलिस जांच पूरी होने के बाद दोनों मामलों में चार्जशीट दाखिल की गई और 13 फरवरी को उन्हें स्थायी जमानत मिल गई।
इसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए FIR और चार्जशीट को चुनौती दी। याचिकाकर्ता का तर्क था कि FIR में आपराधिक मानहानि के लिए जरूरी तत्व स्पष्ट रूप से मौजूद नहीं हैं।
उन्होंने यह भी दावा किया कि उनके बयान केवल राजनीतिक विचार या व्यक्तिगत राय थे, जिन्हें संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत मिली अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का संरक्षण हासिल है। याचिका में यह आरोप भी लगाया गया कि उनके खिलाफ कार्रवाई राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित थी।
राज्य सरकार ने इन दलीलों का विरोध करते हुए कहा कि टिप्पणियां जानबूझकर की गई थीं और उनके जरिए प्रधानमंत्री को निशाना बनाया गया। सरकार ने यह भी कहा कि त्रिपुरेश्वरी माता को लेकर की गई कथित आपत्तिजनक बातों से लोगों की धार्मिक भावनाएं प्रभावित हुईं।
राज्य का कहना था कि जांच के दौरान प्रथम दृष्टया अपराध के पर्याप्त आधार सामने आए हैं। इसलिए इस स्तर पर FIR और चार्जशीट को रद्द करना उचित नहीं होगा और मामले में अंतिम फैसला ट्रायल के दौरान ही होना चाहिए।
दो सदस्यीय पीठ में न्यायमूर्ति टी. अमरनाथ गौड़ और न्यायमूर्ति एस. दत्ता पुरकायस्थ ने सुनवाई की। अदालत ने सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए कहा कि आज लोग अलग-अलग मुद्दों पर तेजी से अपनी राय व्यक्त करते हैं, लेकिन यही माध्यम कभी-कभी ऑनलाइन बदनामी और साइबर मानहानि का जरिया भी बन जाता है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संविधान में मिली अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता महत्वपूर्ण मौलिक अधिकार है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि सोशल मीडिया पर किसी की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने वाली सामग्री प्रकाशित करने की खुली छूट मिल जाती है।
अदालत के मुताबिक झूठे दावे, दुर्भावनापूर्ण अभियान या बिना पुष्टि के गंभीर आरोप ऑनलाइन साझा किए जाने पर कानूनी परिणाम हो सकते हैं। ऐसे मामलों में परिस्थितियों के आधार पर मानहानि के लिए नागरिक कार्रवाई या आपराधिक कार्यवाही का रास्ता खुल सकता है।
इस फैसले का सबसे अहम पहलू राजनीतिक आलोचना और कथित अपमानजनक भाषा के बीच अंतर है। लोकतंत्र में प्रधानमंत्री समेत किसी भी सार्वजनिक पदाधिकारी के फैसलों, नीतियों और राजनीतिक विचारों पर सवाल उठाना या आलोचना करना सामान्य राजनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा है।
लेकिन अदालत ने जिस बात पर जोर दिया, वह यह है कि आलोचना के नाम पर इस्तेमाल किए गए शब्दों और उनके संदर्भ की भी कानूनी जांच हो सकती है। यदि कोई बयान किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने वाला, जानबूझकर अपमानित करने वाला या दुर्भावनापूर्ण पाया जाता है, तो केवल उसे 'राय' कह देने से कानूनी कार्रवाई अपने आप खत्म नहीं हो जाती।
सोशल मीडिया की सबसे बड़ी ताकत उसकी तेजी है और यही चीज कई मामलों में सबसे बड़ा जोखिम भी बन जाती है। किसी पोस्ट को कुछ ही मिनटों में हजारों या लाखों लोग देख सकते हैं, साझा कर सकते हैं और उस पर प्रतिक्रिया दे सकते हैं।
अदालत ने भी इस पहलू को रेखांकित किया कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर गलत या नुकसान पहुंचाने वाली जानकारी बहुत तेजी से फैल सकती है। एक बार कोई सामग्री सार्वजनिक हो जाने के बाद उसके स्क्रीनशॉट, री-पोस्ट और दूसरे प्लेटफॉर्म पर साझा किए जाने से उसका प्रभाव और बढ़ सकता है।
यही वजह है कि सोशल मीडिया पर राजनीतिक बहस करते समय तथ्य, भाषा और संदर्भ को लेकर सावधानी महत्वपूर्ण हो जाती है।
इस फैसले को यह समझना जरूरी है कि प्रधानमंत्री की आलोचना पर पूरी तरह रोक लगाने वाला आदेश नहीं माना जा सकता। अदालत ने खुद राजनीतिक आलोचना को लोकतंत्र का हिस्सा बताया है।
मामले में सवाल कथित तौर पर इस्तेमाल की गई भाषा, उसके स्वरूप, उद्देश्य और संभावित प्रतिष्ठागत नुकसान से जुड़ा था। यानी सरकार या प्रधानमंत्री की नीतियों की आलोचना और किसी व्यक्ति को कथित रूप से अपमानित या बदनाम करने वाली सामग्री के बीच कानूनी अंतर हो सकता है।
अंततः किसी बयान में अपराध के सभी तत्व मौजूद हैं या नहीं, यह तथ्य और कानून के आधार पर न्यायिक प्रक्रिया में तय किया जाएगा।
हाईकोर्ट ने माना कि FIR और जांच में सामने आए आरोप ऐसे हैं जिनकी पूरी पड़ताल ट्रायल के स्तर पर की जा सकती है। अदालत ने शिकायतकर्ताओं के मानहानि से जुड़े कानूनी उपाय अपनाने के अधिकार को भी बरकरार रखा।
इसलिए इस चरण पर आपराधिक कार्यवाही को पूरी तरह खत्म करने के बजाय अदालत ने याचिकाओं को खारिज कर दिया। आदेश का संदेश यही है कि सोशल मीडिया पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मौजूद है, लेकिन वह कानून से पूरी तरह मुक्त क्षेत्र नहीं है।
Updated on:
19 Aug 2026 12:48 pm
Published on:
19 Aug 2026 12:48 pm
