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Vande Mataram पर फिर आमने-सामने BJP-कांग्रेस, नितिन नबीन बोले- ‘कांग्रेस आज की मुस्लिम लीग’

Nitin Nabin on Congress: कांग्रेस के पुराने प्रस्ताव को दोहराने से BJP और कांग्रेस के बीच राष्ट्रगीत को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। BJP का आरोप है कि पार्टी राजनीतिक तुष्टिकरण के लिए इतिहास के फैसले को आज की राजनीति में इस्तेमाल कर रही है।
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भारत

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Manoj Vashisth

Aug 20, 2026

Vande Mataram controversy

Vande Mataram controversy: 1937 के फैसले पर कायम कांग्रेस, वंदे मातरम् को लेकर BJP ने उठाए बड़े सवाल (सोर्स: x-ANI)

Vande Mataram Controversy: वंदे मातरम् की पूरी रचना को लेकर शुरू हुआ विवाद अब सीधे सियासी टकराव में बदल गया है। कांग्रेस कार्यसमिति ने 1937 में लिए गए उस फैसले पर कायम रहने का निर्णय किया है, जिसके तहत पार्टी कार्यक्रमों में गीत के पहले दो अंतरों के इस्तेमाल की परंपरा रही है। BJP ने इसे महज पुराना संगठनात्मक फैसला मानने से इनकार करते हुए कांग्रेस पर राष्ट्रगीत के सम्मान को लेकर सवाल खड़े किए हैं। इसी हमले के बीच BJP अध्यक्ष नितिन नबीन ने कांग्रेस की तुलना आज की मुस्लिम लीग से कर दी है।

Vande Mataram Controversy:: 1937 के फैसले से फिर गरम हुई सियासत

कांग्रेस कार्यसमिति ने अपने ताजा रुख में साफ किया है कि पार्टी आयोजनों में वंदे मातरम् के पहले दो अंतरों का ही गायन किया जाएगा। यह फैसला अचानक लिया गया कोई नया निर्णय नहीं है। इसकी जड़ 1937 में हुई कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक तक जाती है।

नेहरू आर्काइव में उपलब्ध जवाहरलाल नेहरू के दस्तावेजों के मुताबिक, अक्टूबर-नवंबर 1937 में कलकत्ता में हुई कार्यसमिति की बैठक में वंदे मातरम् को लेकर मुस्लिम समुदाय के एक वर्ग की आपत्तियों पर चर्चा हुई थी। इसके बाद राष्ट्रीय सभाओं में गीत के पहले दो अंतरों के इस्तेमाल की सिफारिश की गई थी।

यही ऐतिहासिक फैसला अब 2026 की राजनीति में फिर से केंद्र में आ गया है।

नितिन नबीन का कांग्रेस पर सीधा हमला

BJP के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन ने कांग्रेस के इस रुख पर तीखी प्रतिक्रिया दी। उनका आरोप है कि कांग्रेस ने अब वंदे मातरम् के पूरे स्वरूप को लेकर अपने पुराने रुख को बाकायदा संस्थागत रूप दे दिया है।

नबीन ने कहा कि कांग्रेस पहले राष्ट्रगीत के प्रति कथित अनादर को महज संयोग बताने की कोशिश कर रही थी, लेकिन अब कार्यसमिति के प्रस्ताव के जरिए उसने पूर्ण राष्ट्रगीत के गायन से दूरी को औपचारिक रूप दे दिया है।

BJP अध्यक्ष ने इसे वोट बैंक की राजनीति से जोड़ते हुए कांग्रेस पर निशाना साधा और कहा कि पार्टी का यह रवैया उन स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान का भी अपमान है, जिन्होंने वंदे मातरम् से प्रेरणा लेकर आजादी की लड़ाई लड़ी थी।

‘आज की मुस्लिम लीग’ वाला बयान क्यों आया?

इस विवाद का सबसे राजनीतिक हिस्सा नबीन का वह बयान है, जिसमें उन्होंने कांग्रेस की तुलना मौजूदा दौर की मुस्लिम लीग से कर दी।

BJP का तर्क है कि आजादी से पहले मुस्लिम लीग की आपत्तियों के दबाव में कांग्रेस ने कई मुद्दों पर समझौते किए थे और वंदे मातरम् भी उन्हीं विवादों में शामिल था। BJP प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने भी इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का हवाला देते हुए कांग्रेस पर हमला बोला।

हालांकि, इतिहास के दस्तावेजों को देखने पर तस्वीर इससे अधिक जटिल नजर आती है। नेहरू के 1938 के जिन्ना को लिखे पत्र में मुस्लिम लीग की 14 मांगों का उल्लेख है। इनमें वंदे मातरम् को छोड़ने और मुस्लिम लीग के झंडे को कांग्रेस के झंडे के बराबर महत्व देने जैसी मांगें भी दर्ज हैं। वहीं, नेहरू ने कई बिंदुओं पर कांग्रेस की स्थिति स्पष्ट करते हुए अलग-अलग मांगों से असहमति जताई थी।

इसलिए BJP का राजनीतिक निष्कर्ष और उस दौर के मूल दस्तावेज—दो अलग स्तरों पर समझे जाने चाहिए।

वंदे मातरम् पर 1937 में क्या हुआ था?

वंदे मातरम् बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय की रचना है और बाद में यह स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान राष्ट्रीय चेतना का महत्वपूर्ण प्रतीक बन गया। कांग्रेस के 1937 के फैसले के पीछे केवल राजनीतिक दबाव का सवाल नहीं था, बल्कि गीत के बाद के हिस्सों में मौजूद धार्मिक संदर्भों को लेकर उठी आपत्तियों पर भी विचार किया गया था।

नेहरू आर्काइव में दर्ज कांग्रेस कार्यसमिति के फैसले के मुताबिक, समिति ने गीत के राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़े महत्व को स्वीकार करते हुए राष्ट्रीय सभाओं में उसके पहले दो अंतरों के इस्तेमाल की सिफारिश की थी।

यानी आज का विवाद जिस पुराने प्रस्ताव को लेकर है, वह ब्रिटिश शासन के दौर में राष्ट्रीय आंदोलन के भीतर उठे एक बड़े राजनीतिक और सामाजिक सवाल का हिस्सा था।

अब संसद के फैसले ने विवाद को और बड़ा कर दिया

मामला सिर्फ कांग्रेस के आंतरिक कार्यक्रमों तक सीमित नहीं है। जुलाई 2026 में संसद में वंदे मातरम् को राष्ट्रीय सम्मान से जुड़े कानूनी संरक्षण के दायरे में लाने की दिशा में भी कदम बढ़ा है।

रिपोर्टों के मुताबिक, प्रस्तावित Prevention of Insults to National Honour (Amendment) Bill, 2026 के जरिए वंदे मातरम् को राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रगान की तरह कानूनी संरक्षण देने का प्रावधान किया गया है। प्रस्तावित व्यवस्था में जानबूझकर राष्ट्रगीत का अपमान या उसके गायन में व्यवधान डालने पर सजा का प्रावधान है।

यही वजह है कि BJP कांग्रेस के 1937 के प्रस्ताव को सिर्फ पार्टी की आंतरिक परंपरा नहीं मान रही। उसका तर्क है कि जब संसद राष्ट्रगीत के सम्मान को कानूनी संरक्षण देने की दिशा में आगे बढ़ रही है, तब कांग्रेस का पुराना प्रस्ताव दोहराना राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण संदेश देता है।

कांग्रेस के सामने भी बड़ा सवाल

दूसरी तरफ कांग्रेस का रुख यह है कि वह अपने ऐतिहासिक प्रस्ताव और पार्टी कार्यक्रमों में अपनाई गई परंपरा पर कायम है। 1937 के फैसले में भी पहले दो अंतरों को राष्ट्रीय सभाओं के लिए उपयुक्त माना गया था।

यही अंतर इस विवाद की असली जड़ है—क्या किसी राजनीतिक दल का ऐतिहासिक आंतरिक प्रस्ताव आज भी उसके कार्यक्रमों में उसी रूप में लागू हो सकता है, या राष्ट्रीय प्रतीकों से जुड़े मौजूदा कानूनी और राजनीतिक माहौल में उसे नए सिरे से देखा जाना चाहिए?

इतिहास बनाम मौजूदा राजनीति

वंदे मातरम् को लेकर मौजूदा विवाद में दो अलग-अलग दौर एक-दूसरे के सामने खड़े दिखाई दे रहे हैं। एक तरफ 1937 का वह दौर है, जब कांग्रेस राष्ट्रीय आंदोलन के भीतर विभिन्न समुदायों की आपत्तियों और राजनीतिक परिस्थितियों के बीच रास्ता निकाल रही थी। दूसरी तरफ आज का भारत है, जहां राष्ट्रीय प्रतीकों और राष्ट्रवाद को लेकर राजनीतिक दलों के बीच तीखी प्रतिस्पर्धा है।

BJP इस मुद्दे को राष्ट्र सम्मान और कांग्रेस की कथित वोट बैंक राजनीति से जोड़ रही है, जबकि कांग्रेस का पुराना फैसला ऐतिहासिक संदर्भ में एक अलग राजनीतिक परिस्थिति का परिणाम था।

इसलिए वंदे मातरम् पर छिड़ी यह बहस केवल दो अंतरों बनाम पूरी रचना की बहस नहीं रह गई है। इसके साथ इतिहास, राष्ट्रवाद, अल्पसंख्यक राजनीति, संसद की कानून बनाने की शक्ति और राजनीतिक दलों की विरासत—सभी सवाल एक साथ जुड़ गए हैं।

और अब असली सवाल यही है कि 1937 में लिया गया फैसला 2026 की राजनीति में सिर्फ इतिहास का हिस्सा रहेगा या आने वाले दिनों में यह मुद्दा BJP-कांग्रेस के बीच एक और बड़े वैचारिक संघर्ष की जमीन तैयार करेगा।**