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जब भारी पड़ गया पुलिस एक्शन: आग में घी बना था जेपी पर लाठीचार्ज, मोरारजी की गई थी कुर्सी, नेहरू को मांगनी पड़ी थी मांग

CJP Jantar Mantar Protest के खिलाफ पुलिसिया ताकत का प्रयोग कर क्या मोदी सरकार ने चूक कर दी? कई बार देखा गया है कि जनता के आंदोलन को कुचलने के लिए की गई पुलिस कार्रवाई का असर उल्टा हुआ है। इसके चलते सत्ताधीशों की कुर्सी तक चली गई है। जानिए चार ऐसे उदाहरण:
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CJP प्रदर्शनकारी को पकड़कर ले जाती दिल्ली पुलिस (सोर्स: ANI)

नई दिल्ली में 20 जुलाई को कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के आंदोलन में पुलिस कार्रवाई के बाद आंदोलन और तेज हो गया है। आंदोलन को न केवल हर ओर से समर्थन मिलने लगा है, बल्कि यह दिल्ली से बाहर, देश के अनेक शहरों में फैल गया है। विपक्षी नेताओं के अलावा फिल्मी हस्तियां भी छात्रों के समर्थन में बयान देने लगी हैं। सरकार भी बातचीत के लिए उत्सुक और लगातार प्रयास कर रही है। शायद, यही देख कर सीजेपी ने 24 जुलाई को देशव्यापी प्रदर्शन का ऐलान भी कर दिया है।

दिल्ली में प्रदर्शनकारियों पर पुलिस के बल प्रयोग के बाद आंदोलनकारियों के निशाने पर सीधे तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आ गए हैं। इससे पहले मुख्य रूप से शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान उनके निशाने पर थे।

सीजेपी के 'चलो संसद' के आह्वान को नाकाम करने के लिए की गई पुलिस कार्रवाई ने इस आंदोलन में आग में घी का काम किया है। आजाद भारत में ऐसा पहले भी हो चुका है। यहां ऐसे चार आंदोलनों के बारे में हम बता रहे हैं:

1974: जेपी पर लाठीचार्ज के बाद भड़क गया था छात्र आंदोलन

लोकनायक जय प्रकाश नारायण (जेपी) इंदिरा सरकार को जनविरोधी मुद्दों पर लगातार घेरते रहते थे। 1 नवंबर, 1974 को दिल्ली में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने जेपी के साथ लंबी बैठक की। इसमें उन्होंने अपनी ओर से कुछ प्रस्ताव देते हुए जेपी से आंदोलन खत्म करने के लिए कहा। जेपी को प्रस्ताव समझौतावादी लगा। वह मना करके चले आए। तीन दिन बाद ही, 4 नवंबर को पटना में जेपी पर लाठीचार्ज हो गया।

नानाजी देशमुख ने जेपी को बचाने की कोशिश की। इस दौरान जेपी गिर गए और नानाजी पर कई लाठियां पड़ीं। वह लहूलुहान हो गए थे। यह दृश्य फोटो पत्रकार रघु राय के कैमरे में कैद हो गया। उन दिनों मोबाइल फोन और सोशल मीडिया का जमाना तो था नहीं। अखबार में जब यह फोटो छपा तो हंगामा मच गया। जेपी के समर्थक बौखला उठे और जेपी का आंदोलन आग की तरह फैलने लगा।

2007: नंदीग्राम में पुलिस फायरिंग ने पश्चिम बंगाल में रखी नए राजनीतिक युग की नींव

2007 में नंदीग्राम (पश्चिम बंगाल) और सिंगूर में भी यही दिखा। नंदीग्राम में जमीन अधिग्रहण का विरोध कर रहे लोगों पर 14 मार्च, 2007 को हुई फायरिंग में 14 लोगों की जान गई और कई घायल हुए। लेकिन, इससे विरोध थमा नहीं। यही विरोध पश्चिम बंगाल से वामपंथियों का 34 साल पुराना शासन खत्म करने का आधार बन गया।

1952: नेहरू को तुरंत लेना पड़ा अलग आंध्र राज्य बनाने का फैसला

1952 में 'आंध्रा मूवमेंट' के दौरान 58 दिन की भूख हड़ताल के बाद 15 दिसंबर को पोट्टी श्रीरामुलु की मृत्यु हो गई थी। इससे आंध्र प्रदेश के कई शहरों में लोगों का गुस्सा भड़क गया। बेकाबू लोगों को काबू करने के लिए पुलिस ने गोलियां चलाईं। इसमें सात लोग मारे गए। इसके बाद तो आंदोलन और भड़क गया।

अपनी किताब 'इंडिया आफ्टर गांधी: द हिस्ट्री ऑफ द वर्ल्ड्स लार्जेस्ट डेमोक्रेसी' में राम चंद्र गुहा बताते हैं कि उस समय के प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू को यकीन हो गया था कि अलग आंध्र राज्य बनाए बिना लोगों को शांत करना संभव नहीं है। उन्होंने 19 दिसंबर को अलग प्रदेश की घोषणा कर दी।

1956: मोरारजी देसाई की गई कुर्सी

1956 में जब बंबई को महाराष्ट्र में मिलाने को लेकर आंदोलन चल रहा था तब मोरारजी देसाई मुख्यमंत्री थे। उन्होंने प्रदर्शनकारियों को 'देखते ही गोली मारने' के आदेश जारी कर दिए। 16 जनवरी, 1956 को मजदूर, छात्र सहित बड़ी संख्या में आम नागरिक फ्लोरा फाउंटेन (आज का हुतात्मा चौक) पर प्रदर्शन कर रहे थे। पुलिस ने फायरिंग कर दी। एक दर्जन से अधिक लोग मारे गए। सीएम ने पुलिस फायरिंग को जायज ठहराया, लेकिन अंतत: देसाई को मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़नी पड़ी।