
नेहरू परिवार से पुराना नाता होने के बावजूद जेपी को इंदिरा जहां गलत लगीं, वहां उन्होंने उनका खुल कर विरोध किया। (Photo Source: AI)
इंदिरा गांधी ने आपातकाल (Emergency) लगाने का फैसला भले ही 1975 (25 जून) में लिया था, लेकिन लोकनायक जय प्रकाश नारायण (जेपी) ने उन्हें पहले ही चेताया था। कमला और जवाहर लाल नेहरू की बेटी होने के नाते इंदिरा को लेकर जेपी के मन में एक लगाव था। 1966 में जब वह प्रधानमंत्री बनी थीं, तब जेपी ने बधाई भी दी थी और समय-समय पर सरकार की नीतियों का भी समर्थन किया था। 1969 में राष्ट्रपति चुनाव के दौरान इंदिरा के उठाए गए कदमों से जेपी नाराज थे। उन्होंने यह नाराजगी भी उनसे खुल कर जाहिर की।
1971 में जेपी ने इंदिरा को खत लिखा और बेबाकी से बताया, 'राष्ट्रपति चुनाव के दौरान आपने जो कुछ भी किया, वह मुझे जरा भी अच्छा नहीं लगा। वैसे मुझे मालूम था कि राजनीतिक रूप से आपके लिए उस वक्त जीवन-मरण का प्रश्न था। अब आपके पास पूरी सत्ता है। ईश्वर से मेरी यही प्रार्थना रहेगी कि वह आपके मन में कोई अपवित्र विचार नहीं आने दें।'
इंदिरा को जेपी कि यह बेबाकी शायद पसंद नहीं आई। उन्होंने जवाबी खत में लिखा, 'आप मुझे कितना कम जानते या समझते हैं। मैंने कभी भी अपनी राजनीतिक या अन्य पहचान को अहमियत नहीं दी। उस समय सवाल मेरे नहीं, बल्कि कांग्रेस पार्टी और देश के भविष्य का था।'
इंदिरा से जेपी के संबंध उनके फैसलों और सरकार की नीतियों पर ही आधारित थे। बांग्लादेश के निर्माण में इंदिरा की भूमिका की जेपी ने तारीफ की। मध्य प्रदेश में डकैतों के आत्मसमर्पण और उन्हें फांसी देने के मुद्दे पर भी दोनों के बीच कोई मतभेद नहीं था। लेकिन, सरकार की मनमानापूर्ण कार्यशैली और एक ही हाथ में सारी शक्ति केन्द्रित होते जाने के साथ जेपी का इंदिरा से मतभेद बढ़ने लगा।
इंदिरा ने तीन जजों की वरिष्ठता को नजरअंदाज करके जस्टिस एएएन राय को सुप्रीम कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश बना दिया। इस पर 1973 में जेपी ने इंदिरा को चिट्ठी लिखी और चिंता जताई कि कहीं यह कदम सुप्रीम कोर्ट को सरकार की इशारों पर काम करने वाली संस्था बनाने के मकसद से तो नहीं उठाया गया?
1973 में ही जेपी ने सांसदों के नाम चिट्ठी लिखी और उन्हें आगाह किया कि नागरिकों की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक संस्थानों की ताकत कम की जा रही है। उन्होंने भ्रष्टाचार का मुद्दा भी उठाया और चुनावी व शैक्षणिक सुधारों की भी बात की। लेकिन, पीएम ने उनकी बातों को गंभीरता से नहीं लिया। उनका मानना था कि जेपी भटक गए हैं और सत्ता हथियाने की कोशिश कर रहे हैं।
अगले साल, यानि 1974 (मार्च) में इंदिरा से जेपी के रिश्ते और कड़वे हो गए। ऐसा इसलिए, क्योंकि बिहार में भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन कर रहे छात्रों ने जेपी से नेतृत्व करने के लिए कहा। जेपी ने उनकी बात मान ली।
मई 1974 में इंदिरा ने जेपी को चिट्ठी लिखी और उनकी सेहत के बारे में पूछा। साथ ही यह भी लिखा कि दोनों परिवारों के बीच लंबे संबंध को देखते हुए दोनों को निजी कड़वाहट भुला देनी चाहिए और एक-दूसरे की मंशा पर संदेह नहीं करना चाहिए। यह चिट्ठी लिखने से ऐन पहले इंदिरा ने भुवनेश्वर में एक भाषण में सर्वोदय नेताओं पर निशाना साधते हुए कहा था कि इन नेताओं के अमीरों से रिश्ते हैं और ये आलीशान गेस्ट हाउस में ठहरते हैं। जेपी ने लिखा कि उनकी इस टिप्पणी ने उन्हें बड़ा आहत किया है। इंदिरा ने जवाब दिया कि वह टिप्पणी उनके लिए नहीं थी। उन्होंने अपनी बात पर खेद जताने से इंकार कर दिया।
कूमी कपूर ने अपनी किताब 'द इमर्जेंसी - ए पर्सनल हिस्ट्री' में बताया है कि 1 नवम्बर, 1974 को दिल्ली में जेपी और इंदिरा के बीच लंबी बैठक हुई। पीएम ने समझौते का एक फॉर्मूला दिया। इसके तहत वह बिहार सरकार को बर्खास्त करने के लिए तैयार थीं और बदले में जेपी से आंदोलन खत्म करने के लिए कह रही थीं। साथ ही किसी दूसरे राज्य की विधान सभा भंग करने संबंधी मांग नहीं करने की भी शर्त थी। जेपी ने मना कर दिया।
मीटिंग कड़वाहट के साथ और बेनतीजा खत्म हो गई। इसके कुछ ही दिन बाद पटना में जेपी पर पुलिस ने लाठियां बरसाईं। नाना देशमुख ने उन्हें बचाने की कोशिश की। इस दौरान जेपी गिर गए। यह दृश्य कैमरे में कैद हो गया और अगले दिन सभी अखबारों में छपा। इसके बाद तो जेपी और इंदिरा में आर-पार की लड़ाई तय हो गई। जेपी का आंदोलन आग की तरह फैलने लगा।
जेपी को हर जगह निशाना बनाया जाने लगा। लुधियाना में जब वह ट्रेन से उतर रहे थे तो किसी ने पीछे से उनकी गर्दन तोड़ने की कोशिश की। कलकत्ता में कुछ कांग्रेसियों ने उनकी कार को घेर कर लाठी से वार किया। पटना में कांग्रेस एमएलए के फ्लैट से जेपी के जुलूस पर फायरिंग की गई। कांग्रेस की सहयोगी सीपीआई ने जेपी को राष्ट्र-विरोधी (anti-national) करार दिया। जेपी ने इसका करारा जवाब दिया, 'जिस दिन जेपी देशद्रोही हो जाएगा, उस दिन देश में एक भी देशभक्त नहीं रहेगा।'
जब इंदिरा गांधी के खिलाफ इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला आया तो जेपी ने उनका इस्तीफा मांगा और 29 जून से 5 जुलाई, 1975 तक इसके लिए देश भर में अभियान चलाने की घोषणा की। मोरारजी देसाई ने एक इंटरव्यू में कहा, 'यह महिला हमारे आंदोलन से बच नहीं सकती। इन्हें हम इस्तीफा देने के लिए मजबूर कर देंगे।' लेकिन इससे पहले ही इंदिरा ने इमर्जेंसी (आपातकाल) लगा दी और देश की राजनीति की दिशा ही बदल गई। जेपी 26 जून को तड़के तीन बजे गिरफ्तार कर लिए गए।
लोकनायक जयप्रकाश नारायण के बारे में जानने के लिए ये वीडियो देख सकते हैं
Updated on:
25 Jun 2026 06:11 pm
Published on:
25 Jun 2026 10:04 am
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