
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग कजान में। (फाइल फोटो: MEA/DD)
BRICS Summit in Delhi: लद्दाख के गलवान में साल 2020 में भारतीय सेना और चीनी सेना के बीच हिंसक झड़प के बाद दोनों देशों की बीच दूरियां बढ़ गई थी। गलवान झड़प के बाद दोनों देशों के बीच सीमाओं पर तनाव की स्थिति बन गई थी। अब भी समय समय पर दोनों देशों के बीच सीमा विवाद की खबरें सामने आती रहती है, लेकिन साल 2025 से रिश्ते सुधरने के संकेत मिल रहे हैं। सीमा पर भी तनाव कम हुआ है। पिछले साल भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के SCO शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए चीन के तिनजियांग पहुंचे थे। अब 7 साल बाद चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग भारत दौरे पर आ रहे हैं। इस पर एक्सपर्ट्स ने अपनी राय जाहिर की है।
रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग अगले महीने नई दिल्ली में ब्रिक्स समिट में शामिल होने के लिए भारत आ सकते हैं। उनके साथ 400 अधिकारियों का बड़ा प्रतिनिधिमंडल भी होगा। अगर बीजिंग की तरफ से शी के नई दिल्ली आने पर मुहर लग जाती है तो यह विवादित सीमा पर सालों से चले आ रहे तनाव के बाद बीजिंग और नई दिल्ली के बीच संबंधों को बेहतर बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है।
यात्रा की तैयारियों से जुड़े एक भारतीय सूत्र ने बताया कि चीनी अधिकारी होटल बुकिंग और सुरक्षा व्यवस्था पर पहले से काम कर रहे हैं। दो अन्य सूत्रों के अनुसार शी के साथ आने वाला दल 2019 वाली उनकी पिछली यात्रा से काफी बड़ा होगा। तब 200 से कम अधिकारी साथ थे।चीन ने आधिकारिक तौर पर अभी तक यात्रा की पुष्टि नहीं की है। विदेश मंत्रालय ने कहा कि बीजिंग ब्रिक्स सहयोग को महत्व देता है और मेजबान भारत का समर्थन करता है। लेकिन शी की यात्रा व्यवस्था को लेकर फिलहाल कोई जानकारी नहीं दी जा सकती।
ब्रिक्स समिट से पहले राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल भी बीजिंग गए और चीनी विदेश मंत्री वांग यी से मिले। सीमा विवाद उस मुलाकात का मुख्य मुद्दा रहा। शी की संभावित यात्रा दोनों सरकारों को सीधी बातचीत का मौका दे सकती है। लंबित मुद्दों को सुलझाने और विश्वास बढ़ाने की दिशा में ये एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है। भारत के लिए ये समिट दोहरा मौका है। एक तरफ चीन के साथ द्विपक्षीय चिंताओं पर बातचीत और दूसरी तरफ ब्रिक्स मंच पर वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक मुद्दों पर अपनी बात रखने का अवसर। सीमा पर शांति और स्थिरता दोनों देशों के लिए फायदेमंद रहेगी। अभी सब कुछ संभावनाओं के स्तर पर है। आधिकारिक पुष्टि का इंतजार है। लेकिन तैयारियों के संकेत साफ बता रहे हैं कि नई दिल्ली और बीजिंग के बीच बर्फ पिघलाने की कोशिशें तेज हैं।
बीजिंग स्थित भारतीय दूतावास ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर इस मुलाकात की पुष्टि की। दूतावास के अनुसार, दोनों नेताओं ने दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व के बीच बनी सहमति का पालन करते हुए द्विपक्षीय सहयोग को बढ़ाने की प्रतिबद्धता जताई। NSA डोभाल और चीनी उपराष्ट्रपति के बीच हुई यह बातचीत 25वें दौर की विशेष प्रतिनिधि वार्ता के लिए सकारात्मक माहौल तैयार करती है।
विदेश मामलों के जानकार वाइल अव्वाद ने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की चीन यात्रा को बेहद अहम बताया है। उनके मुताबिक भारत का एनएसए को बीजिंग भेजना खुद में एक मजबूत संदेश है, जिसका मतलब है कि भारत चीन से अच्छे रिश्ते बनाने को तैयार है, लेकिन इसके लिए सीमा पर शांति और स्थिरता जरूरी शर्त है। अव्वाद के अनुसार, आर्थिक सहयोग और भरोसा बढ़ाने के किसी भी कदम से पहले सीमा विवाद सुलझाना जरूरी है। उन्होंने यह भी कहा कि मौजूदा दौर में जब एशिया में तेजी से भू-राजनीतिक बदलाव हो रहे हैं, ऐसे में भारत और चीन का साथ आना दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया की स्थिरता के लिए बेहद जरूरी है।
विदेश मंत्री एस जयशंकर के हाल के बयान पर टिप्पणी करते हुए अव्वाद ने कहा कि भारत सरकार की मंशा साफ है, वह पड़ोसी के साथ स्थिरता चाहती है। हालांकि उन्होंने यह भी साफ किया कि अभी तक चीन की तरफ से राष्ट्रपति शी जिनपिंग के भारत दौरे को लेकर कोई पुष्टि नहीं हुई है।
दूसरे एक्सपर्ट रॉबिंदर सचदेव ने इस यात्रा के समय को अहम बताया। उनके मुताबिक यह दौरा 18वें ब्रिक्स सम्मेलन से ठीक पहले हो रहा है, जो भारत की अध्यक्षता में दिल्ली में होने वाला है, और जिसमें शी जिनपिंग के आने और पीएम मोदी से द्विपक्षीय मुलाकात की संभावना जताई जा रही है। सचदेव का कहना है कि अब वक्त आ गया है कि भारत और चीन सीमा विवाद को ईमानदारी से सुलझाने पर काम करें।
Updated on:
25 Aug 2026 01:16 pm
Published on:
25 Aug 2026 01:16 pm
