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Aishe Ghosh 2021 Protest Case: JNUSU की पूर्व अध्यक्ष आइशी घोष के खिलाफ जारी गैर-जमानती वारंट पर रोक

JNUSU Former President: दिल्ली की एक अदालत ने जेएनयू छात्र संघ की पूर्व अध्यक्ष आइशी घोष के खिलाफ जारी गैर-जमानती वारंट के तामील पर फिलहाल रोक लगा दी है। पांच साल पुराने बंग भवन प्रदर्शन मामले में यह फैसला ठीक ऐसे समय में आया है, जब एक दिन पहले ही पार्टी कार्यालय में पुलिस के पहुंचने पर भारी विवाद खड़ा हो गया था।
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Delhi Court Stays NBW Against Ex-JNUSU President Aishe Ghosh

Aishe Ghosh : आइशी घोष मामले में कोर्ट से अंतरिम राहत, NBW पर लगी रोक (फोटो सोर्स:barandbench)

CPI(M) Leader Aishe Ghosh: देश की राजधानी की सियासत और कानूनी गलियारों में उस वक्त हलचल तेज हो गई, जब पटियाला हाउस कोर्ट की न्यायिक मजिस्ट्रेट (प्रथम श्रेणी) विजयाश्री राठौर ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) की छात्र नेता और जेएनयू छात्र संघ की पूर्व अध्यक्ष आइशी घोष को बड़ी राहत दी। अदालत ने उनके खिलाफ जारी गैर-जमानती वारंट (NBW) के क्रियान्वयन पर अगली सुनवाई तक रोक लगा दी है।

यह कानूनी मोड़ तब आया है जब महज 24 घंटे पहले, यानी 28 जुलाई को, माकपा (CPI-M) ने दिल्ली पुलिस पर आरोप लगाया था कि पुलिस बल दिल्ली स्थित उनके केंद्रीय मुख्यालय 'एकेजी भवन' में अवैध रूप से घुस आया और आइशी घोष को गिरफ्तार करने की कोशिश की। सोशल मीडिया पर इस वाकये के कई वीडियो भी वायरल हुए, जिसमें राज्यसभा सांसद जॉन ब्रिटास पुलिसकर्मियों से वारंट और कार्रवाई के प्रोटोकॉल पर सवाल जवाब करते दिखे थे।

Aishe Ghosh 2021 Protest Case:: जानिए क्या है 2021 का बंग भवन प्रदर्शन मामला

जिस मामले में पुलिस की यह ताबड़तोड़ कार्रवाई देखने को मिली, उसकी जड़ें साल 2021 के एक विरोध-प्रदर्शन से जुड़ी हैं।

आंदोलन की वजह: कोलकाता में सीएए-एनआरसी (CAA-NRC) के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर हुई पुलिस कार्रवाई के विरोध में दिल्ली स्थित बंग भवन के बाहर प्रदर्शन आयोजित किया गया था।

दर्ज धाराएं: इस मामले में आइशी घोष और अन्य कार्यकर्ताओं के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 188 (सरकारी सेवक के आदेश की अवहेलना), धारा 34 (समान मंशा) और धारा 447 (अनाधिकृत प्रवेश/आपराधिक अतिचार) के तहत मामला दर्ज किया गया था।

वारंट क्यों जारी हुआ?: अदालती सुनवाई में उपस्थित न होने के कारण कोर्ट ने पहले 12 दिसंबर 2024 और फिर 11 अप्रैल 2026 को उनके खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किए थे।

अदालत में क्या हुआ?

अदालत के समक्ष आइशी घोष के कानूनी वकील ने दलील दी कि पिछली तारीखों पर छात्र नेता की अनुपस्थिति अपरिहार्य परिस्थितियों और व्यस्तताओं की वजह से हुई थी, न कि जानबूझकर अदालत की अवहेलना करने के इरादे से।
तर्कों को सुनने के बाद मजिस्ट्रेट विजयाश्री राठौर ने गैर-जमानती वारंट पर अंतरिम रोक लगाते हुए आइशी घोष को आगामी सुनवाई की तारीख पर व्यक्तिगत रूप से अदालत के समक्ष उपस्थित होने का कड़ा निर्देश दिया है।

पुलिस का पक्ष और वामपंथियों के सियासी आरोप

इस पूरे घटनाक्रम पर दिल्ली पुलिस और वामपंथी नेताओं के रुख पूरी तरह आमने-सामने हैं:

दिल्ली पुलिस की सफाई: न्यू दिल्ली जिला पुलिस का कहना है कि उनकी टीम केवल अदालत द्वारा जारी गैर-जमानती वारंट की प्रक्रिया का पालन करने AKG भवन गई थी। पुलिस ने किसी भी तरह की राजनीतिक दुर्भावना या हालिया जंतर-मंतर विरोध प्रदर्शनों से इस कार्रवाई को जोड़े जाने के आरोपों को पूरी तरह खारिज किया।

माकपा और एसएफआई का पलटवार: दूसरी तरफ, स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI) और माकपा नेताओं का आरोप है कि केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस पुराने मुकदमों को ढाल बनाकर छात्र आंदोलनों की प्रमुख आवाजों को निशाना बना रही है। हाल ही में हुए जंतर-मंतर के बड़े छात्र आंदोलनों में आइशी घोष की सक्रिय भूमिका रही है, जिसे लेकर विपक्ष ने इस पूरी कार्रवाई को 'राजनीतिक प्रतिशोध' करार दिया है।

फिलहाल, अदालत के इस आदेश के बाद पुलिस की संभावित गिरफ्तारी की कार्रवाई थम गई है, लेकिन यह मामला अब केवल कानूनी लड़ाई तक सीमित न रहकर राजनीतिक बहस का बड़ा केंद्र बन चुका है।

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