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जहां तुलसी ने राम को देखा, वहीं आज भी सांस लेती है मानस की स्मृति

तुलसी जयंती विशेष : चित्रकूट में तुलसीदास की प्रतिमा से लेकर चार सदियों पुरानी हस्तलिखित पांडुलिपि तक, हर कदम पर मिलते हैं मानस के निशान
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सतना

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Ramashankar Sharma

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Updated: 19 Aug 2026, 9:25 AM IST

tulsidas chitrakoot

सतना। मंदाकिनी के किनारे उतरती शाम, कामदगिरि की परिक्रमा और रामघाट पर गूंजती रामधुन... चित्रकूट में राम केवल आस्था नहीं हैं, बल्कि यहां की मिट्टी, पहाड़ और नदी में रचे-बसे हैं। इसी चित्रकूट से जुड़ा एक और नाम है, जिसने रामकथा को संस्कृत के विद्वानों की चौखट से निकालकर जन-जन की भाषा में पहुंचाया वो है गोस्वामी तुलसीदास।

तुलसी जयंती पर चित्रकूट को देखने का नजरिया बदल जाता है। यहां तुलसी केवल इतिहास के पन्नों में नहीं मिलते। उनकी स्मृतियां मंदिरों में हैं, प्रतिमाओं में हैं, गुफाओं और साधना स्थलों की परंपरा में हैं और सबसे बढ़कर उस हस्तलिखित मानस की पांडुलिपि में हैं, जिसे सदियों से श्रद्धा के साथ सुरक्षित रखा गया है। तुलसी को महसूस करना है तो रामघाट में स्थापित उनकी प्रतिमा भी है जिसके बारे में किंवदंती है कि तुलसीदास का इसी स्थल पर भगवान राम से साक्षात्मकार हुआ था।

चित्रकूट में तुलसी की प्रतिमा, सामने राम की कथा

जानकीकुंड स्थित तुलसी पीठ आज तुलसीदास की स्मृति को जीवंत रखने वाले प्रमुख केंद्रों में है। यहां कांच मंदिर में गोस्वामी तुलसीदास की प्रतिमा प्रतिष्ठित है। तुलसी पीठ की स्थापना जगद्गुरु रामभद्राचार्य ने 1987 में तुलसी जयंती के अवसर पर की थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी 2023 में चित्रकूट प्रवास के दौरान तुलसी पीठ के कांच मंदिर पहुंचे थे। तुलसी पीठ परिसर का रामचरितमानस मंदिर भी अपने आप में अनूठा है। यहां मानस की कथा को दीवारों और चित्रों के माध्यम से उकेरा गया है। यानी जिस ग्रंथ ने सदियों से घर-घर में रामकथा पहुंचाई, उसी मानस को चित्रकूट में स्थापत्य और दृश्य रूप में भी देखा जा सकता है।

तुलसीदास कृत रामचरितमानस की पांडुलिपि

चित्रकूट की तुलसी परंपरा का सबसे रोमांचक अध्याय हस्तलिखित रामचरितमानस से जुड़ा है। कामदगिरि परिक्रमा मार्ग स्थित महलन मंदिर में तुलसीदास के गुरु नरहरिदास से जुड़ी परंपरा के बीच रामचरितमानस की पुरानी हस्तलिखित पांडुलिपियां संरक्षित होने का दावा है। यहां अरण्यकांड, किष्किंधाकांड और उत्तरकांड की पांडुलिपियां तथा अयोध्याकांड का कुछ हिस्सा सुरक्षित बताया जाता है। इन पांडुलिपियों को लेकर स्थानीय परंपरा में इन्हें तुलसीदास के हाथ से लिखा हुआ माना जाता है। यहां मानस सिर्फ पढ़ा नहीं जाता, महसूस किया जाता है। कामदगिरि की परिक्रमा करते श्रद्धालु जब मानस की चौपाइयां गुनगुनाते हैं तो ऐसा लगता है जैसे पांच शताब्दी पहले की आवाज आज भी इसी वनभूमि में कहीं मौजूद है।

तुलसी ने भाषा बदली, चित्रकूट ने कथा को अपना लिया

तुलसीदास की सबसे बड़ी साहित्यिक उपलब्धि केवल राम की कथा लिखना नहीं थी। उन्होंने ऐसी भाषा चुनी जिसे सामान्य जन समझ सके। अवधी में लिखी रामचरितमानस ने रामकथा को घर-घर तक पहुंचाया। और चित्रकूट ने इस कथा को अपनी भौगोलिक और आध्यात्मिक पहचान का हिस्सा बना लिया। रामघाट के किनारे आज यहां तुलसीदास की प्रतिमा के सामने श्रद्धालु सिर झुकाते हैं। मानस मंदिर में रामकथा के दृश्य देखते हैं। कामदगिरि की परिक्रमा में मानस की चौपाइयां सुनाई देती हैं और दूसरी ओर सदियों पुरानी पांडुलिपियां इस बात की याद दिलाती हैं कि कभी इसी परंपरा को कागज पर उतारने के लिए कलम चली थी। तुलसी जयंती पर चित्रकूट की यही सबसे बड़ी पहचान है यहां तुलसीदास बीते हुए कवि नहीं लगते। वे प्रतिमा में हैं, पांडुलिपि में हैं, चौपाइयों में हैं और उस रामभक्ति में हैं, जो आज भी मंदाकिनी के किनारे उतनी ही सहजता से सुनाई देती है।