
विधायी कार्य को महत्त्व दें सभी दल
संसद का मानसून सत्र 19 जुलाई से होने जा रहा है। 13 अगस्त तक चलने वाले इस सत्र में 19 बैठकें होने की संभावना है। कोरोना महामारी आने के बाद से पिछले साल शीतकालीन सत्र हो नहीं पाया और बजट सत्र भी समय से पहले समाप्त हो गया। कहा जा सकता है कि बीते सवा साल में संसद सत्र पहले की तरह नहीं चल पाया। देश आज कोरोना के कहर से उबरने की जद्दोजहद में डूबा है। तीसरी लहर की आशंका को लेकर केंद्र सरकार से लेकर राज्य सरकारें चिंतित हैं। सरकारों की आर्थिक हालत खस्ता है तो महंगाई ने आमजन का जीना दुश्वार कर दिया है। पिछले सवा साल में कोरोना से संक्रमित हुए तीन करोड़ से अधिक भारतीयों में से चार लाख अपनी जान गंवा चुके हैं तो लगभग साढ़े चार लाख लोग अब भी कोरोना से उबरने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
ऐसे में संसद के मानसून सत्र का महत्त्व और अधिक बढ़ जाता है। साथ ही राजनीतिक दलों की जिम्मेदारियां भी। संसद देश के सामने मौजूद समस्याओं के समाधान के लिए विचार-विमर्श करने का मंच है। भावी चुनौतियों की रणनीति पर चिंतन-मनन करने का सर्वोत्तम स्थान भी संसद है। बावजूद इसके, पिछले कुछ सालों में संसद की महत्ता कम होती जा रही है। तार्किक बहस का स्थान शोरगुल और हंगामा ले चुका है। न सरकार अपनी भूमिका में खरा उतर पा रही है, न विपक्ष। संसद पर भी राजनीतिक रस्साकसी हावी होती साफ नजर आ रही है। देश इस समय गंभीर दौर से गुजर रहा है। आर्थिक चुनौतियां तो हैं ही, चीन के साथ टकराव से निपटना भी चुनौती है। महंगाई और बेरोजगारी जैसे मुद्दे अपनी जगह कायम हैं। इन चुनौतियों से अकेले सरकार नहीं निपट सकती। उसे विपक्ष का सहयोग भी चाहिए और जनता का भी। चुनावी हार-जीत का असर संसद के कामकाज पर नहीं दिखे तो अच्छे परिणाम की उम्मीद की जा सकती है।
विभिन्न मुद्दों पर सरकार और विपक्ष के बीच टकराव होना चाहिए लेकिन सीमित दायरे में। एक-दूसरे को नीचा दिखाने के लिए संसद का उपयोग नहीं होना चाहिए। संसद के हर सत्र से पहले सरकार और विपक्ष के बीच सर्वदलीय बैठक में अनेक मुद्दों पर सहमति बनती है। लेकिन ये सहमति कागजों तक सीमित रह जाती है। प्रयास होने चाहिए कि इस बार संसद नई भूमिका में नजर आए। राजनीतिक दलों को समझना चाहिए कि सत्ता स्थायी नहीं है। आज जो दल सत्ता में हैं, कल वे विपक्ष में आ सकते हैं। जनता ने जिसको जो जिम्मेदारी सौंपी है, उसका निर्वहन संसदीय आचरण से किया जाए। संसद में अधिक से अधिक विधायी कार्य किया जाए। हंगामे और बायकॉट जैसे स्थायी चलन को इस बार तिलांजलि दे दी जाए। सरकार, विपक्ष और सभी सांसद प्रयास करें तो ऐसा हो सकता है।
Published on:
13 Jul 2021 08:09 am
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