
Gulab Kothari Article
Gulab Kothari Article : चातुर्वण्र्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागश:।
तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम।। (गीता 4.13)
गुण और कर्मों के विभाग सहित चारों वर्ण मेरे द्वारा रचे गए हैं। मेरी प्रकृति ही भूतों की रचना करती है। मैं कर्ता नहीं हूं। प्रकृति-अहंकृति-आकृति साथ रहते हैं। अहंकृति और आकृति को बदला नहीं जा सकता। प्रकृति के बदलने से तीनों ही स्वत: बदल जाते हैं। चूंकि सभी शूद्र रूप में जन्म लेते हैं-'जन्मना जायते शूद्र: संस्कारात् द्विज उच्यते।'- उन्हीं से विश्व के सभी कर्म निष्पन्न नहीं हो सकते, अत: उन्हें आत्मा के वर्णक्रम में संस्कारित किया जाता है। ब्रह्म-क्षत्र-विट् तीन ही आत्मा के वीर्य कहे गए हैं। प्रत्येक आत्मा को उसके वीर्य क्रम से, अन्नप्राशन संस्कार द्वारा पहचान कर, अन्न द्वारा पुन: पोषित किया जाता है।
अन्नप्राशन संस्कार छह माह की आयु में होता है। अन्न का पोषण चन्द्रमा से होता है। अन्न से मन का निर्माण होता है। चन्द्रमा की सोलह कलायुक्त अन्न से सोलह वर्षों में पूर्ण मन का निर्माण हो जाता है। अर्थात् मन को बदलना हो, उसमें नए वीर्य का आधान करना हो, एक-एक करके तीनों गुणों से बाहर निकालना हो (निस्त्रैगुण्य भव), तो प्रत्येक स्तर पर 16 वर्ष लगाने की तैयारी चाहिए। कम भी लग सकते हैं। इच्छाशक्ति और अभ्यास की निरन्तरता पर निर्भर करता है। पुराणों में तो ऐसे उदाहरण अनेक हैं। हर व्यक्ति को निस्त्रैगुण्य बनना होता है, मुक्ति मार्ग पर बढऩे के लिए। सत्व, रज और तम प्रकृति का स्वरूप है। व्यवहार में इसी का स्थूल रूप है ब्रह्म, क्षत्र और विट् वीर्य। हमारे हृदय में जो तीन अक्षर प्राण हैं, वे ही ब्रह्मा, इन्द्र और विष्णु क्रमश: ब्रह्म-क्षत्र-विट् वीर्य के अधिष्ठाता हैं। ये ही प्रकृति बनते हैं, क्षर सृष्टि में।
अहंकृति-प्रकृति तथा आकृति में प्रकृति ही सत्व-रज-तम है। तम को रज में, रज को सत्व में बदलना एक क्रम है। आगे निस्त्रैगुण्य अवस्था है, जो अक्षर का केन्द्र है। यही अव्यय का मन हो जाता है। जब तक ब्रह्मज्ञान में प्रवेश नहीं होता तब तक निस्त्रैगुण्य का अभ्यास शुरू ही नहीं होता है। ये गतिविधियां सूक्ष्म धरातल की हैं, अत: साधना मार्ग से जुड़ी हैं। पुराणों के कुछ उदाहरण हैं-ऐतरेय ऋषि अपराधी के पुत्र थे। ऐतरेय उपनिषद् लिखा। सत्यकाम जाबाल गणिका-पुत्र थे, ब्राह्मणत्व को प्राप्त हुए। राजा दक्ष के पुत्र पृषध अपने आचरण से शूद्र हो गए थे। बाद में प्रायश्चित करके उन्होंने मोक्ष प्राप्त किया। शूद्रों के लिए तपस्या निषेध होती तो पृषध कैसे कर पाए? राजा शौनक क्षत्रिय से ब्राह्मण हुए। पुलस्त्य का पौत्र रावण राक्षस बना। राजा रघु का पुत्र प्रवृद्ध (कल्माष पाद) शाप के कारण राक्षस हो गया था।
विश्वामित्र के पुत्रों ने शूद्र वर्ण अपनाया। जबकि स्वयं विश्वामित्र क्षत्रिय से ब्राह्मण बने। विदुर दासी के पुत्र थे। उल्लेखनीय है कि वेदों में किसी भी स्थान पर शूद्र के जन्म से अछूत होने, उन्हें वेदाध्ययन से वंचित रखने, उनका दर्जा कम होने अथवा उन्हें यज्ञादि से अलग रखने का उल्लेख नहीं है। सभी २४ जैन तीर्थंकर क्षत्रिय थे। वाल्मीकि डाकू थे, रामायण लिख गए। एकलव्य भील था, किन्तु उसने क्षत्रियत्व के लिए प्रयास किया था। ये सारे उदाहरण रूपान्तरण के हैं। यह रूपान्तरण ही मानव योनि का सार समझ में आता है।
श्रुति कहती है-''ब्राह्मणस्यतु देहोऽयं न कामार्थायकल्पते।' ब्राह्मण का यह शरीर तो कामोपभोग के लिए नहीं है। तपस्या के द्वारा मृत्यु पश्चात ब्राह्मण को सुख प्राप्त होता है। तपस्या से ही ब्राह्मण देह सार्थक होती है। बाहर/भीतर के शत्रुओं का संताडि़त करना और ब्राह्मण का पालन करना क्षत्रिय का 'धर्म' है। अर्जुन क्षत्रिय था, ब्राह्मण नहीं हो सकता था। देह-इन्द्रियादि क्षोभ उत्पन्न करने वाले नाना प्रकार के विघ्नरूपी शत्रुओं को अपने वश में करना उसका कर्तव्य था। कृष्ण कह रहे हैं कि हे अर्जुन! 'मैं नहीं कर सकूंगा' कहकर बैठने से काम नहीं चलेगा।
तुुम सोचते हो कि देहादि के सुख भोगने के लिए प्रवृत्तियां रहनी चाहिए। सुख के लिए आत्मवश होना आवश्यक है। शत्रु के वश में रहकर आपातत: मनमोहक इन्द्रिय सुख तो मिलेगा, इसका परिणाम शोकजनक होगा। चित्त विक्षेप के कारण तुम अमृत आत्मा को नहीं जानते। चित्तवृत्ति निरोध से आत्मा के प्रकाश-आनन्द-नित्यता देखकर सारा क्षोभ मिट जाएगा।
चित्तवृत्ति निरोध के लिए त्रिगुण रूपी बाधाओं के स्वरूप को समझना, साधारण गृहस्थ रहकर इस कर्म में उतरना-सफल होना ही हमारी आवश्यकता है। गीता के १४वें अध्याय में तीनों गुण वाले प्राणियों की स्वरूप व्याख्याएं दी हैं। इनको किस प्रकार के अन्न से प्रभावित किया जा सकता है- इसका भी विस्तार है।
'तीनों गुण जीवात्मा को शरीर में बांधते हैं। सत्व गुण निर्मल, प्रकाशक, विकाररहित और सुख-दु:ख संबंध से बांधता है। रजोगुण राग, कामना एवं आसक्ति से उत्पन्न कर्म और फल से बांधता है। तमस देहाभिमान, मोह और अज्ञान से उत्पन्न प्रमाद-आलस्य-निद्रा से बांधता है। सत्व देह-इन्द्रिय-अन्त:करण में चेतना-विवेक का जागरण करता है। रज लोभ, सकाम प्रवृत्ति, भोगों की लालसा और अशान्ति कारक है। सत् कर्म का फल सुख-ज्ञान-वैराग्य है और रज का फल है दु:ख। तम का फल अज्ञान है।'
जो सत्व के प्रकाश, रज की प्रवृत्ति और तम के मोह को न तो प्रवृत्त होने पर द्वेष करता है और न निवृत्त होने पर आकांक्षा करता है, वह योगी है। योगी द्रष्टा है, गुणों से विचलित नहीं होता। इन सबको गुणों का खेल ही मानता है। ऐसा योगी आत्मभाव से स्थित, सुख-दु:ख-प्रिय-अप्रिय-स्वर्ण-मृदा में भी और निन्दा-स्तुति में भी सम रहता है। मान-अपमान, मित्र-वैरी से समभाव में, फलाशा के त्याग-कर्तापन के अभाव वाला होता है।
आगे प्रश्न उठता है कि एक साधारण व्यक्ति कहां से शुरू करे तो इसका भी उपाय कृष्ण बता रहे हैं कि उचित आहार-निद्रा-भय-मैथुन (पशु कर्म) सभी श्रद्धा और अन्त:करण के अनुरूप होते हैं यानी 'जो जैसी श्रद्धा वाला है वैसी ही उसकी चर्या होती है।' (17/3)
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दु:खहा।। (गीता 6.17)
धर्म (यज्ञ-तप-दान) तथा आहार सभी सत्व-रज-तम श्रद्धा के साथ प्रतिबिम्बित होते हैं। ये ही साधन व्यक्ति को शनै:शनै: तम से रज और फिर रज से सत्व में प्रवेश कराते हैं। संकल्प-श्रद्धा-निरन्तरता चाहिए। आहार की त्रिगुणता को बताते हुए कहा गया है कि सात्विक आहार आयु-बल-बुद्धि-आरोग्य-सुख-प्रीति बढ़ाने वाले, रसयुक्त, स्निग्ध (चिकने) और लम्बे काल तक प्रभावी होते हैं। राजसिक आहार कड़वे, खट्टे, लवणयुक्त, बहुत गर्म, तीखे, रूखे, दाहकारक तथा दु:ख-चिन्ता-रोगों को उत्पन्न करने वाले होते हैं। अधपका, रसविहीन, दुर्गन्धयुक्त, बासी, उच्छिष्ट, अपवित्र आहार तामसिक होता है।
शास्त्रों में अन्न को ब्रह्म कहा है अर्थात् यह स्थूल शरीर से शुरू होकर सूक्ष्म और कारण शरीर तक सूत्र बनता है। सात्विक मन और निश्चयात्मिका बुद्धि भी अन्न से, मन की कामना-भावना से ही पैदा होते हैं। यज्ञ से अन्न को देवताओं तक पहुंचाते हैं। तप से ज्ञानाग्नि पैदा करते हैं- कर्मों को जलाने के लिए। दान से अर्जन का परिष्कार करते हैं, पात्र का सम्मान करते हैं और ऋणमुक्त होने का प्रयास करते हैं। ये सभी अन्न के स्वरूप हैं। अन्न आत्मा का वाहक है एक गुण से दूसरे तक और गुणातीत होने तक सहायक बनता है। अग्नि में सोम की आहुति ही मूल अन्न है। अत: अन्त में अग्नि में ही लीन हो जाता है।
अन्न दोष से मन व्यथित हो जाता है। मन की चंचलता चरम पर हो जाती है। अन्न की शुद्धता लुप्त हो जाती है। अन्न के दूषित होते ही मर्यादा-अनुशासन-सामाजिक स्वरूप-ईश उपासना का खण्डन होने लगता है। अत: अन्न ब्रह्म की पुन: प्रतिष्ठा करना ही सुख की स्थापना है। इसका श्रीगणेश तो शब्द ब्रह्म से हो सकता है अथवा अन्न ब्रह्म से। एक छोटे से संकल्प की आवश्यकता है कि भोजन सात्विक करेंगे।
क्रमश:
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Published on:
30 Sept 2023 01:28 pm
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