नजरिया : भारत को अपने विकास की कहानी दोबारा लिखने की जरूरत

- वैश्विक राजनीति में अर्थतंत्र और पारिस्थितिकी तंत्र का टकराव।
- इस कहानी का आधार हो सबकी जरूरत, न कि केवल कुछ ही लोगों की। उसमें पर्यावरण संरक्षण की बात हो, क्योंकि यही जीवन के अस्तित्व का आधार है। इसमें चयन के विकल्प की गुंजाइश न हो, यह आवश्यक है। अब वक्त भी बदल गया है और विश्व भी।

By: Patrika Desk

Published: 11 Oct 2021, 08:30 AM IST

सुनीता नारायण

(सतत विकास की हरित अवधारणा की पैरोकार, सीएसई की महानिदेशक)

करीब 30 साल पहले जब भारत ने आर्थिक सुधारों की घोषणा की थी तो यह भली-भांति जानता था कि आर्थिक विकास का पर्यावरण पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। विकास के लिए प्राकृतिक संसाधनों का दोहन बढ़ेगा और जल व वायु प्रदूषित होंगे। यह तथ्य इसलिए भी विदित था क्योंकि उदारवाद और मुक्त व्यापार के जरिए आर्थिक विकास की विचारधारा लाने वाले विश्व के संपन्न राष्ट्रों को समझ आ गया था कि उनकी समृद्धि का एक ही रास्ता है कि वे सर्वाधिक प्रदूषणकारी व श्रम आधारित उद्योगों को नए उभरते देशों को निर्यात कर दें। देश के पर्यावरण को पहला झटका तब लगा जब 1990 के दशक के मध्य में दिल्ली की हवा खराब हो गई, उसमें कालिख छा गई। इसका कारण था मोटरीकरण को बढ़ावा।

अगले दो दशक में हमारी धरती, जल, वायु और भोजन, सब कुछ विषाक्त हो गया। तब जाकर हमें अहसास हुआ कि इससे हमारी सेहत को कितना नुकसान पहुंचा है। यह आर्थिक विकास का दुखद पहलू था। इसीलिए विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बिठाने का मुद्दा बार-बार उठता रहता है। यह संकल्प हर बार त्रुटिपूर्ण रह जाता है क्योंकि निर्णय लेने वाले सार्वजनिक संस्थान लगातार कमजोर और अक्षम होते जा रहे हैं।

इन तीस सालों में हमने यह भी सीखा है कि विकास तभी स्थायी रूप से जारी रह सकता है, जब तक कि इसकी लागत वहन की जा सके और सारे घटक शामिल हों। हम जानते हैं कि सबको स्वच्छता के साधन वहन की जाने वाली कीमतों पर मुहैया कराए बिना नदियों को साफ रखना मुश्किल है। नीला आसमान और सहज सांस लेना तभी संभव है जब हम आने-जाने के लिए खुद चलें, न कि वाहनों का इस्तेमाल करें।

पेड़ों और पानी जैसे प्राकृतिक संसाधनों में निवेश कर ही हम ऐसा लचीलापन पा सकेंगे जो जलवायु जोखिमों से भरे इस विश्व में जरूरी है। भारत को अपने विकास की कहानी दोबारा लिखने की जरूरत है। इस कहानी का आधार हो सबकी जरूरत, न कि केवल कुछ ही लोगों की। उसमें पर्यावरण संरक्षण की बात हो, क्योंकि यही जीवन के अस्तित्व का आधार है। इसमें चयन के विकल्प की गुंजाइश न हो, यह आवश्यक है। अब वक्त भी बदल गया है और विश्व भी। दुनिया मुक्त व्यापार और उदारीकरण से मुंह फेर संरक्षणवादी हो चली है। मुक्त वैश्विक व्यापार के वादे ने वैश्विक समीकरण बदल दिए हैं।

चीन के उत्थान का श्रेय विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) में इसके प्रवेश को दिया जा सकता है। विश्व व्यापार संगठन में प्रवेश पाने के बाद चीन ने अप्रत्याशित तरक्की की है। इसके बाद ही चीन ने व्यापार में बाकी देशों को पछाड़ दिया। सफलता के लिए उसके पास तुरुप का पत्ता ('ट्रम्प' कार्ड) रहा - सस्ता श्रम, सस्ता ऋण और इस दौरान बिना किसी पाबंदी को मानते हुए पर्यावरण सुरक्षा के कोई मानदंड न अपनाना। इस होड़ में चीन ने बाकी सभी देशों को पछाड़ दिया है। विश्व व्यापार को जिन पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं ने पहले आगे बढ़ाया, वे अब इस पर संयम बरतना चाहते हैं।

इसे और अधिक स्पष्ट रूप से समझते हैं। विश्व पर प्रभुत्व की लड़ाई में आज चीन अमरीका के सामने खड़ा है। इससे भारत सहित बाकी विश्व में पर्यावरण सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन जैसी जटिलताएं उत्पन्न होंगी। बिना इधर-उधर की बात किए सही मुद्दे पर आते हैं। स्पष्ट तथ्य यह है कि आज ऐसा देश विश्व नेता है, जिसके आर्थिक विकास का मॉडल अलग ही है। इसका संविधान एक ही बात कहता है - हर वह काम करो, जो भी किया जाना है। इसके स्वच्छन्द राष्ट्राध्यक्ष का राष्ट्रीय एजेंडा यही है। इसका मकसद है निर्माण, व्यापार और वैश्विक वाणिज्य के जरिए विश्व में आर्थिक ताकत का लोहा मनवाना। अगर इसका मतलब है ज्यादा ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन और ज्यादा प्रदूषण, तो यह खेल अभी लंबा चलेगा।

कहने की जरूरत नहीं कि चीन पश्चिमी देशों का खेल खेलना नहीं सीखा, बल्कि बखूबी सीख गया है। स्वच्छ बिजली और ऊर्जा नवीनीकरण पर यह सही आवाज उठाता है। साथ ही इसने ऐसे कार्य किए हैं जिससे उद्योगों के ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन कम किए जा सकें। जैसे सौर ऊर्जा के उपयोग से लेकर इलेक्ट्रिक वाहन बनाना आदि। इसने 2060 तक शून्य उत्सर्जन का लक्ष्य रखा है। साथ ही अपनी अर्थव्यवस्था के लिए यह कोयले पर ही भरोसा करता आया है और इसी का उपयोग करना जारी रखे हुए है। निस्संदेह अब यह देश इतना ताकतवर हो गया है कि इसके लिए यह कहना भी मुश्किल है कि यह दुनिया को बरगला रहा है।

परन्तु बात सिर्फ चीन की नहीं है और न ही पर्यावरण के प्रति उसके रवैये और जलवायु परिवर्तन से निपटने के उसके तौर-तरीकों की। असल बात है - चीन और अमरीका के बीच प्रतिस्पर्धा की। इसके चलते दुनिया के देश आपस में होड़ करेंगे और दोनों में से किसी एक की तरफदारी करेंगे। समस्या यह है कि सभी पक्ष जानते हैं कि प्रभुत्व की लड़ाई जीतने के लिए आर्थिक ताकत अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है। ज्यादा निर्माण, ज्यादा उत्पादन होने से उपभोग बढ़ेगा, व्यापार व वाणिज्य भी बढ़ेगा। पुरानी परम्परा जारी रखने का यह नया पैमाना होगा। इस प्रकार सुरक्षित जल, स्वच्छता और निकासी का 'ब्राउन एजेंडा' वापस लाया जा सकेगा। आज भारत ही नहीं, समूचा विश्व जलवायु परिवर्तन और पारिस्थितिकीय सुरक्षा की बात कर रहा है। पिछले तीस वर्षों से विश्व पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन विषय पर लगातार थोथी बातें करके ऊब गया है।

बीते तीस वर्षों को छोड़, आने वाले तीस वर्षों की बात की जाए तो अब शाब्दिक चतुराई नहीं चलेगी, प्रकृति के साथ उत्पात मचा है। इसे रोकने के उपाय करना वक्त के साथ दौड़ लगाने जैसा है और वक्त हमारे साथ नहीं है।

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