3 जनवरी 2026,

शनिवार

Patrika LogoSwitch to English
home_icon

मेरी खबर

icon

प्लस

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

सरकार में आते ही बदले सुर

पहले पेरिस में मोदी और शरीफ के बीच छोटी वार्ता होना। फिर बैंकॉक में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों (एनएसए) की मुलाकात, जिसमें विदेश सचिव मौजूद थे। 

7 min read
Google source verification

image

afjal khan

Dec 09, 2015

पहले पेरिस में मोदी और शरीफ के बीच छोटी वार्ता होना। फिर बैंकॉक में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों (एनएसए) की मुलाकात, जिसमें विदेश सचिव मौजूद थे।

यह सब सुनियोजित था। दोनों देशों के बीच बात शुरू हो, यह कोशिशें हो रही थीं पर यह तो साफ है कि पहल हमने की है। अब अफगानिस्तान पर 'हार्ट ऑफ एशिया मीटिंगÓ में सुषमा स्वराज के नेतृत्व में प्रतिनिधिमंडल भेजा गया है।

इस मीटिंग में शरीक होना तो जरूरी था पर अगर हमारा वार्ता का इरादा नहीं होता तो सुषमा स्वराज की जगह किसी और मंत्री को भी भेजा जा सकता था। पर जाहिर है कि हम वार्ता करना चाहते हैं तो यह निर्णय हुआ।

पर अहम सवाल यह है कि इतनी बड़ी पहल अचानक क्यों हुई है? और इससे हासिल क्या हो सकता है? इन दोनों के बारे में स्पष्टता नहीं है। सरकार ने कोई स्पष्टीकरण तो नहीं दिया है। अनुभव के आधार पर मैं कह सकता हूं कि हमारे रुख में परिवर्तन आया है।

हर बार वहीं से शुरू
एनएसए की वार्ता के बाद प्रेस रिलीज में कहा गया है कि दोनों देश रचनात्मक जुड़ाव पर सहमत हुए हैं। अब जरा यह बताएं कि यह रचनात्मकता पिछले बरसों से नहीं थी? हर बार संयुक्त बयान में यही शब्द इस्तेमाल किया जाता है।

पर हर कुछ अरसे के बाद दोनों देशों के बीच वार्ता वहीं के वहीं पहुंच जाती है, जहां से शुरू हुई थी। देखने लायक बात यह है कि क्या हमेें ऐसा कुछ देखने को मिला, जिससे अहसास हो कि पाकिस्तान की भारत के प्रति सोच बदल रही है। वास्तविकता में तो ऐसा नहीं है।

बदला कुछ नही
जब नवाज शरीफ वॉशिंगटन जाने वाले थे तो एक दिन पहले उनके विदेश सचिव ने बयान दिया कि पाकिस्तान सामरिक परमाणु हथियार तैयार कर रहा है। जरूरत हुई तो भारत के खिलाफ इस्तेमाल करने से नहीं कतराएंगे।

जानबूझकर इस संवेदनशील मसले पर भारत को चेतावनी दी गई। राहिल शरीफ ने बयान दिया कि जब तक कश्मीर पर हल नहीं निकल जाता हम कोई टे्रड नहीं मानेंगे। खुद नवाज शरीफ की कोशिश रही है कि कश्मीर पर अमरीका दखल दे।

हुर्रियत से मुलाकात को लेकर वे अब भी अडिग हैं। आतंकवाद पर हालात जस के तस हैं। हमने गुरदासपुर, उधमपुर तक फिर हमले झेले हैं। हाल ही में हमारे लेफ्टिनेंट जनरल की हत्या भी हुई। ऐसा कोई संकेत तो दिखा नहीं है कि पाकिस्तान से बात आगे बढ़ सकती है।

पाकिस्तान का अतीत देखें तो कह सकते हैं कि उनकी बुनियादी स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है। हम पाकिस्तान के मुकाबले ज्यादा फंसे हुए महसूस करते हैं।

पाकिस्तान का अतीत देखें तो कह सकते हैं कि उनकी बुनियादी स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है। हम पाकिस्तान के मुकाबले ज्यादा फंसे हुए महसूस करते हैं।

तीसरे मुल्क में क्यों मिले?
दोनों एनएसए का तीसरे देश में मुलाकात करने का औचित्य समझ से परे है। जानकार मानते हैं कि उन्हें भारत में बुलाकर बात करनी चाहिए थी, इससे हम ज्यादा हावी रहते। बैंकॉक में बात होने का मतलब है कि दोनों देशों में आपसी भरोसा ही नहीं है। ऐसे में कैसे किसी ठोस नतीजे की उम्मीद की जा सकती है?

बात सरकार नहीं सेना से
पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के अलावा वार्ता में शामिल अधिकांश लोग पाक सेना के या उससे जुड़े हुए हैं। इससे जाहिर होता है कि भारत की बातचीत पाकिस्तान सरकार से नहीं, बल्कि वहां की सेना से हो रही है। और पाकिस्तानी सेना का भारत के प्रति रुख हम पिछले 68 बरसों से देख रहे हैं।

खुद को ही पीडि़त बताता है
जब हम आतंकवाद की बात करते हैं तो वे समझौता ब्लास्ट की बात करते हैं। खुद को ही आतंकवाद से ज्यादा पीडि़त बताने लगते हैं। कश्मीर का राग अलापने लगते हैं। 26/11 हमले के मुख्य आरोपी वहां खुले घूमते हैं। हाफिज सईद, जो भारत के खिलाफ जहर उगलता है, उस पर कोई प्रतिबंध नहीं है।

पर कदम बढ़ते रहने चाहिए
बैंकॉक में दोनों देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहाकर और दोनों देशों के विदेश सचिवों की मुलाकात हुई और उसके चंद लम्हों के बाद विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के इस्लामाबाद जाने का ऐलान हो गया। इससे थोड़ी नाटकीयता सी आ गई।

मुझे लगता है कि इस मामले में नाटकीयता कोई बुरी बात नहीं है। भारत और पाकिस्तान के बीच संधि वार्ता करा पाना इतना आसान नहीं है। यहां थोड़ी नाटकीयता जरूरी है। इससे दोनों देशों की आम जनता की मानसिकता तैयार कर पाने में मदद मिलेगी।

इस नाटकीयता से कोई बेकार की बहस भी नहीं खड़ी होगी और धीरे-धीरे हम मंजिल-ए-मकसद की ओर बढऩे में कामयाब हो पाएंगे। पेरिस के पर्यावरण सम्मेलन में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ दोनों बहुत अच्छी तरह मिले थे। दोनों के बीच मुझे नहीं लगता है कि उस समय बहुत कुछ बात हो पायी होगी।

शायद हल्की-फुल्की बात यह हुई होगी कि हमें इस मसले पर कुछ पहल करना चाहिए। इस मुलाकात के बाद दोनों देशों ने इसे आगे बढ़ाने की दिशा में काम किया होगा, जो नतीजे के तौर पर बैंकॉक में दोनों देशों के एनएसए और विदेश सचिवों की मुलाकात में तब्दील हो गई।

सकारात्मकता देखें
पेरिस में दोनों प्रधानमंत्रियों की मुलाकात और बाद में बैंकाक में गोपनीय ढंग से वार्ता की, इसमें मुझे कुछ भी बुरा नहीं लग रहा है। मुझे इसमें नाटकीयता का पक्ष बहुत जरूरी लग रहा है। यह अच्छे संकेत हैं। दोनों ही देश यह चाह रहे हैं संधि वार्ता को लेकर ज्यादा नुक्ताचीनी न हो और इसे थोड़ा प्रचार भी मिले।

मुझे लगता है कि इस वक्त यह बहुत अच्छे से हो पा रहा है। इन घटनाक्रम को लेकर देश की आम जनता ने सकारात्मक दिलचस्पी दिखाई है। अब हमें दो बातों के लिए थोड़ा इंतजार करना चाहिए। एक तो यह कि केंद्रीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज 10 दिसंबर को लौटकर संसद में जो बयान देंगी, उससे इस दिशा में कुछ चीजें साफ होंगी।

दूसरा, यह कि प्रधानमंत्री मोदी जब इस्लामाबाद जाएंगे और शरीफ से मिलेंगे तो उससे क्या निकलकर आएगा? उम्मीद है कि दोनों देशों के बीच के संबंधों को लेकर कुछ बेहतर तस्वीर ही सामने आएगी। हालांकि इस समय मुझे किसी बड़े समझौते का इमकान नहीं लग रहा है।

कोई भी बड़े समझौते हों तो उसमें वक्त तो लगता ही है। नरेंद्र मोदी के इस्लामाबाद की यात्रा से पूर्व समझौते से बड़ी चीजें निकलकर आने की उम्मीद मुझे नहीं लगती है।

भारत के प्रधानमंत्री मोदी और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ पेरिस में मिले और उसके बाद बैंकॉक में एनएसए और विदेश सचिवों की मुलाकात हुई। इसमें नाटकीयता का पुट है, पर यह दोनों के बीच वार्ता को लेकर एक अच्छी पहल है।

पहले जुबानी जंग तो बंद हो...
भारत-पाकिस्तान के बीच संधि वार्ता का मामला केवल दो देशों का मामला नहीं है। इन देशों के बीच के अच्छे और बुरे संबंध पूरे दक्षिण एशिया को प्रभावित करते हैं। लेकिन पाकिस्तान की जो अंदरूनी अस्थिरता है, उसकी ओर से जनता का ध्यान हटाने के लिए और जनता में एकजुटता का भम्र पैदा करने के लिए उन्हें भारत को लेकर कुछ-कुछ बयान देना पड़ता है।

पाकिस्तान की अंदरूनी हालत को देखकर यह कतई नहीं लगता है कि वहां किसी प्रकार की कोई जम्हूरियत जैसी चीज बची है। वहां के विभिन्न प्रांतों के जो नेता हैं, वे आत्मनिर्भर सत्ता चाहते हैं। हमारे देश में जिस प्रकार केंद्रीय सत्ता है और उसका जो संघीय या प्रांतीय ढांचा है, वह पाकिस्तान में बिल्कुल नहीं है। पाकिस्तान का संघीय ढांचा पूरी तरह से चरमरा गया है।

उन्होंने अपने देश की प्रजातांत्रिक संस्थाओं को बचाने की कोशिश नहीं की। इसलिए पेरिस के पर्यावरण सम्मेलन में दोनों देश के प्रधानमंत्रियों की मुलाकात हुई हो या बैंकाक में दोनों देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों और विदेश सचिवों की मुलाकात हुई, का बहुत असर नहीं होगा।

प्रजातंत्र से दूर है पाक
भारत में आजादी की लड़ाई के दौरान और उसके बाद राजनीतिक नेतृत्व विकसित हुआ, जिसका पाकिस्तान में सर्वथा अभाव दिखता है। भारत में अबतक 16 बार सरकारें बन गई हैं। सोलह बार सत्ता का हस्तांतरण हो चुका है। यहां यह सब चुनाव आयोग और जनता की भागीदारी से संभव हो पाया है।

भारत में प्रजातंत्र का पौधा धीरे-धीरे पनपकर बड़ा होता जा रहा है जबकि पाकिस्तान में चीजें इसके उलट होती रही हैं इसलिए संधि-वार्ता की सफलता की गारंटी करना मुश्किल सा है। अब थोड़ी चर्चा क्रिकेट डिप्लोमेसी के बारे में कर लेना जरूरी होगी।

संबंधित खबरें


पाकिस्तान को अगर भारत से क्रिकेट के जरिये कूटनीतिक संबंध स्थापित करना था तो उसे अपने यहां क्रिकेट खेलने की परिस्थितियां पैदा करनी थी। पाकिस्तान के लिए अपनी और भारत की जनता में वार्ता संबंध स्थापित करने का संदेश देने का बहुत सुनहरा मौका हो सकता था।

पाकिस्तान अगर इतना भी भरोसा नहीं दिला पा रहा है कि वह अपने देश में भारत के 15 खिलाडिय़ों की टीम को सुरक्षा प्रदान कर सकता है तो फिर वार्ताओं से बहुत कुछ क्या निकल कर आ सकता है? जबतक दोनों देशों के बीच क्रिकेट पाकिस्तान में नहीं खेला जाएगा तबतक उसके आंतरिक जम्हूरियत की तस्दीक नहीं की जा सकती है। तीसरे देश में क्रिकेट के आयोजन का कोई खास मतलब नहीं है। इससे बहुत कुछ हासिल नहीं होने वाला है।

पहले मानसिक तैयारी
भारत-पाकिस्तान को केवल जुबानी जंग पर सबसे पहले लगाम कसना चाहिए। दोनों ही ओर के नेता अक्सर कुछ न कुछ टीका-टिप्पणी करते रहते हैं। इसका संधि वार्ताओं पर नकारात्मक असर पड़ता है। दूसरा यह कि दोनों देश की जनता की मानसिक तैयारी की प्रक्रिया में यह खलल डालने का काम करता है।

एक और महत्वपूर्ण बात पर ध्यान देने की जरूरत यह है कि भारत का कद दुनिया में बहुत बढ़ गया है। भारत को दुनिया के नक्शे पर सबसे बड़े लोकतंत्र के तौर पर पहचाना जाता है। भारत को पाकिस्तान से जोडऩा और खासतौर पर हमारे छुटभैये नेताओं का कुछ भी बयान दे देना भारत के कद को बौना करने जैसा है। इन नेताओं को यह लगता है कि वे ऐसा करके अपना चुनावी वोट बैंक बना रहे हैं।

भारत का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) 7.8 फीसदी है। दुनिया की आप पर नजरें हैं। आप पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था से बहुत आगे निकल चुके हैं और बेहतर स्थिति में हैं। जनसंख्या के मामले में भी, प्रजातांत्रिक मूल्यों की स्थापना के मामले में भारत, पाकिस्तान से बहुत आगे निकल चुका है। इस बयानबाजी से ज्यादा कुछ हासिल नहीं हो सकता है। दो देशों को इस बदजुबानी से बचना चाहिए। बदजुबानी से केवल बात बिगड़ ही सकती है।

पाकिस्तान को भारत के साथ संधि वार्ता से पूर्व अपने मुल्क के अंदर प्रजातांत्रिक मूल्यों को बहाल करने पर पूरा ध्यान लगाना चाहिए। उनके यहां प्रजातांत्रिक संस्थाओं की बुरी गत हो चुकी है इसलिए वह भारतीयजनता की मानसिकता को अपने भरोसे में नहीं ले पा रहा है

बौद्ध धर्म गुरुओं में फूट डालने की कोशिश नाकाम
अ लग-अलग विधाएं होते हुए भी धर्म और राजनीति का चोली दामन का साथ है। चाहते हुए भी इन्हें एक-दूसरे से पृथक करना कठिन ही नहीं असंभव भी है। यदि सकारात्मक दृष्टि से देखा जाए तो दोनों परस्पर सहयोगी और पूरक का काम करते हैं लेकिन नकारात्मक नजरिए से यह घालमेल अनेक जटिलताओं का कारण भी बनता है।

दोनों क्षेत्रों को अलग-अलग चश्मे से देखने की नसीहतें देने वाले विद्वान दार्शनिक भी उस समय आश्चर्य में पड़ जाते हैं जब उन्हें ऐसा करना असंभव लगता है। भारत में निर्वासित जीवन बिता रहे तिब्बत के बौद्ध भिक्षु दलाई लामा और चीन की कम्युनिस्ट सरकार के बीच शुरू से छत्तीस का आंकड़ा चल रहा है।

तिब्बत पर अपना आधिपत्य जमाने के बाद चीन ने उन्हें कभी परंपरागत लामा स्वीकार नहीं किया बल्कि जहां कहीं दलाई लामा के दौरे होते हैं या उन्हें अवसर विशेष पर संबोधन के लिए किसी देश में आमंत्रित किया जाता है तो चीन इसका कड़ा विरोध करता है। भले ही संबंधित देशों की सरकारें उसके एतराज को नजरअंदाज कर लामा के स्वागत-सत्कार में कोई कसर नहीं छोड़ती। अब तिब्बत में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के मुखिया ने नए विवाद को हवा दी है।

पार्टी सचिव छेन क्वांगुओ ने दूसरे बड़े बौद्ध गुरु पंचेम लामा से आग्रह किया है कि निर्वासित धर्मगुरु दलाई लामा को हिमालयी क्षेत्र का आध्यात्मिक नेता मानने से इनकार कर दें। इसके पीछे लामा का तिब्बत से लगातार बाहर रहना और अपने उत्तराधिकारी के चयन के अधिकार से वंचित हो जाना बताया जा रहा है लेकिन बौद्ध मतावलंबी चीन की इस दलील को सिरे से खारिज कर देते हैं।