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योषा-वृषा

वैदिक विज्ञान में पुरुष को तत्त्व रूप माना गया है। ब्रह्म के विवर्त के लिए उसी की दो इकाइयां बन जाती हैं-नर और नारी। प्रजोत्पत्ति की भी यज्ञ संज्ञा है। 

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ramdeep mishra

Mar 01, 2015

वैदिक विज्ञान में पुरुष को तत्त्व रूप माना गया है। ब्रह्म के विवर्त के लिए उसी की दो इकाइयां बन जाती हैं-नर और नारी। प्रजोत्पत्ति की भी यज्ञ संज्ञा है। एक से अधिक विजातीय पदार्थों एवं तत्त्वों के रासायनिक मिश्रण से जो नया भाव पैदा होता है वही यज्ञ का स्वरूप है।

इसी यज्ञ विधान से सम्वत्सर में सृष्टि का विस्तार होता है तथा इसी की प्रतिकृति मानवकृत यज्ञ को माना गया है। जगत् अग्नि सोममय है। इन्हीं के यजन से सृष्टि होती है। मानव शरीर में योषा-वृषा नामक तत्त्वों को सन्तान का उत्पादक माना गया है। स्त्री-पुरुष को इन तत्त्वों का वाहक माना गया है। पुरुष को अग्नि तथा स्त्री को सोम का प्रतीक माना गया है।

योषा स्त्री शरीर में काम तत्त्व का सृजन करता है। यही कार्य पुरुष शरीर में वृषा तत्त्व करता है। शोषित स्वरूप से अग्नि है जिसका स्वामी लाल रंग का मंगल ग्रह है। यह पराक्रमी ग्रह माना जाता है। मकर राशि में यह उच्च का होता है।

चंूकि स्त्री के रुधिर में काम तत्त्व होता है, अत: इसे मकर ध्वज कहते हैं। स्त्री रुधिर में काम आग्नेय प्राण रूप स्थित रहता है। यही काम पुरुष शरीर में शुक्र में वास करता है। इसका स्वामी और निर्माता शुक्र ग्रह होता है। श्वेत शुक्र धातु मीन राशि में उच्च का माना गया है। पुरुष के काम को मीन ध्वज को कहा जाता है।

शुक्र स्वभाव से सोम (स्त्री) है, अत: स्त्री के लिए आकर्षण बनता है। स्त्री शरीर में व्याप्त मकर ध्वज अग्नि (पुरुष) होने से पुरुष के लिए आकर्षण बनता है।
योषा दृष्टि से स्त्री अन्त:रूप से पुरुष (शोणित) और शुक्र दृष्टि से पुरुष सौम्य है। शरीर रचना की दृष्टि से पुरुष अग्नि प्रधान और स्त्री सौम्या है। अर्थात् दोनों शरीर पुरुष भी हैं और स्त्री भी हैं।

शरीर से पुरुष, पुरुष है, सप्तम धातु शुक्र की दृष्टि से स्त्री है, शुक्र में निहित वृषा प्राण से पुन: पुरुष है। इसी प्रकार स्त्री भी शरीर से स्त्री, शोणित से पुरुष भावात्मक तथा योषा प्राणों से पुन: स्त्री ही है। इससे यह भी स्पष्ट है कि सन्तान प्राप्ति का कारण स्त्री-पुरुष का मिथुन कर्म मात्र ही नहीं है बल्कि योषा-वृषा का सम्बन्ध मूल है।

यदि योषा-वृषा का मेल न हो, या दोनों में से एक प्राण का हनन हो जाए तो मात्र शरीर सम्बन्ध से सन्तान पैदा नहीं हो सकती। योषा-वृषा के मेल से बिना शरीर सम्बन्ध के भी सन्तान उत्पन्न हो सकती है। टेस्ट ट्यूब बेबी इसका उदाहरण है। पं. मोतीलाल शास्त्री ने शतपथ ब्राह्मण के विज्ञान भाष्य में योषा-वृषा का विस्तृत विवेचन किया है।

पुरुष का शरीर भूताग्निप्रधान होने से वृषा है, अतएव शरीरदृष्टया पुरुष-पुरुष है। स्त्री का शरीर भूतसोमप्रधान होने से योषा है, अतएव शरीरदृष्टया स्त्री-स्त्री है। पुरुष का शरीर आग्नेय है, अतएव वह पुरुष है।

स्त्री का शरीर सौम्य है, अतएव वह स्त्री है। एवं इस भूताग्नि, भूतसोम से सम्बद्ध शरीरों की दृष्टि से पुरुष को पुरुष कहना, स्त्री को स्त्री कहना यथार्थ है। प्रतिष्ठाग्नि तथा प्रतिष्ठासोम की दृष्टि से जब विचार किया जाता है, तो पुरुष वास्तव में स्त्री है, एवं स्त्री वास्तव में पुरुष है। पुरुष के आग्नेय शरीर की प्रतिष्ठा शुक्र माना गया है। शुक्रसत्ता ही पुरुष सत्ता का कारण है। शुक्र सौम्य है। सौम्य स्त्रीतत्त्व शुक्ररूप से पुरुष की प्रतिष्ठा है, आग्नेय पुरुष के सौम्यशुक्र, तथा सौम्या स्त्री के आग्नेय शोणित के समन्वय से ही गर्भस्थिति होती है। 'स्त्रिय: सतीस्तां उ में पुंस आहु:।Ó

पुरुष-स्त्री का प्रथम युग्म गर्भस्थिति का कारण नहीं है। पुरुष का सौम्यशुक्ररूप स्त्रीतत्त्व, स्त्री का आग्नेय शोणितरूप पुरुषतत्त्व, स्त्री-पुरुष का युग्म कहा जाता है, इस द्वितीय युग्म से भी गर्भस्थिति नहीं होती। 'योषा-वृषाÓ के युग्म से प्रजननकर्म सम्पन्न होता है। सौम्य शुक्र के गर्भ में प्रतिष्ठित रहने वाला 'पुंभ्रूणÓ आग्नेय वृषाप्राणप्रधान है।

यही शुक्र की प्रतिष्ठा है। आग्नेय शोणित के गर्भ में प्रतिष्ठित रहने वाला 'स्त्रीभू्रणÓ योषाप्राणप्रधान है, यही शोणित की प्रतिष्ठा है। जब तक इन दोनों भू्रणों का दाम्पत्यभाव नहीं हो जाता, तब तक शुक्र-शोणित का मिथुनभाव व्यर्थ है।

यह तीसरा मिथुनभाव ही गर्भस्थिति का कारण है। इसमें ऋणमोचन की यह गुप्तप्रक्रिया सुरक्षित है, जिसके अनुगमन करने के बिना कभी बन्धनमुक्ति नहीं हो सकती। इसी लक्ष्य से वे विवाहसूत्र में बद्ध होते हैं, ऋतुकाल में यथा नियम दाम्पत्यभाव का अनुगमन कर ऋण से उर्ऋण होते हैं।

पुरुष (बीजी) के शुक्र में प्रतिष्ठित पुंभ्रूण ही 21 मात्रा से पुत्ररूप में परिणत होता है। शुक्र सौम्य है, जो सोमात्मक रेत है, वही शोणिताग्नि में जाकर पुत्ररूप में परिणत होता है। पिता के 21 अंश लेकर आज यह पुत्र बन रहा है। परन्तु यही प्रजातन्तु वितान द्वारा पिता से प्राप्त आत्मधेयरूप 7 कलाओं के प्रत्यर्पण से पिता के पिण्ड का पूरक बनता हुआ, चान्द्रलोकस्थ पिता के अपूर्ण स्वरूप को पूर्णरूप देता है।

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सूर्य आह्वनीय है, पारमेष्ठय सोम आहुति द्रव्य है। सौरअग्नि में हुत यह पारमेष्ठय सोम ही रश्मिरूप सप्त गौ-रूप में परिणत होता हुआ प्रकाशरूप में परिणत हो रहा है। इस आहुति से आहुत सोम शोणिताग्नि के समन्वय से गौरूप में परिणत होता है। इस आध्यात्मिक रश्मिभाव से यह सोम पर अवर, दो भावों में वितत हो जाता है। गर्भस्थित गर्भी वत्स है। पुत्ररूप बीजी में पिता-पितामहादि 6 पीढिय़ों का ऊपर की ओर से सम्बन्ध रहता है, एवं स्वयं इसके सोमसहों का इसकी पुत्र-पौत्रादि 6 पीढिय़ों पर्यन्त वितान होता है।

पिता अपने पुत्र में सात तन्तुओं का वितान करता है। इन्हीं के द्वारा तो 21-15-10 इत्यादि क्रम से सात पीढ़ी पर्यन्त वितान हुआ है। केवल पुत्र में ही वितान नहीं होता, अपितु पुत्र-पौत्र-प्रपौत्रादि 7 पर्यन्त वितान होता है। बीजी पुरुष के महानात्मा को आधार बना कर पुत्र-पौत्र-प्रपौत्र-वृद्धप्रपौत्र-अतिवृद्धप्रपौत्र-वृद्धातिवृद्धप्रपौत्र, ये 6 रज आगे-आगे वितत होते हैं। सप्तपुरुषों में बीजी स्थिर धन होने से अस्थिर रजोमर्यादा से बहिर्भूत मान लिया गया है। एवं स्थिर बीजी के आधार से 6 पुरुष प्रक्रान्तिसम्बन्ध से 'रजांसिÓ मान लिए गए हैं।

पत्नी-पति के ऋतभाग को उस के शरीर से च्युत कर उसे अपने गर्भाशय में प्रतिष्ठित कर गर्भ स्वरूप का आविर्भाव करने में समर्थ होती है। पिता दाम्पत्य कर्म में प्रवृत्त होता है। स्त्री माता इस कर्म की अद्र्धाङ्गिनी बनती है। मिथुनभाव-प्रवृत्ति का प्रारम्भिक संकल्प ही प्रथम दाम्पत्यभाव है, मानस संयोग है। दोनों का भौतिक सङ्गम होता है। मातृगत शोणित अग्निप्रधान होने से पितृगत सौम्य शुक्र का स्वभावत: आकर्षण है।

इस मातृगत शोणिताग्नि के आकर्षण से पिता के शरीर में विद्युत्-संचार होता है। फलत: शुक्र में क्षोभ उत्पन्न हो जाता है। क्षुब्ध शुक्र इस प्रकार माता के आकर्षण से पिता के शरीर से च्युत हो जाता है। अप् तत्त्व ही ऋत् है, जिसके 'आप:-वायु:-सोम:Ó भेद से तीन विवत्र्त माने गए हैं। शुक्र में आपोभाग प्रत्यक्ष है, मरुत् नामक रेतोधा वायु अनुमेय है, सोमभाग प्रत्यक्ष है। इसी ऋतसम्पत्ति के कारण शुक्र को 'ऋत्Ó कहा गया है।

दाम्पत्यभाव में वह स्त्री पुरुष-शरीर के साथ ऐक्य-भाव में आती हुई शुक्रग्रहणकाल में कम्पित हो जाती है। यही इसका गर्भरसकाल (शुक्रग्रहणकाल) है। इस समय शुक्र शोणित का परस्पर ओत-प्रोत भाव होता है। पुंभ्रूणाधिक्य से पुरुष, स्त्रीभ्रूणाधिक्य से कन्या, दोनों के साम्य से नपुंसक सन्तान, यथापरिस्थिति तीनों में से एक सन्तान गर्भीभूत हो जाती है। गर्भीभूत इन सन्तानों का पोषण मातृभुक्त अन्न द्वारा होता है अतएव गर्भस्थ गर्भी की (अन्नवान्) संज्ञा हो जाती है। वही शुक्राहुति मातृगर्भाशय में प्रविष्ट हो अपत्यरूप में परिणत होती है। यही अपत्य महानात्मा की प्रतिष्ठा बनता है, जिसमें कि सपिण्डता प्रवत्र्तक 28 कल पितृसह: पिण्ड सुरक्षित हैं।

इसमें एक तथ्य स्पष्ट है कि पुरुष शरीर स्थित शुक्र संस्था का स्थायी भाव है। बीजी स्वरूप है जिसमें सात पीढिय़ों के अंश रहते हैं। यही वृषा तत्त्व है। शुक्र तो मात्र वाहक और संरक्षक का कार्य करता है। स्वयं में बीज नहीं होता। इसी प्रकार शोणित का स्वरूप अस्थायी माना है। धरती रूप है। सन्तान की पहचान बीजी पिता से होती है, मातृभाव (सौम्या) अग्नि में आहुत रहता हुआ गौण ही रहता है।

शायद इसीलिए सृष्टि को पुरुष प्रधान मान लिया जो कि उचित नहीं है। पुरुष शरीर की प्रधानता का भी कोई अर्थ नहीं होता। मूल में तो पुरुष आत्मा का वाचक है। स्त्री-पुरुष दोनों आत्मा के ही रूप हैं। अत: दोनों ही पुरुष हैं। आत्मा से शुक्रमय महानात्मा अभिप्रेत है। स्थूल शरीर इस आत्मा की भूमि है। शरीर नर-नारी है, मानव-मानवी है।

प्रकृति में चन्द्रमा को सूर्य की पत्नी माना गया है। सूर्य के प्रकाश से ही चन्द्रमा प्रकाशित रहता है। नर-नारी में भी क्रमश: इनकी ही प्रधानता रहती है। सूर्य-चन्द्र के योग से ही सम्वत्सर बनता है, इसी से ऋतुओं का जन्म होता है। सम्वत्सर से ही पृथ्वी के जड-चेतन पैदा होते हैं। स्थूल सृष्टि का कारण अक्षर सृष्टि होती है जो सूर्यगत कही गई है। सूर्य ही अक्षर या देव प्राणों का केन्द्र है, इन्द्र है।

देवप्राणों का निर्माण स्वयंभू लोक के ऋषि प्राण तथा परमेष्ठी लोक के पितृप्राण के यजन से होता है। अत: हमारा आत्मा इन लोकों के साथ भी जुड़ा रहता है तथा स्वतन्त्र स्थूल सृष्टि का नियामक भी जान पड़ता है। भृगु-अंगिरा ही योषा-वृषा रूप आगे बढ़ते हैं। ऋषि, पितृ और देव प्राणों से ऋण लेकर ही हम प्राणी वर्ग पैदा होते हैं। तीनों ही अग्नि प्राण हैं-सोम भी सहायता से सृष्टिकर्ता बनते हैं, किन्तु सोम की चर्चा कहीं नहीं होती।

माया सदा ब्रह्म में लीन रहकर निर्माण करती है। सृष्टि ब्रह्म का ही विवर्त कहलाती है। माया अन्त में ब्रह्म में ही लीन हो जाती है। इसी कारण सृष्टि पुरुष प्रधान कहलाती है।
सामाजिक संस्कारों से जुड़ा यह स्तंभ नई पीढ़ी को भी पढ़ाएं।