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टकसाल से आपकी जेब तक, आखिर कैसे शुरू हुआ भारतीय सिक्कों का सफर?

Indian Coins History: जल्द ही आपकी जेब में प्लास्टिक के नोट्स होंगे। भारतीय मुद्रा बदलने की तैयारी तेज हो चुकी है। इस बीच सवाल आया नोट्स से पहले एक दौर में केवल सिक्कों का चलन था, यह दौर कौन सा था? अब आपकी हथेली में खनखनाने वाले 1,2,5, 10 और 20 रुपए के सिक्के आखिर कहां बनते हैं? इन्हें बनाने का फैसला कौन करता है, भारतीय रिजर्व बैंक या फिर भारत सरकार? patrika.com पर आइए जानते हैं भारतीय सिक्कों का सुनहरा और ऐतिहासिक सफर...
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भारत

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Sanjana Kumar

Jul 21, 2026

Indian Coins History Interesting Fact File

Indian Coins History Interesting Fact File: प्लास्टिक नोट्स के रूप में आप एक बार फिर नई भारतीय मुद्रा देखेंगे। लेकिन क्या आप जानते हैं आजाद भारत से पहले और बाद में सिक्कों की भी थी अपनी अलग पहचान। जानिए भारतीय सिक्कों का रोचक ऐतिहासिक सफर। (AI Generated Creative)

Indian Coins History: जेब में पड़े सिक्कों पर शायद ही कभी हमारी नजर ठहरती हो। वे कभी सब्जी वाले के हाथ चले जाते हैं, कभी मंदिर की दानपेटी में, तो कभी किसी बच्चे की गुल्लक में खनकते सुनाई देते हैं। लेकिन ये छोटे-छोटे सिक्के आपके हाथ तक पहुंचने से पहले एक लंबा और बेहद व्यवस्थित सफर तय करते हैं। इस सफर में भारत सरकार, सरकारी टकसाल, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और बैंकिंग प्रशासन की अहम भूमिका होती है। यह यात्रा धातु के एक साधारण टुकड़े से शुरू होकर करोड़ों लोगों के रोजमर्रा के लेन-देन तक पहुंचती है। क्या आप भी जानना चाहते हैं इन सिक्कों का रोचक इतिहास और निर्माण की शुरुआत का हर एक फैक्ट?

कौन करता है सिक्के बनाने का फैसला?

बहुत से लोगों को लगता है कि भारत में सभी नोट और सिक्के भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) बनाता है। लेकिन यह पूरी तरह सही नहीं है। भारत में प्रचलित सभी सिक्के भारत सरकार जारी करती है। इसका अधिकार भारत सरकार के वित्त मंत्रालय (Ministry of Finance) के पास है। सरकार हर वर्ष यह आकलन करती है कि देश में विभिन्न मूल्यवर्ग के सिक्कों की कितनी आवश्यकता होगी। इसमें पुराने सिक्कों के घिस जाने, आबादी, लेन-देन की जरूरत, बैंकिंग मांग और आर्थिक गतिविधियों जैसे कई पहलुओं का ध्यान रखा जाता है। तब जाकर तय किया जाता है कि 1,2, 5, 10 और 20 रुपए समेत विभिन्न मूल्यवर्ग के कितने सिक्के ढाले जाएंगे।

कहां बनते हैं भारत के सिक्के?

सरकार के आदेश के बाद सिक्के बनाने की जिम्मेदारी सिक्योरिटी प्रिंटिंग एंड मिंटिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (SPMCIL) के अधीन संचालित सरकारी टकसालों को दी जाती है। भारत में वर्तमान में चार सरकारी टकसाल हैं…

1. मुंबई (महाराष्ट्र)
2. कोलकाता (पश्चिम बंगाल)
3. हैदराबाद (तेलंगाना)
4. नोएडा (उत्तर प्रदेश)

यहीं पर करोड़ों सिक्के अत्याधुनिक मशीनों की मदद से तैयार किए जाते हैं। हर टकसाल की अपनी अलग पहचान होती है, जिसे मिंट मार्क (Mint Mark) कहा जाता है। यही छोटा-सा निशान बताता है कि सिक्का किस टकसाल में बना है।

क्या सरकार सीधे सिक्के बनाना शुरू कर देती है?

एक्सपर्ट्स बताते हैं कि नहीं, ऐसा नहीं है। दरअसल सिक्कों का उत्पादन एक तय प्रक्रिया के तहत किया जाता है। सबसे पहले आवश्यक धातु की व्यवस्था की जाती है। इसके बाद टकसालों को उत्पादन का लक्ष्य दिया जाता है। प्रत्येक सिक्का निर्धारित मानकों के अनुसार तैयार किया जाता है, ताकि उसका वजन, आकार, मोटाई और गुणवत्ता पूरे देश में एक जैसी रहे।

हालांकि अलग-अलग मूल्यवर्ग के सिक्कों का आकार, वजन, मोटाई और धातु अलग हो सकती है, लेकिन हर मूल्यवर्ग के लिए तय किए गए तकनीकी मानकों का पूरे देश में समान रूप से पालन किया जाता है। इसलिए चाहे सिक्का दिल्ली में मिले, भोपाल में, जयपुर में या फिर चेन्नई में, उस मूल्यवर्ग के सभी सिक्के एक ही मानक के अनुसार बनाए जाते हैं।

क्या रिजर्व बैंक की कोई भूमिका नहीं होती?

शुरुआती तौर पर रिजर्व बैंक की कोई भूमिका नहीं होती। सिक्के बनवाने और जारी करने का अधिकार भारत सरकार के पास है। सिक्के तैयार होने के बाद उन्हें भारतीय रिजर्व बैंक के माध्यम से देशभर के करेंसी चेस्ट और फिर बैंकों तक पहुंचाया जाता है। वहां से वे आम लोगों के हाथों में पहुंचते हैं।

भारतीय अर्थव्यवस्था में सिक्कों का महत्व

भले ही डिजिटल भुगतान का दौर तेजी से बढ़ रहा हो, लेकिन सिक्के आज भी भारतीय अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। छोटे भुगतान, सार्वजनिक परिवहन, धार्मिक स्थलों, ग्रामीण बाजारों, वेंडिंग मशीनों और खुदरा कारोबार में इनका व्यापक उपयोग होता है। यही वजह है कि सरकार समय-समय पर विभिन्न मूल्यवर्ग के सिक्कों की उपलब्धता सुनिश्चित करती रहती है।

क्या आप जानते हैं?

भारत में हर साल सिक्कों की मांग का आकलन जनसंख्या, लेन-देन और आर्थिक गतिविधियों के आधार पर किया जाता है। इस आकलन के बाद ही सिक्कों की ढलाई का काम शुरू किया जाता है कि कितने सिक्के तैयार करने हैं।

फैक्ट फाइल: भारतीय सिक्कों का 2,600 साल का सफर

लगभग 6वीं शताब्दी ईसा पूर्व : भारत में सबसे पहले पंच-चिह्नित (Punch-Marked) सिक्के चलन में आए। ये चांदी के होते थे और उन पर अलग-अलग प्रतीक पंच करके बनाए जाते थे। इन्हें भारत के सबसे प्राचीन सिक्के माना जाता है।

चौथी-तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व (मौर्य काल) : मौर्य साम्राज्य में पंच-मार्क सिक्कों का बड़े पैमाने पर उपयोग हुआ। पूरे साम्राज्य में व्यापार के लिए इन्हें मानक मुद्रा का दर्जा मिला।

पहली शताब्दी ईसा पूर्व-तीसरी शताब्दी ईस्वी : इंडो-ग्रीक, शक, कुषाण और सातवाहन शासकों ने पहली बार शासकों की आकृति और नाम वाले सिक्के जारी किए।

चौथी-छठी शताब्दी (गुप्त काल) : सोने के बेहद सुंदर और कलात्मक सिक्के जारी हुए। इन्हें भारतीय सिक्का कला का स्वर्ण युग माना जाता है।

1540 ई. : शेरशाह सूरी ने चांदी का 'रुपया' जारी किया, जिसका वजन लगभग 11.5 ग्राम था। आधुनिक रुपया इसी से विकसित हुआ।

1835 ई. : ब्रिटिश शासन ने पूरे भारत के लिए एक समान सिक्का प्रणाली लागू की और ईस्ट इंडिया कंपनी के एकरूप सिक्के जारी किए।

1950 : गणतंत्र बनने के बाद पहली बार अशोक स्तंभ वाले भारतीय सिक्के जारी किए गए। इनसे ब्रिटिश सम्राट की तस्वीर हट गई।

1957 : भारत ने दशमलव (Decimal) मुद्रा प्रणाली अपनाई। 1 रुपया = 100 पैसे कर दिया गया। इससे पहले 1 रुपया = 16 आना = 64 पैसे = 192 पाई होता था।

क्या आप जानते हैं?

-भारत के सबसे पुराने सिक्के करीब 2600 साल पुराने माने जाते हैं।
-रुपया शब्द संस्कृत के 'रूप्य' (चांदी) से निकला है।

अब समझिए आजाद और गणतंत्र भारत के सिक्के

आजाद और गणतंत्र भारत में पहली बार सिक्कों की सीरीज जारी की गई थी। इसका नाम था अन्ना सीरीज। यही वो समय था जब सिक्कों पर नजर आती रही ब्रिटिश राजा की तस्वीर को हटा दिया गया और अशोक स्तंभ की छाप दिखी। उस समय जारी मूल्य वर्ग में कुछ सिक्के जारी किए गए-

  • 1 पैसा (Pice)
  • 1/2 आना (आधा आना)
  • 1 आना
  • 2 आना
  • 1/4 रुपया (4 आना/चवन्नी)
  • 1/2 रुपया (8 आना/अठन्नी)
  • 1 रुपया = 16 आना

1 अप्रैल 1957 को फिर आया नया और बड़ा बदलाव

  • 1 नया पैसा
  • 2 नए पैसे
  • 5 नए पैसै
  • 10 नए पैसे
  • 20 नए पैसे
  • 25 नए पैसे
  • 50 नए पैसे
  • 1 रुपया

क्या आप जानते हैं?

क्या आप जानते हैं कि इस सीरीज को अन्ना (Anna) सीरीज क्यों कहा जाता है? क्योंकि, उस दौर की मुद्रा व्यवस्था में 'आना' (Anna) मूल इकाई थी, और 1950 में जारी हुए ज्यादातर सिक्कों की कीमत आने में या आने के हिस्सों में तय की गई थी।

1964 में हटा दिया गया 'नया' शब्द

1964 में सभी नए पैसों के आगे से नया शब्द को हटा दिया गया। अब यह नए पैसे केवल 1 पैसा, 2 पैसे, 5 पैसे, 10 पैसे, 20 पैसे, 25 पैसे, 50 पैसे कहलाने लगे।

रोचक फैक्ट ये भी

  • आजाद भारत का पहला सिक्का 1 रुपया नहीं 1 पैसा था। 1950 की पहली अन्ना श्रृंखला में एक साथ 1 पाई, 1/2 आना, 1 आना, 2 आना, 1/4 रुपया, 1/2 रुपया और फिर 1 रुपया जारी किया गया था।
  • 25 पैसे को चवन्नी और 50 पैसे को अठन्नी इसलिए कहा जाता था, क्योंकि दशमलव प्रणाली से पहले वे क्रमश: 4 आना और 8 आना के बराबर थे।
  • 1950 से 1957 तक चली 'अन्ना सीरीज' को 'प्री-डेसिमल कॉइनेज' (दशमलव-पूर्व मुद्रा) कहा जाता है। उस समय 1 रुपये को सीधे 100 बराबर हिस्सों (जैसे आज पैसे में होता है) में नहीं, बल्कि 16 आनों में बांटा जाता था। चूंकि इस पूरी सिक्का-प्रणाली का आधार ही 'आना' था।
  • 1957 में जब 1 रुपया = 100 पैसे वाली दशमलव प्रणाली आई, तो आना पूरी तरह खत्म हो गया और सिक्कों को सीधे पैसों में गिना जाने लगा।