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Success Story : लक्ष्मी ने अपनी मेहनत से खरीदी जमीन, कर्ज लेकर शुरू किया कारोबार, लिख डाली आत्मनिर्भरता की इबारत

Success Story : लक्ष्मी जब अपनी मेहनत के पैसों से जमीन खरीद रही थी तब उसे परिवार व समाज के लोगों ने सलाह दी कि जमीन का पट्टा तो घर के पुरुष के नाम ही होना चाहिए। आज उसी समाज के लोग लक्ष्मी की मिसाल देते हुए नहीं थकते हैं। पढ़िए बृजेश कुमार तिवारी की खास रिपोर्ट।
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भारत

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Swatantra Mishra

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बृजेश कुमार तिवारी

•

Updated: 5 Nov 2026, 5:05 PM IST

Lakshmi

शहडोल की लक्ष्मी की दिलचस्प कहानी, पढ़िए (Photo: Rajasthan Patrika)

Success Story : दिवाली पर हर घर में लक्ष्मी की पूजा होती है। सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना की जाती है, लेकिन शहडोल के ग्राम पंचायत ढोलर की लक्ष्मी ने अपनी मेहनत से समृद्धि का एक अलग अर्थ गढ़ा है। उन्होंने सिर्फ परिवार की आमदनी बढ़ाने का रास्ता नहीं बनाया, बल्कि उस सोच को भी चुनौती दी, जिसमें खेती में महिलाओं की मेहनत तो स्वीकार की जाती है, लेकिन जमीन और संपत्ति पर उनका अधिकार सहजता से नहीं माना जाता।

अपनी कमाई के 50 हजार रुपए से 37 डिसमिल जमीन खरीदकर अपने नाम पट्टा कराने वाली लक्ष्मी आज उन महिलाओं के लिए मिसाल हैं, जो मेहनत तो करती हैं, लेकिन अपने आर्थिक फैसले खुद नहीं ले पातीं।

मेहनत से खरीदी जमीन तो लोगों ने पट्टा पुरुष के नाम करने को कहा

लक्ष्मी के लिए यह जमीन का एक छोटा-सा टुकड़ा भर नहीं था, बल्कि अपनी मेहनत, कमाई और पहचान पर अधिकार की घोषणा थी। जब उन्होंने जमीन खरीदने और पट्टा अपने नाम कराने का फैसला किया तो कुछ लोगों ने कहा कि जमीन पुरुष के नाम होनी चाहिए। लक्ष्मी का जवाब साफ था- जिस काम को अपनी मेहनत और समझ से आगे बढ़ाया, उसकी कमाई से खरीदी जमीन पर मेरा भी कानूनी हक होना चाहिए। उन्होंने किसी की धारणा के आगे झुकने के बजाय अपने नाम जमीन कराई।

कैसे शुरू हुआ सफर ?

वर्ष 2003 में शादी के बाद लक्ष्मी ढोलर गांव आईं। बारहवीं के बाद पढ़ाई छूट गई थी। परिवार के पास जमीन थी, लेकिन पारंपरिक खेती से इतनी आमदनी नहीं होती थी कि सालभर की जरूरतें पूरी हो सकें। मजदूरी और दूसरे कामों पर निर्भरता बनी रहती थी। घर में आमदनी तो थी, लेकिन उसके इस्तेमाल और प्रबंधन में उनकी सीधी भागीदारी नहीं थी।

वर्ष 2010 में पंचायत की पंच चुने जाने के बाद गांव की व्यवस्था और सरकारी योजनाओं को करीब से समझने का अवसर मिला। वर्ष 2012 में आजीविका मिशन के गायत्री स्वयं सहायता समूह से जुड़ीं। यहां बचत, ऋण और सामूहिक प्रयास की ताकत समझी। इसके बाद सामुदायिक संसाधन व्यक्ति के रूप में गांव-गांव जाकर महिलाओं को समूहों से जोडऩे लगीं। इस दौरान सामाजिक टिप्पणियां भी सुननी पड़ीं, लेकिन उन्होंने घर की देहरी से बाहर निकलकर काम करना जारी रखा।

कर्ज से शुरू किया कारोबार

प्रदान संस्था से जुड़कर खेती के नए तौर-तरीके सीखे। शेडनेट में खेती, नर्सरी तैयार करने और मौसम के अनुसार फसल बदलने की तकनीक ने खेती को कमाई का बेहतर जरिया बनाने की समझ दी। स्वयं सहायता समूह से 40 हजार रुपए का ऋण लेकर मसाला और आटा चक्की की इकाई शुरू की। हल्दी और धनिया की पिसाई से नियमित आमदनी होने लगी। अपनी कमाई से सबसे पहले स्कूटी खरीदी। इससे गांवों में आना-जाना आसान हुआ और काम के लिए समय भी बचने लगा।

इसके बाद नर्सरी का विस्तार किया, सिंचाई के लिए लिफ्ट पंप लगाया और डेयरी के लिए देसी गायें खरीदीं। एक काम से हुई कमाई को दूसरे काम में लगाकर उन्होंने आजीविका के कई रास्ते तैयार किए। इसी आर्थिक आत्मविश्वास ने उन्हें जमीन खरीदने का साहस दिया।

दूसरी महिलाओं के लिए खोले रास्ते

लक्ष्मी ने अपनी सफलता को सिर्फ अपने परिवार तक सीमित नहीं रखा। स्वयं सहायता समूह के माध्यम से 10 महिलाओं को मुर्गी पालन, चार को मनिहारी की दुकान और चार को बकरी पालन से जोडऩे में मदद की। पंच रहते हुए 15 किसानों को सिंचाई पंप उपलब्ध कराने में सहयोग किया। वर्ष 2025-26 में सात परिवारों को कपिलधारा कुएं, खेत तालाब और मछली पालन जैसी योजनाओं से जोडऩे का प्रयास किया। उनकी जिंदगी का एक और संतोषजनक पहलू यह है कि जिस पढ़ाई को वह बारहवीं के बाद जारी नहीं रख सकीं, उनकी बेटी अब कृषि विज्ञान में स्नातकोत्तर की तैयारी कर रही है। बेटी को खेती की पढ़ाई में आगे बढ़ते देखना उनके लिए अपनी अधूरी शैक्षणिक यात्रा को अगली पीढ़ी में आगे बढ़ते देखने जैसा है।

मेहनत में हिस्सेदारी है तो अधिकार में भी हो

आज गांव में खेती की तकनीक, आजीविका और सरकारी योजनाओं पर चर्चा होती है तो लक्ष्मी अपनी बात मजबूती से रखती हैं। उनका मानना है कि महिलाओं को केवल काम करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उन्हें अपनी कमाई खर्च करने, नए काम शुरू करने और संपत्ति खरीदने के फैसले लेने का अधिकार भी मिलना चाहिए। दिवाली पर घरों में जलने वाले दीपक समृद्धि का प्रतीक हैं। लक्ष्मी की कहानी बताती है कि असली समृद्धि तब आती है, जब घर की महिला केवल परिवार के लिए मेहनत करने वाली सदस्य न रहकर आर्थिक फैसलों में भागीदार और संपत्ति की अधिकारिणी भी बने। इस दिवाली उनकी कहानी एक सवाल भी छोड़ती है- जब खेत में महिला की मेहनत बराबर है, तो जमीन के कागजों में उसका नाम बराबर क्यों नहीं?

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