
Indian Army. Photo- Patrika
Republic Day Special: सेना में वीरता के लिए कई मेडल मिले, देश का दूसरा सबसे बड़ा गैलेंट्री अवॉर्ड महावीर चक्र भी मिला, लेकिन रणबांकुरों की धरती और अपनी खुद की मिट्टी पर सेना दिवस परेड में शामिल होने का सम्मान पाना मेरे लिए अब तक का सबसे बड़ा सम्मान है। यह कहना है महावीर चक्र विजेता सीकर जिले के झालरा गांव के निवासी कमांडो दिगेंद्र कुमार (57) का।
कमांडो दिगेंद्र कुमार ने हाल ही में जयपुर में आयोजित सेना की परेड में हिस्सा लिया था। वीरता पुरस्कार विजेताओं में राजस्थान से परेड में हिस्सा लेने वाले वे अकेले महावीर चक्र विजेता हैं।
पत्रिका डॉट कॉम से खास बातचीत में कमांडो दिगेंद्र कुमार ने बताया कि कारगिल युद्ध के दौरान पांच गोलियां लगने से उनके शरीर का करीब 80 फीसदी हिस्सा अपंग हो गया। इसके बावजूद उनका जोश और जज्बा कई गुना है।
उनका कहना है कि राजस्थान सरकार को भी गैलेंट्री अवॉर्ड विजेताओं को 26 जनवरी और 15 अगस्त के समारोहों में सम्मान देना चाहिए।
कमांडो दिगेंद्र कुमार ने बताया कि वे भारतीय सेना में वर्ष 1985 में भर्ती हुए थे। उन्होंने भारतीय सेना की राजपूताना राइफल्स बटालियन में रहते हुए जहां भी तैनाती मिली, दुश्मनों के छक्के छुड़ाए। कारगिल युद्ध के दौरान उनकी टीम ने 48 पाकिस्तानी सैनिकों को मारकर देश को बड़ी कामयाबी दिलाई।
कारगिल युद्ध में 5 गोली लगने के बावजूद उन्होंने एक पाकिस्तानी मेजर की गर्दन काटी और तोलोलिंग की चोटी को फिर से फतह कर वहां भारतीय तिरंगा लहराने में अहम भूमिका निभाई।
इसी अदम्य साहस और वीरता के लिए राष्ट्रपति ने उन्हें महावीर चक्र से सम्मानित किया। गोली लगने के कारण उनके शरीर का लगभग 80 फीसदी हिस्सा अपंग हो गया, जिसके बाद उन्हें वर्ष 2004 में अनफिट घोषित कर दिया गया।
उन्होंने ऑपरेशन पवन समेत कई अन्य ऑपरेशनों में भी दुश्मनों के खिलाफ बहादुरी दिखाई। गौरतलब है कि उनके पिता शिवदान सिंह को भी 1947-48 के युद्ध के दौरान 11 गोलियां लगी थीं।
शहीद मेजर शैतान सिंह भाटी का जन्म राजस्थान के जोधपुर जिले के बाणासुर गांव में हुआ था। वे 13 कुमाऊ रेजीमेंट में मेजर के पद पर तैनात थे । 18 नवंबर 1962 को लद्दाख के रेजांग ला दर्रे पर उन्होंने अपनी सी कंपनी के केवल 120 जवानों के साथ मिलकर हजारों चीनी सैनिकों का सामना किया।
भारी बर्फबारी और विषम परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने पीछे हटने से इनकार कर दिया और अंतिम सांस तक लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। उनकी टुकड़ी ने 1300 चीनी सैनिकों को मार गिराया था। उनकी इस वीरता के लिए उन्हें परमवीर चक्र पुरस्कार से नवाजा गया।
जैसलमेर जिले के मोहनगढ़ कस्बे के निवासी शहीद राजेंद्र सिंह की कहानी आज भी युवाओं को प्रेरणा देती है। 2019 में जम्मू-कश्मीर में आतंकवादियों से मुठभेड़ के दौरान वे शहीद हो गए थे। उनकी वीरता आज भी गांव और परिवार की यादों में जीवित है।
स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा का जन्म 22 मई 1963 को कोटा में हुआ था। 27 मई 1999 को कारगिल में ऑपरेशन सफेद सागर के तहत कश्मीर में नियंत्रण रेखा के भारतीय हिस्से पर एक मिशन शुरू किया गया था।
इस दौरान स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा को सूचना मिली कि उनके साथी अधिकारी फ्लाइट लेफ्टिनेंट नचिकेता इंजन में खराबी आने के बाद अपने मिग 27 विमान से इजेक्ट हो गए हैं।
स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा ने अपने साथी अधिकारी का पता लगाने का बीड़ा उठाया और बचाव कार्य में सहायता के लिए घुसपैठियों के कब्जे वाले ठिकानों पर डटे रहे और दुर्घटनाग्रस्त विमान और पायलट के संभावित स्थान का पता लगाने में सफल रहे।
स्क्वाड्रन लीडर आहूजा ने बचाव हेलीकॉप्टरों को रवाना करने के लिए मिशन कंट्रोल रूम को महत्वपूर्ण जानकारी दी। इस दौरान उनके मिग 21 एमएफ लड़ाकू विमान पर मिसाइल से हमला हुआ।
उन्होंने विमान को सुरक्षित क्षेत्र की ओर मोड़ने का प्रयास किया, लेकिन जब विमान का इंजन बंद हो गया तो स्क्वाड्रन लीडर आहूजा के पास इजेक्ट करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा।
उन्होंने सुरक्षित रूप से इजेक्ट किया, लेकिन वे शहीद हो गए। उनका शव 28 मई 1999 को पाकिस्तान ने भारतीय अधिकारियों को सौंपा था।
जोधपुर में जन्मे लेफ्टिनेंट पुनीत नाथ दत्त भारतीय सेना के एक बहादुर अधिकारी थे। वे जम्मू-कश्मीर के नौशेरा सेक्टर में गोरखा राइफल्स में तैनात थे।
20 जुलाई 1997 को नौशेरा सेक्टर में एक ऑपरेशन का नेतृत्व करते हुए एक इमारत में छिपे आतंकवादियों से लोहा लिया। जिसमें उन्होंने तीन आतंकवादियों को मार गिराया और देश के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए।
इस असाधारण वीरता और नेतृत्व के लिए उन्हें मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च शांतिकालीन वीरता पुरस्कार अशोक चक्र से सम्मानित किया गया।
कर्नल करणी सिंह राठौड़ चूरू जिले के निवासी थे। वे राजपूताना राइफल्स फिर असम राइफल्स में कुशल नेतृत्व के लिए जाने जाते थे। 1962 के युद्ध के दौरान अरूणाचल प्रदेश में चीनी और गैर राज्यीय आतंकी घुसपैठ के चलते कर्नल राठौड़ को वहां दल के साथ भेजा गया।
उन्होंने और उनकी पलटन ने इस दौरान अदम्य साहस का प्रदर्शन किया। नतीजनत सीमावर्ती इलाकों पर भारत का कब्जा मजबूत हुआ। उन्हें 1985 में कीर्ति चक्र वीरता पुरस्कार से सम्मानित किया गया। आतंक रोधी अभियान में असाधारण वीरता और कर्तव्य निष्ठा के लिए सम्मान मिला।
Updated on:
20 Jan 2026 07:31 pm
Published on:
20 Jan 2026 07:11 pm
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