
Cholesterol risk in indian: भारतीय महिलाओं में कॉलेस्ट्रॉल के मामले पुरुषों से ज्यादा (AI Creative)
Cholesterol Risk Indian: कोई व्यक्ति देखने में बिल्कुल स्वस्थ है, उसका वजन सामान्य है, उसे मधुमेह या उच्च रक्तचाप भी नहीं है, फिर भी उसके रक्त में वसा का स्तर सामान्य नहीं हो सकता है। भारत में हुए एक बड़े राष्ट्रीय अध्ययन ने स्वास्थ्य को लेकर इस धारणा पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। अध्ययन के मुताबिक, देश के 87.3 प्रतिशत वयस्कों में कम से कम एक तरह की लिपिड असामान्यता पाई गई है।
यानी करीब 10 में 9 भारतीय वयस्कों में रक्त में कोलेस्ट्रॉल या ट्राइग्लिसराइड जैसे वसा संबंधी मानकों में से कम से कम एक सामान्य सीमा में नहीं था। यह अध्ययन आईसीएमआर-इंडियाब के आंकड़ों पर आधारित है और इसे जर्नल ऑफ क्लिनिकल लिपिडोलॉजी में 14 जुलाई 2026 को ऑनलाइन प्रकाशित किया गया। इसमें देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को शामिल करने वाले राष्ट्रीय सर्वेक्षण के 23,665 वयस्कों के लिपिड प्रोफाइल का विश्लेषण किया गया।
आम तौर पर कोलेस्ट्रॉल की बात होते ही ध्यान 'खराब' एलडीएल कोलेस्ट्रॉल पर जाता है। लेकिन इस राष्ट्रीय अध्ययन में भारत की सबसे बड़ी लिपिड समस्या कम एचडीएल यानी अच्छे कोलेस्ट्रॉल का स्तर रही। अध्ययन में 66.8 प्रतिशत प्रतिभागियों में एचडीएल कम पाया गया। इसके बाद उच्च एलडीएल, बढ़े हुए ट्राइग्लिसराइड और बढ़े हुए कुल कोलेस्ट्रॉल जैसी असामान्यताएं सामने आईं।
एचडीएल को आमतौर पर 'अच्छा' कोलेस्ट्रॉल कहा जाता है, क्योंकि यह रक्त से अतिरिक्त कोलेस्ट्रॉल को हटाने की प्रक्रिया में भूमिका निभाता है। हालांकि केवल एचडीएल की एक संख्या देखकर किसी व्यक्ति के हृदय रोग का पूरा जोखिम तय नहीं किया जा सकता। डॉक्टर जोखिम का आकलन कई कारकों को साथ देखकर करते हैं।
अध्ययन में पुरुषों की तुलना में महिलाओं में लिपिड असामान्यता अधिक पाई गई। महिलाओं में यह दर 91.1 प्रतिशत, जबकि पुरुषों में 83.5 प्रतिशत रही। शहरी आबादी में यह 89 प्रतिशत और ग्रामीण आबादी में 86.5 प्रतिशत थी। इससे यह धारणा कमजोर पड़ती है कि रक्त में वसा की गड़बड़ी केवल अधिक वजन वाले पुरुषों या उम्रदराज लोगों की समस्या है।
अध्ययन में लिपिड असामान्यता का बोझ कम उम्र के वयस्कों में भी महत्वपूर्ण पाया गया। शोधकर्ताओं ने उम्र के साथ-साथ कम शारीरिक गतिविधि, मोटापा, उच्च रक्तचाप और मधुमेह को भी लिपिड असामान्यता से जुड़ा पाया। यानी केवल उम्र बढ़ने का इंतजार करके जांच कराने की सोच पर्याप्त नहीं हो सकती। खासतौर पर उन लोगों में जोखिम बढ़ सकता है जिनकी दिनचर्या में शारीरिक गतिविधि कम है और भोजन में ऊर्जा, परिष्कृत कार्बोहाइड्रेट या अत्यधिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों की मात्रा ज्यादा है।
अध्ययन का एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि लिपिड असामान्यता केवल मधुमेह, मोटापे या उच्च रक्तचाप वाले लोगों तक सीमित नहीं है। शोधकर्ताओं के अनुसार, मधुमेह, उच्च रक्तचाप और मोटापे से मुक्त लोगों में भी करीब 40 प्रतिशत में डिस्लिपिडेमिया मौजूद था। इसका अर्थ यह नहीं है कि इन सभी लोगों को हृदय रोग है या उन्हें तुरंत दवा की जरूरत है। इसका मतलब यह है कि केवल शरीर का वजन, ब्लड शुगर या ब्लड प्रेशर सामान्य होना रक्त में वसा के स्तर के सामान्य होने की गारंटी नहीं देता।
राष्ट्रीय अध्ययन के क्षेत्रीय विश्लेषण में मध्य भारत में डिस्लिपिडेमिया की दर 89.1 प्रतिशत रही, जो सभी क्षेत्रों में सबसे अधिक थी। उत्तर-पूर्व भारत में यह दर 85.3 प्रतिशत रही।
शहरी और ग्रामीण भारत के बीच अंतर बहुत बड़ा नहीं रहा। शहरों में 89 प्रतिशत और ग्रामीण क्षेत्रों में 86.5 प्रतिशत वयस्कों में कम से कम एक लिपिड असामान्यता मिली। अध्ययन में शामिल लिपिड प्रोफाइल वाले प्रतिभागियों में करीब 70 प्रतिशत ग्रामीण आबादी से थे।
इससे साफ है कि समस्या को केवल महानगरों की जीवनशैली से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। बदलती खान-पान की आदतें और कम होती शारीरिक सक्रियता ग्रामीण और शहरी दोनों आबादी के स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती हैं।
नहीं, ऐसा बिल्कुल नहीं है। एक्सटपर्ट्स बताते हैं कि किसी व्यक्ति का शरीर दुबला हो सकता है, वह रोजमर्रा के काम भी करता हो और फिर भी उसके रक्त में एलडीएल, ट्राइग्लिसराइड या एचडीएल में असामान्यता हो सकती है। इसी तरह किसी एक असामान्य मान का मतलब यह भी नहीं कि व्यक्ति को हृदय रोग हो गया है।
ब्लड सैंपल से होने वाले इस लिपिड प्रोफाइल टेस्ट में कुल कोलेस्ट्रॉल, एलडीएल, एचडीएल और ट्राइग्लिसराइड जैसे मानकों को देखा जाता है। इनके साथ उम्र, रक्तचाप, मधुमेह, धूम्रपान, पारिवारिक इतिहास और पहले से मौजूद हृदय संबंधी जोखिम को मिलाकर डॉक्टर आगे की सलाह देते हैं।
सामान्य जोखिम वाले वयस्कों में हर साल जांच अनिवार्य नहीं है। 2026 की अमेरिकी की एक्सपर्ट टीम की गाइडलाइन के तहत 19 वर्ष की उम्र से लिपिड प्रोफाइल और उसके बाद कम से कम हर 5 साल में जांच की सिफारिश करती है। अतिरिक्त जोखिम होने पर अंतराल कम किया जा सकता है।
यह रक्त की जांच है। आधुनिक गाइडलाइन के अनुसार कई मामलों में बिना खाली पेट भी लिपिड जांच की जा सकती है। कुछ परिस्थितियों में डॉक्टर खाली पेट जांच कराने की सलाह दे सकते हैं।
सिर्फ एक संख्या देखकर खुद से दवा शुरू न करें। डॉक्टर उम्र, रक्तचाप, मधुमेह, धूम्रपान, पारिवारिक इतिहास और दूसरे हृदय जोखिमों के साथ पूरी रिपोर्ट का आकलन करते हैं।
ध्यान दें कि आजकल लोग खुद ही हेल्थ कॉन्शियस हैं और साल में एक बार जांच कराने लगे हैं, लेकिन एक्सपर्ट्स के मुताबिक साल में एक बार जांच सबके लिए जरूरी नहीं है। हां लेकिन, जोखिम वाले व्यक्ति में जांच की जरूरत और अंतराल डॉक्टर तय करते हैं।
डिस्लिपिडेमिया अक्सर बिना स्पष्ट लक्षण के मौजूद रह सकता है। यही वजह है कि किसी व्यक्ति का खुद को पूरी तरह स्वस्थ महसूस करना सामान्य लिपिड प्रोफाइल की पुष्टि नहीं करता। आईसीएमआर-इंडियाब अध्ययन के शोधकर्ताओं ने भी भारत में व्यापक लिपिड स्क्रीनिंग और समय रहते बचाव के उपायों की जरूरत पर जोर दिया है।
इसका सबसे सीधा मैसेज है कि, स्वास्थ्य का आकलन अब सिर्फ आईने में दिखने वाले शरीर से नहीं, जरूरत पड़ने पर रक्त जांच से भी होता है। अगर किसी व्यक्ति को मधुमेह, उच्च रक्तचाप, मोटापा, धूम्रपान की आदत, परिवार में कम उम्र में हृदय रोग का इतिहास या अन्य जोखिम कारक हैं तो डॉक्टर से सलाह लेकर लिपिड प्रोफाइल की जरूरत समझी जा सकती है। रिपोर्ट में असामान्यता आने पर खुद से दवा शुरू करने के बजाय चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है।
Updated on:
13 Aug 2026 10:12 am
Published on:
13 Aug 2026 10:12 am
