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बाढ़ आई तो गांव खाली हो गया… क्या भारत में चुपचाप बढ़ रहे हैं ‘क्लाइमेट डिस्प्लेस्ड’ लोग?

Internal Displacement in India: बारिश, बाढ़ और भूस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदाएं हर साल लाखों भारतीयों को अपने घर, अपने गांव छोड़ने पर मजबूर करती हैं। जानिए क्यों आंतरिक विस्थापन भारत के लिए उभरती बड़ी चुनौती बनता जा रहा है?
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भारत

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Sanjana Kumar

Aug 05, 2026

Internal Displacement in India

Internal Displacement in India: भारत के लिए नई चुनौती (AI Creative)

Internal Displacement in India: जब किसी गांव में बाढ़ आती है, पहाड़ दरकते हैं या समुद्र तट पर चक्रवात तबाही मचाता है, तो खबरों में कुछ दिनों तक मौतों और नुकसान की चर्चा होती है। लेकिन कैमरे हटने के बाद उन परिवारों का क्या होता है, जिन्हें अपना घर, खेत या रोजगार छोड़कर कहीं और जाना पड़ता है? यही वह पहलू है, जिस पर भारत में अब गंभीर चर्चा शुरू हो रही है।

भारत दुनिया के उन देशों में शामिल है, जहां प्राकृतिक आपदाओं के कारण हर साल सबसे अधिक आंतरिक विस्थापन दर्ज किए जाते हैं। इनमें बाढ़, चक्रवात, भूस्खलन और अत्यधिक वर्षा सबसे बड़ी वजह हैं।

हालांकि आम बोलचाल में ऐसे लोगों को कई बार 'क्लाइमेट रिफ्यूजी' कहा जाता है, लेकिन कानूनी रूप से यह शब्द सही नहीं है। क्योंकि ये लोग किसी दूसरे देश में नहीं जाते, बल्कि अपने ही देश में सुरक्षित स्थानों पर पहुंचते हैं। इसलिए अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं इनके लिए Climate induced Internal Displacement या Disaster Displacement जैसे शब्दों का उपयोग करती हैं।

भारत में तस्वीर कितनी बड़ी है?

इंटरनल डिस्प्लेसमेंट मॉनीटरिंग सेंटर (IDMC) के मुताबिक भारत हर वर्ष आपदा-जनित आंतरिक विस्थापन के मामले में दुनिया के सबसे अधिक प्रभावित देशों में शामिल रहता है। 2024 में भी बाढ़, चक्रवात और अन्य प्राकृतिक आपदाओं के कारण भारत में लाखों नए आंतरिक विस्थापन दर्ज किए गए।

एक्सपर्ट्स का कहना है कि यह केवल अस्थायी पलायन का मामला नहीं है। कई परिवार महीनों तक घर नहीं लौट पाते, बच्चों की पढ़ाई छूट जाती है, आजीविका प्रभावित होती है और कई बार लोगों अपने घर नहीं लौटते, उन्हें स्थायी रूप से दूसरी जगह बसना ही पड़ता है।

सबसे ज्यादा खतरा किन इलाकों को?

जलवायु और आपदा एक्सपर्ट्स के मुताबिक सबसे अधिक जोखिम भरे क्षेत्रों में असम और ब्रह्मपुत्र घाटी, बिहार के बाढ़ प्रभावित जिले, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के भूस्खलन क्षेत्र, ओडिशा और आंध्र प्रदेश का चक्रवात प्रभावित तटीय क्षेत्र सुंदरबन और पश्चिम बंगाल का तटीय इलाका, केरल के भूस्खलन और अतिवृष्टि वाले क्षेत्र ऐसे हैं जहां से हर साल बड़ी संख्या में लोगों को अस्थायी राहत शिविरों या सुरक्षित स्थानों पर जाना पड़ता है।

क्या जलवायु परिवर्तन इसका कारण है?

विशेषज्ञों बताते हैं कि आपदा को सीधे जलवायु परिवर्तन से जोड़ना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं होगा। लेकिन यह स्पष्ट है कि बढ़ते तापमान के साथ कई क्षेत्रों में अत्यधिक वर्षा, तीव्र चक्रवात और चरम मौसम की घटनाओं का जोखिम बढ़ रहा है। ऐसे में विस्थापन का खतरा भी बढ़ सकता है।

भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती

भारत में आपदा प्रबंधन, राहत और पुनर्वास की व्यवस्था मौजूद है, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि अब केवल राहत पर्याप्त नहीं होगी। शहरी नियोजन, बाढ़ क्षेत्र प्रबंधन, सुरक्षित आवास, पूर्व चेतावनी प्रणाली और जलवायु-अनुकूल बुनियादी ढांचे पर अधिक निवेश की आवश्यकता है। क्योंकि यदि हर साल लाखों लोग बार-बार विस्थापित होते रहे, तो इसका असर रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और शहरों के संसाधनों पर भी पड़ेगा।

भारत के लिए यह बहस क्यों जरूरी है?

भारत में अभी 'Climate Refugee' की कोई कानूनी श्रेणी नहीं है, लेकिन जलवायु परिवर्तन और आपदाओं से होने वाले आंतरिक विस्थापन का मुद्दा नीति-निर्माताओं के सामने तेजी से उभर रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य की विकास योजनाओं में केवल आपदा के बाद राहत ही नहीं, बल्कि विस्थापन के जोखिम को कम करने की रणनीति भी शामिल करनी होगी।

भारत भर में जोखिम भरे क्षेत्रों की स्थिति को देखते हुए कहना होगा कि बारिश, बाढ़ और भूस्खलन की खबरें कुछ दिनों में पुरानी हो जाती हैं, लेकिन जिन परिवारों का घर छूट जाता है, उनके लिए संकट महीनों या वर्षों तक चलता है। भारत के सामने अब चुनौती केवल आपदाओं से लड़ने की नहीं, बल्कि उन लाखों लोगों के भविष्य को सुरक्षित करने की भी है जिन्हें, बदलते मौसम और प्राकृतिक आपदाएं बार-बार अपना घर छोड़ने पर मजबूर कर रही हैं।