
सांकेतिक इमेज (सोर्स- Gemini)
दुनिया भर में किशोर (15 वर्षीय छात्रों) में पढ़ाई की क्षमता लगातार कम हो रही है। इन छात्रों में गणित और विज्ञान जैसे विषयों में पढ़ाई की क्षमता बेहद कम रही है। इसकी एक बड़ी वजह पढ़ाई के बजाय मोबाइल-लैपटॉप जैसे डिजिटल डिवाइस पर बढ़ता समय तथा किताबें पढ़ने में घटती दिलचस्पी है।
आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (OECD) ने 8 सितंबर 2026 को जारी अपनी ताजा अंतरराष्ट्रीय पीसा (प्रोग्राम फॉर इंटरनेशनल स्टूडेंट असेसमेंट) 2025 रिपोर्ट में यह चौंकाने वाला खुलासा किया है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, गणित व पढ़ने में छात्रों का औसत प्रदर्शन अब तक का सबसे निचला स्तर है।
आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (OECD) ने छात्रों की क्षमता का आकलन करने के लिए दुनिया भर के 91 देशों में अध्यन किया। इस आकलन के लिए दुनिया भर के 91 देश और अर्थव्यवस्थाओं के 7.60 लाख से अधिक 15 वर्षीय छात्रों को टेस्ट में शामिल किया गया। यह दुनिया भर के करीब 3.3 करोड़ किशोरों का प्रतिनिधित्व करते हैं। यह अब तक का सबसे बड़ा पीसा आकलन था।
रिपोर्ट के मुताबिक, OECD देशों में हर पांच में से एक 15 वर्षीय छात्र अब विज्ञान, गणित और पढ़ने में "लो परफॉर्मर" की श्रेणी में है, जबकि 2022 में यह आंकड़ा 16 प्रतिशत था। पढ़ने की क्षमता में सबसे तेज गिरावट दर्ज हुई है। 2015 से 2025 के बीच OECD देशों में औसत रीडिंग स्कोर 28 अंक गिरा है, जो करीब डेढ़ साल की पढ़ाई के बराबर नुकसान है। वहीं, गणित का स्कोर 22 अंक गिरा, जो लगभग एक साल की पढ़ाई जितना है। दिलचस्प यह भी है कि 2018 से 2025 के बीच अकेले ही रीडिंग स्कोर में 25 अंकों की गिरावट आई, जबकि विज्ञान का स्कोर दस साल में सिर्फ 7 अंक गिरा और 2022-2025 के बीच लगभग स्थिर रहा।
रिसर्च में एक और चिंताजनक प्रवृत्ति सामने आई है। अध्यन के मुताबिक, बिना ध्यान से पढ़े जल्दबाजी में जवाब देने वाले छात्रों, यानी "हेस्टी रीडर्स" की तादाद तेजी से बढ़ी है। 2018 से 2025 के बीच ऐसे छात्रों का अनुपात लगभग दोगुना होकर करीब 7 प्रतिशत से बढ़कर 11 प्रतिशत हो गया है। OECD के महासचिव मैथियास कॉरमन ने इस मौके पर कहा कि तकनीक और AI सीखने की प्रक्रिया को मजबूत कर सकते हैं, लेकिन सिर्फ तभी जब इनका इस्तेमाल सोच-समझकर हो, न कि ध्यान, मेहनत और समझ की जगह लेने वाले विकल्प के तौर पर।
OECD में छात्रों के डिजिटल डिवाइस पर बिताए जाने वाले समय का भी खुलासा हुआ है। OECD सदस्य देशों में छात्र औसतन हर कामकाजी दिन मनोरंजन के लिए डिजिटल डिवाइस पर 3.4 घंटे और पढ़ाई से जुड़े कामों के लिए स्कूल व घर पर अतिरिक्त 3 घंटे बिताते हैं। यानी कि छात्र और कामकाजी करीब साढ़े 6 घंटे रोजाना स्क्रीन पर बिताते हैं।
कॉरमन के मुताबिक अगर डिवाइस का इस्तेमाल दिन में पांच घंटे से ज्यादा हो जाए, तो नतीजे गिरने लगते हैं। साथ ही 2022 के बाद से हर दिन एक घंटे से ज्यादा सोशल मीडिया इस्तेमाल करने वाले छात्रों का अनुपात करीब छह प्रतिशत अंक बढ़ा है। AI इस्तेमाल को लेकर तस्वीर मिली-जुली है।
रिपोर्ट के अनुसार जब AI और डिजिटल टूल्स का इस्तेमाल संयम से और स्पष्ट उद्देश्य के साथ हो, तभी फायदेमंद रहता है, लेकिन जब इस्तेमाल जरूरत से ज्यादा हो या डिवाइस स्कूल में सिर्फ मनोरंजन के लिए इस्तेमाल हों, तो छात्रों का प्रदर्शन कमजोर रहा। कक्षा में डिजिटल ध्यान भटकाव भी बड़ी समस्या है। चार में से एक से ज्यादा छात्रों ने बताया कि विज्ञान की ज्यादातर या हर कक्षा में सहपाठी डिजिटल डिवाइस से विचलित होते हैं।
ज्यादातर देश गिरावट से जूझ रहे हैं, वहीं पूर्वी एशियाई देशों ने बेहतरीन प्रदर्शन किया है। तीनों विषयों में सबसे बेहतर प्रदर्शन करने वालों में चीन के बीजिंग, शंघाई, जियांग्सू और झेजियांग क्षेत्र तथा सिंगापुर शामिल रहे, वहीं एस्टोनिया, जापान, कोरिया, मकाओ (चीन), चीनी ताइपे और ब्रिटेन भी शीर्ष 10 प्रदर्शन करने वाले शिक्षा तंत्रों में जगह बना पाए। रिपोर्ट के अनुसार पूर्वी एशिया समग्र रूप से सबसे बेहतर प्रदर्शन करने वाला क्षेत्र रहा, जबकि इस क्षेत्र से बाहर सिर्फ ब्रिटेन और एस्टोनिया ही शीर्ष सूची में जगह बना सके।
रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि अब भी प्रदर्शन तय करने वाला बड़ा कारक है। OECD देशों में संपन्न परिवारों के छात्रों ने विज्ञान में वंचित पृष्ठभूमि के छात्रों से 85 अंक ज्यादा स्कोर किया, हालांकि 2022 से 2025 के बीच यह अंतर कुछ घटा है।
पीसा 2025 की रिपोर्ट एक साफ चेतावनी है कि बढ़ती डिजिटल निर्भरता और घटती एकाग्रता वैश्विक स्तर पर शिक्षा की बुनियाद को कमजोर कर रही है। अगर स्क्रीन टाइम व AI इस्तेमाल को संतुलित नहीं किया गया, तो आने वाली पीढ़ियों की सीखने की क्षमता पर और असर पड़ सकता है।
Updated on:
15 Sept 2026 04:20 pm
Published on:
15 Sept 2026 04:20 pm
