
आगरा के भाजपा प्रत्याशी के पास है 'एससी' का अवैध सर्टिफिकेट, केंद्रीय मंत्रालय ने लगाई मुहर
नई दिल्ली।केंद्र सरकार के सामाजिक न्याय एवं आधिकारिता मंत्रालय द्वारा दिए एक आरटीआई के जवाब के बाद आगरा लोकसभा सीट से भाजपा प्रत्याशी एवं उत्तर प्रदेश के पशुधन मंत्री एसपी सिंह बघेल की उम्मीदवारी पर संकट आ सकता है। आरटीआई में खुलासा हुआ है कि उत्तर प्रदेश राज्य के लिए गडरिया, धनगर, पाल, बघेल, समुदायों को एससी श्रेणी में नहीं रखा गया है। इसलिए इस समुदाय के सदस्य अनुसूचित जाति का प्रमाण पत्र प्राप्त करने के पात्र नहीं हैं। ऐसे समुदाय के लोगों को अनुसूचित जाति प्रमाण पत्र देना गैर कानूनी और असंवैधानिक है। इस आरटीआई के जवाब के अनुसार आगरा लोकसभा क्षेत्र से भाजपा प्रत्याशी एसपी बघेल के चुनाव लडऩे पर संकट आ सकता है। आपको बता दें कि जाति को लेकर विवाद काफी समय से चल रहा है। इसको लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट में सुनवाई चन रही है। वहीं एसपी बघेल खुद को एससी बताते रहे हैं। उनके पास आगरा जिले से जारी अनुसूचित जाति का प्रमाण पत्र भी है।
मंत्रालय का यह है आदेश
पत्रिका डॉट काम ( Patrika.com ) के पास उपलब्ध आरटीआई की प्रति के अनुसार 25 मार्च 2019 को सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय द्वारा उत्तर प्रदेश सरकार को जारी किया गया वो पत्र हाथ लगा जिसमें उन्होंने जातियों को लेकर निर्देश जारी किए हैं। पत्र के तीसरे नंबर के पैराग्राफ में साफ कहा है कि धनगर समुदाय के सदस्यों को जाति प्रमाण पत्र जारी करना संविधान के अनुच्छेद 341 के उपबंधों और इस मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित कानून के खिलाफ है। इस समुदाय के सदस्यों को प्रमाण पत्र जारी करना असंवैधानिक और गैर कानूनी है। आपको बता दें कि बीजेपी के आगरा लोकसभा क्षेत्र से प्रत्याशी एसपी बघेल धनगर समुदाय से ताल्लुक रखते हैं। ऐसे में उनका जाति प्रमाण पत्र पूरी तरह से सवालों के घेरे में हैं। पत्र में साफ लिखा गया है कि इस तरह के जाति प्रमाण पत्र असंवैधानिक और गैर कानूनी हैं। पत्रिका डॉट काम ( Patrika.com ) के पास मंत्रालय द्वारा दिए आरटीआई के जवाब में जारी किया गया पत्र है। जिसको आसानी से आप भी पढ़ सकते हैं।
भाजपा ओबीसी मोर्चा के अध्यक्ष थे बघेल
2015 में भाजपा ने ओबीसी मोर्चा का गठन किया था। बघेल ओबीसी नेता थे। भाजपा के पास मोर्चे की कमान संभानले वाला बड़ा नेता था जिसकी वजह से बघेल अध्यक्ष बनाया। अब सवाल ये है कि अगर बघेल ओबीसी थे और उसके बाद भाजपा ने उन्हें ओबीसी मोर्चे का अध्यक्ष बनाया तो 2017 और अब 2019 में उन्हें एससी सीट से टिकट क्यों दिया? जबकि यह संविधान के विरुद्घ है।
2017 के बाद ओबीसी से एससी बने बघेल
उत्तर प्रदेश के 2017 विधानसभा चुनाव में टुंडला विधापसभा सीट से भाजपा ने ओबीसी लीडर बघेल को टिकट दिया। बघेल ने अपने नामांकन में खुद को एससी प्रत्याशी के तौर पर दर्शाया। यहां तक कि बघेल ने चुनाव आयोग को अनुसूचित जाति का प्रमाणपत्र भी दिया। जिसके बाद बघेल ने चुनाव में जीत हासिल की और मंत्री भी बन गए। जिसके बाद बघेल और उनका प्रमाण पत्र विवादों के घेरे में आ गया। जिसके बाद टुंडला के पूर्व विधायक राकेश बाबू ने इस पूरे मामले को इलाहाबाद हाईकोर्ट में उठाया। अब एक बार फिर से भाजपा ने बघेल को आगरा लोकसभा क्षेत्र जो अनुसूचित जाति के लिए सुरक्षित है, टिकट दे दिया है।
आखिर कौन होते हैं बघेल?
बघेल मूल रूप से गड़रिया समुदाय के माने जाते हैं। वहीं उत्तर प्रदेश में गड़रिया पिछड़ी जातियों में मानी जाती है। वहीं अनुसूचित जाति के वर्ग धनगर में बघेलों को शामिल करने का काफी समय से प्रयास हो रहा है, लेकिन अदालतों ने इस मामले में हमेशा से अपनी असहमति जाहिर की है। अदालतों ने साफ कहा है कि बघेल गड़रिया ही रहेंगे। आपको बता दें कि गड़रिया समुदाय उत्तर प्रदेश की पिछड़ी जातियों की पहली अनुसूची के 19वें स्थान पर मौजूद है।
आखिर क्या कहता है कानून?
अब इस संबंध में कानून क्या कहता है इस बात को समझने का प्रयास करते हैं। संविधान के अनुच्छेद 341 के उपबंधों के अंतर्गत अनुसूचित जातियों को अधिसूचित किया जाता है। किसी राज्य या संघ राज्य क्षेत्र से संबंधित अनुसूचित जातियों की पहली सूची केवल राष्ट्रपति के आदेश द्वारा ही अधिसूचित होती है। उक्त सूची में कोई भी बदलाव संसद के अधिनियम द्वारा ही किया जा सकता है।
क्या कहते हैं वकील?
वहीं इस बारे में दिल्ली हाईकोर्ट के वकील अमित मित्तल का कहना है कि अगर कोई ऐसा मामला सामने आता है तो उसे इलेक्शन कमीशन और सुप्रीम कोर्ट में लाया जा सकता है। जिसके बाद दोनों संस्थाएं उक्त मामले पर सुनवाई कर संबंधित प्रत्याशी का नामांकन रद करने के अलावा संबंधित लोकसभा क्षेत्र के चुनाव परिणाम पर रोक भी लगा सकता है।
Updated on:
04 May 2019 09:31 pm
Published on:
04 May 2019 07:30 pm
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