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Chhattisgarh: मार्कफेड की कैप कवर खरीदी में गड़बड़ी का आरोप, टेंडर से 80% ज्यादा खरीद पर उठे सवाल

मार्कफेड की कैप कवर खरीदी में नियमों की अनदेखी और टेंडर से 80% ज्यादा खरीद का आरोप लगा है। मामले में 18 से अधिक शिकायतों के बावजूद कार्रवाई नहीं होने पर सवाल उठ रहे हैं।
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रायपुर

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Shradha Jaiswal

•

Updated: 8 Sep 2026, 12:57 PM IST

Chhattisgarh

Chhattisgarh: मार्कफेड की कैप कवर खरीदी में गड़बड़ी का आरोप(photo-patrika)

Chhattisgarh: छत्तीसगढ़ राज्य सहकारी विपणन संघ मर्यादित (मार्कफेड) में धान की सुरक्षा के लिए कैप कवर की खरीदी को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि पिछले दो वर्षों में खरीदी प्रक्रिया के दौरान नियमों, वित्तीय अधिकारों और पारदर्शिता के प्रावधानों की अनदेखी की गई। मामले को लेकर मुख्यमंत्री हेल्पलाइन से लेकर आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (ईओडब्ल्यू) तक 18 से अधिक शिकायतें किए जाने का दावा है। इसके बावजूद अब तक जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई नहीं होने को लेकर शिकायतकर्ता सवाल उठा रहे हैं।

Markfed Cap Cover Purchase: एफसीआई में कार्रवाई झेल चुकी फर्मों से सप्लाई का आरोप

मामले में सबसे बड़ा सवाल उन फर्मों को लेकर उठ रहा है, जिनसे मार्कफेड द्वारा लगातार कैप कवर की सप्लाई लिए जाने का दावा किया गया है। शिकायत और उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर आरोप है कि भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) ने वर्ष 2023 में शिवालिक, क्लाइमेक्स और बैग पॉली नामक तीन फर्मों के खिलाफ टेंडर में कार्टेलिंग के आरोपों को लेकर कार्रवाई की थी।

शिकायतकर्ता का आरोप है कि इसके बावजूद छत्तीसगढ़ मार्कफेड द्वारा इन्हीं फर्मों से लगातार कैप कवर की खरीदी की गई। साथ ही टेंडर की शर्तों को इस तरह तैयार किए जाने का भी आरोप है, जिससे चुनिंदा फर्मों को ही प्रक्रिया में शामिल होने का अवसर मिला।

दूसरे राज्य की तुलना में 3,295 रुपए महंगा कैप कवर

दस्तावेजों के हवाले से शिकायत में कैप कवर की कीमत को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। दावा है कि मार्कफेड ने कैप कवर के लिए 12,685 रुपए प्रति नग की दर से भुगतान किया। वहीं, शिकायत में यह भी उल्लेख किया गया है कि इन्हीं सप्लायर फर्मों ने समान स्पेसिफिकेशन, माप और गुणवत्ता वाला कैप कवर तमिलनाडु सिविल सप्लाइज कॉरपोरेशन को 9,390 रुपए प्रति नग की दर से सप्लाई किया था। दोनों दरों के बीच 3,295 रुपए प्रति नग का अंतर है। शिकायतकर्ता इसे सरकारी खजाने को संभावित वित्तीय नुकसान से जोड़कर देख रहे हैं।

18,500 के टेंडर पर 33,315 कवर की खरीदी

कैप कवर की मात्रा को लेकर भी गंभीर सवाल सामने आए हैं। विधानसभा के बजट सत्र 2026 में तारांकित प्रश्न क्रमांक 1025 के जवाब का हवाला देते हुए बताया गया है कि मार्कफेड ने कुल 33,315 नग कैप कवर खरीदे। जबकि मूल निविदा 18,500 नग कैप कवर के लिए जारी की गई थी। इस हिसाब से टेंडर की निर्धारित मात्रा से 14,815 नग अधिक, यानी करीब 80 प्रतिशत अतिरिक्त खरीदी की गई।

शिकायतकर्ता का आरोप है कि यह छत्तीसगढ़ शासन भंडार क्रय नियम, 2002 के उप-नियम 4.14(1) और 4.14(3) के विपरीत है। इस अतिरिक्त खरीदी की जिम्मेदारी तय किए जाने को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं।

टेंडर की शर्तों में तीन बार बदलाव का आरोप

खरीदी प्रक्रिया में टर्नओवर की शर्तों को लेकर भी शिकायत में सवाल उठाए गए हैं। आरोप के अनुसार, 30 सितंबर 2025 को जारी पहली निविदा में फर्म के लिए 6.25 करोड़ रुपए का टर्नओवर मांगा गया था। बाद में इसे घटाकर 5.75 करोड़ रुपए किया गया, लेकिन यह निविदा निरस्त कर दी गई। इसके बाद दूसरी निविदा में टर्नओवर की सीमा 4.50 करोड़ रुपए तय की गई। यह निविदा भी निरस्त हो गई।

शिकायत के अनुसार, करीब दो महीने बाद तीसरी निविदा में फिर से टर्नओवर की शर्त 5.75 करोड़ रुपए कर दी गई और इसके बाद उन्हीं तीन फर्मों को कार्यादेश दिए गए। इन बदलावों को लेकर शिकायतकर्ता ने टेंडर प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठाए हैं।

18 से ज्यादा शिकायतें, कार्रवाई पर सवाल

रायपुर निवासी शिकायतकर्ता राजेश व्यास के अनुसार, वर्ष 2024 से 2026 के बीच इस मामले को लेकर अलग-अलग सरकारी मंचों पर लगातार शिकायतें की गईं। इनमें मुख्यमंत्री एवं सीएम हेल्पलाइन, आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (ईओडब्ल्यू), खाद्य एवं सहकारिता मंत्री, मुख्य सचिव, खाद्य सचिव, सहकारिता सचिव, मार्कफेड के प्रबंध संचालक एवं अध्यक्ष सहित अन्य मंच शामिल हैं। शिकायतकर्ता का दावा है कि सुशासन तिहार 2026 के दौरान भी मामला उठाया गया। इसके बावजूद कार्रवाई नहीं होने से उन्होंने जांच की प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए हैं।

ईओडब्ल्यू को भेजी रिपोर्ट पर भी उठाए सवाल

शिकायतकर्ता राजेश व्यास का आरोप है कि ईओडब्ल्यू को भेजे गए मार्कफेड के प्रतिवेदन में भी मामले की गंभीरता को पर्याप्त रूप से सामने नहीं रखा गया। उनका दावा है कि रिपोर्ट के कारण जांच आगे नहीं बढ़ पा रही है। हालांकि, इन आरोपों पर संबंधित अधिकारियों और फर्मों का पक्ष सामने आना बाकी है। मामले में यह भी स्पष्ट होना बाकी है कि अतिरिक्त खरीदी, दरों के अंतर और टेंडर शर्तों में बदलाव को लेकर विभागीय स्तर पर क्या जांच या कार्रवाई की गई है।

आरटीआई के जवाब को लेकर भी सवाल

शिकायतकर्ता के अनुसार, मामले से जुड़ी जानकारी आरटीआई के जरिए मांगी गई थी। आरोप है कि विभाग की ओर से यह कहते हुए जानकारी देने से इनकार किया गया कि मार्कफेड आरटीआई के दायरे में नहीं आता। ऐसे में खरीदी प्रक्रिया से जुड़े दस्तावेज, फर्मों के चयन, दर निर्धारण और अतिरिक्त मात्रा में खरीद को लेकर पारदर्शिता का मुद्दा और महत्वपूर्ण हो गया है। अब सवाल यह है कि 18 से अधिक शिकायतों के बाद इस पूरे मामले की स्वतंत्र और विस्तृत जांच कब होगी और यदि नियमों का उल्लंघन साबित होता है तो जिम्मेदारी किसकी तय होगी।