
प्रतीकात्मक Photo
Chhattisgarh News: ताबीर हुसैन. ‘चाणक्य’ फेम और फिल्म ‘पिंजर’ के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्राप्त डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने कहा कि विभाजन सिर्फ जमीन का बंटवारा नहीं था, बल्कि यह लोगों के बीच ऐसी दीवार खड़ी कर गया, जिसका दर्द पीढिय़ों तक महसूस किया गया। राजधानी के मुक्ताकाश मंच पर आयोजित विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस में मुख्य वक्ता के रूप में उन्होंने विभाजन से जुड़े कई अनकहे प्रसंग साझा किए। इस दौरान उन्होंने ‘पत्रिका’ में प्रकाशित खबर 'कागज पर पेंसिल की लकीर थी… हिंदुस्तान के सीने खिंच गई' का उल्लेख करते हुए रैडक्लिफ रेखा और लाहौर के पाकिस्तान में जाने की कहानी भी बताई।
डॉ. द्विवेदी ने कहा कि फिल्म ‘पिंजर’ पर काम करते समय उन्हें एक प्रसंग मिला ‘हिंदुओं का पानी और मुसलमानों का पानी।’ उन्होंने सवाल किया कि पानी कब हिंदू या मुसलमान हो गया? विभाजन के दौरान हालात इतने बिगड़े कि रेलवे स्टेशनों पर हिंदुओं और मुसलमानों के लिए अलग-अलग नल तक लगाए गए। आजादी के बाद इन नलों को उखाड़ दिया गया। उन्होंने कहा कि धर्म के आधार पर पानी का बंटवारा नहीं हो सकता, लेकिन देश का बंटवारा धर्म के आधार पर हो गया।
उन्होंने बताया कि 8 जुलाई 1947 को सिरिल रैडक्लिफ भारत आया। उसे ऐसी लकीर खींचनी थी, जो तय करे कि कौन सा इलाका भारत में रहेगा और कौन पाकिस्तान में जाएगा। रैडक्लिफ को भारत के बारे में बहुत कम जानकारी थी। उसने 12 अगस्त को अपनी रिपोर्ट लॉर्ड माउंटबेटन को सौंप दी।
द्विवेदी ने कहा कि 14 अगस्त को पाकिस्तान ने स्वतंत्रता दिवस मनाया, लेकिन उस समय तक लोगों को यह स्पष्ट नहीं था कि लाहौर किस देश में जाएगा। रैडक्लिफ की सीमा रेखा की आधिकारिक घोषणा 17 अगस्त को हुई। लाहौर के पाकिस्तान में जाने की जानकारी पहले से थी, लेकिन इसे सार्वजनिक करने में देरी की गई, क्योंकि आशंका थी कि तत्काल घोषणा से दोनों देशों में तनाव और बढ़ जाएगा।
डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी अभिनेता ही नहीं, निर्देशक और विचारक भी हैं। एमबीबीएस करने के बाद डॉक्टरी छोड़कर रंगमंच की दुनिया में आए द्विवेदी ने अभिनय और निर्देशन दोनों में अपनी अलग पहचान बनाई। द्विवेदी ‘सम्राट पृथ्वीराज’ का निर्देशन भी कर चुके हैं। आज के युवाओं और खासकर जेन-जी को लेकर उनका नजरिया बेहद सकारात्मक है। पत्रिका से बातचीत में उन्होंने कहा कि युवा पीढ़ी भटकी हुई नहीं, बल्कि सही दिशा में आगे बढ़ रही है और कई मामलों में वह पुरानी पीढ़ी को भी रास्ता दिखा रही है।
द्विवेदी कहते हैं कि चाणक्य पहले भी प्रासंगिक थे और आज तो पहले से ज्यादा प्रासंगिक हैं। उनके विचार केवल राजनीति तक सीमित नहीं हैं। राष्ट्र, समाज, कर्तव्य और नेतृत्व को लेकर उनकी सोच आज भी बहुत कुछ सिखाती है।
युवा पीढ़ी को लेकर द्विवेदी निराश नहीं हैं। वे कहते हैं, हम अक्सर मान लेते हैं कि हमारी युवा पीढ़ी भटक रही है। नहीं, हमारी युवा पीढ़ी सही मार्क पर है और कई बार वह हमें सही रास्ता दिखा रही है। वह ज्यादा ईमानदार, संवेदनशील और देश के प्रति समर्पित है।"
उनके मुताबिक सिनेमा और मीडिया को युवाओं को उपदेश देने के बजाय ऐसी कहानियां सामने रखनी चाहिए, जो उन्हें सोचने और समाज व राष्ट्र से जुड़ने के लिए प्रेरित करें। उनके अनुसार ईमानदार और संवेदनशील कहानी सबसे ज्यादा असर करती है।
अपने जीवन को प्रभावित करने वाले विचार के बारे में द्विवेदी कहते हैं, अगर एक शब्द में कहूं तो निष्काम कर्मयोग। अपने लिए कुछ नहीं, जो करना है समाज और राष्ट्र के लिए करना है।
Updated on:
15 Aug 2026 12:42 pm
Published on:
15 Aug 2026 12:42 pm
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